Sunday, 28 April 2013

सत्ता है अब नगर वधू

सत्ता है अब नगर वधू ,  हर  कोई  उसको छूना चाहे ,,
मर्यादा  की  फांद दीवारे , उसको हर कोई  पाना चाहे ,,
दल  बदले , निष्ठाएं  बदलीं ,  टूट गयी सब मर्यादाएँ ,,
 लोकतंत्र  के  अन्तःपुर में , हर कोई अब घुसना  चाहे ,,
सत्ता के   इस चक्रव्यूह में सौ सौ अभिमन्यू फंसे  हुए ,,
द्यूत समझ जनसेवा को , अब हर  शकुनी  जय  करना चाहे ,,
सत्य -असत्य , अनीति -नीति की व्याख्याएं तब कौन सुनेगा ,,
 जब शासन हो धृतराष्ट्र  अंध का , गान्धारी कितना ही चाहे ,,
अर्थ सत्य है , सत्य अर्थ है  कर्तव्यों की उठी अर्थियां ,,
एकाधिकार हो अधिकारों पर , जनसेवक कहलाना चाहे ,,
शांति ,सुरक्षा , सदभावों के यक्ष सवालों से बच -बचकर ,,
संबंधों की चिता जलाकर , मंगलगीत सुनाना चाहे ,,
सत्ता है अब नगर वधू , हर कोई उसको छूना चाहे । ।
               
                                            - संजीव शुक्ल 'अतुल '