सत्ता है अब नगर वधू , हर कोई उसको छूना चाहे ,,
मर्यादा की फांद दीवारे , उसको हर कोई पाना चाहे ,,
दल बदले , निष्ठाएं बदलीं , टूट गयी सब मर्यादाएँ ,,
लोकतंत्र के अन्तःपुर में , हर कोई अब घुसना चाहे ,,
सत्ता के इस चक्रव्यूह में सौ सौ अभिमन्यू फंसे हुए ,,
द्यूत समझ जनसेवा को , अब हर शकुनी जय करना चाहे ,,
सत्य -असत्य , अनीति -नीति की व्याख्याएं तब कौन सुनेगा ,,
जब शासन हो धृतराष्ट्र अंध का , गान्धारी कितना ही चाहे ,,
अर्थ सत्य है , सत्य अर्थ है कर्तव्यों की उठी अर्थियां ,,
एकाधिकार हो अधिकारों पर , जनसेवक कहलाना चाहे ,,
शांति ,सुरक्षा , सदभावों के यक्ष सवालों से बच -बचकर ,,
संबंधों की चिता जलाकर , मंगलगीत सुनाना चाहे ,,
सत्ता है अब नगर वधू , हर कोई उसको छूना चाहे । ।
- संजीव शुक्ल 'अतुल '
मर्यादा की फांद दीवारे , उसको हर कोई पाना चाहे ,,
दल बदले , निष्ठाएं बदलीं , टूट गयी सब मर्यादाएँ ,,
लोकतंत्र के अन्तःपुर में , हर कोई अब घुसना चाहे ,,
सत्ता के इस चक्रव्यूह में सौ सौ अभिमन्यू फंसे हुए ,,
द्यूत समझ जनसेवा को , अब हर शकुनी जय करना चाहे ,,
सत्य -असत्य , अनीति -नीति की व्याख्याएं तब कौन सुनेगा ,,
जब शासन हो धृतराष्ट्र अंध का , गान्धारी कितना ही चाहे ,,
अर्थ सत्य है , सत्य अर्थ है कर्तव्यों की उठी अर्थियां ,,
एकाधिकार हो अधिकारों पर , जनसेवक कहलाना चाहे ,,
शांति ,सुरक्षा , सदभावों के यक्ष सवालों से बच -बचकर ,,
संबंधों की चिता जलाकर , मंगलगीत सुनाना चाहे ,,
सत्ता है अब नगर वधू , हर कोई उसको छूना चाहे । ।
- संजीव शुक्ल 'अतुल '