Saturday, 28 October 2017

नया फरमान !!!

पेंशन प्राप्त बुजुर्गों को ही संविदा पर रखा जाना चाहिए क्योंकि शायद  रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं को है। वैसे इसके कई फायदे भी हैं, एक फायदा तो यह है कि ये कभी भी स्थायी नियुक्ति के लिये मांग नहीं करेगें और जब ऐसी कोई मांग ही नहीं होगी तो स्थायी नियुक्ति हेतु होने वाले आंदोलन और प्रदर्शन भी नहीं होगें जो कि किसी भी सरकार के कार्यकाल पर बदनुमा दाग जैसे होते हैं ।  इसका दूसरा फायदा यह होगा कि युवाओं में बेरोजगारी जस की तस बनी रहेगी जो कि आगामी चुनावों में एक रणनीति के तहत विशिष्ट भूमिका निभाएगी।  चुनावों में गरीबी हटाओ का मुद्दा एक प्रमुख आकर्षण के रूप में रहेगा ही ......आज से कई दशकों पहले एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी ने भी गरीबी हटाओ का नारा दिया था पर हुआ क्या ??? अरे भाई, बेरोजगारी रहेगी तभी तो नेताओं और उनकी पार्टियों की अहमियत रहेगी अन्यथा इन्हें कौन पूछेगा ?? लगता है युवाओं की बेरोजगारी से नेताओं के रोजगार का निकट का सम्बंध है !!!!
                     ...संजीव शुक्ल अतुल

Thursday, 12 October 2017

आरक्षण : एक विवेचना

आरक्षण वह उचित व्यवस्था है, जिसके  माध्यम से किसी व्यक्ति,जाति या वर्ग विशेष के सामने आने वाली उन नकारात्मक व कृत्रिम परिस्थितियों को हटाया जाता है जो उसके विकास में बाधक होती हैं और जिसके अभाव में उन्नति की सम्भावनाएँ क्षीण हो जाती हैं। आरक्षण समान भागीदारी को सुनिश्चित करने की एक संवैधानिक व्यवस्था है।  असमान परिस्थितियां व मानव जनित रुकावटें कहीं जीवन की प्रतियोगिता में असफलता की निर्णायक न बन जाएं, इसीलिए आरक्षण की व्यवस्था की जाती है।
  पर आरक्षण का मौजूदा स्वरूप अपने लक्ष्यों से इतर राजनैतिक लाभ उठाने का एक जरिया व हथियार बन चुका है;  एक ऐसा राजनैतिक हथियार जिसके द्वारा जातियों को आसानी से लामबन्द करके वोट बैंक में तब्दील किया जा सकता है।  यह समान प्रतियोगिता के सिद्धांतों के खिलाफ अवसरवादिता को बढ़ावा दे रहा है। आखिर क्या वजह है कि इतने वर्षों बाद जब भी आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही जाती है तो इसे सीधे दलित विरोध से जोड़ दिया जाता है।क्या इतने वर्षों बाद भी यह देखने की जरूरत नही है कि इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचा है या नहीं ?  आखिर क्यों ऐसी किसी भी टिप्पणी को दलित विरोध की द्योतिका मान लिया जाता है जो आरक्षण  के अब तक के सफर का लेखा-जोखा बयान करती है ?
 जो आरक्षण के वाकई में हक़दार हैं और जो अभी-भी लाभ से अछूते रहें हैं, उनके पक्ष में आवाज़ उठाना क्या अपराध है ? क्या उन लोगों के लिये आवाज उठाना गलत है, जो पात्र होने के बावजूद  किसी आरक्षित जाति में नहीं आते ???
एक तरफ जाति की विषमताओं का रोना रोना  और दूसरी तरफ जाति आधारित आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करना खुली अवसरवादिता नहीं तो और क्या है। प्रमोशन में आरक्षण इसी अवसरवादिता का एक और रूप है...आरक्षण के अंदर एक और आरक्षण !! समान पद हासिल कर लेने के बाद भी परजीविता का भाव, हद है.....
  अगर कोई आर्थिक रूप से या सामाजिक रूप से कमजोर है तो उसे आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाय, सामाजिक संरक्षण दिया जाय, उसके बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाय, किताबें उपलब्ध कराई जाए और ज़्यादा से ज्यादा छात्रवृत्तियां दी जायँ ताकि वह समान प्रतियोगिता के स्तर पर आ सकें और उस स्तर पर समान प्रतियोगियों से मुकाबला कर सकें। प्रतियोगिता में आरक्षण देना मतलब योग्यता के स्तर को गिराना, उससे समझौता करना है।  प्रतियोगिता में आरक्षण देने का मतलब वैसा ही है जैसे किसी पैदल दौड़ में किसी को अव्वल लाने के लिये मोटरसाइकिल पकड़ा देना...... यह तो प्रतियोगिता के मूल भाव को ही नष्ट कर देता है। शैक्षिक प्रतियोगिता में आरक्षण देना मानसिक विकलांगता का प्रमाणपत्र है, लेकिन स्वार्थ के आगे यह भी स्वीकार्य है। आरक्षण होना चाहिए लेकिन हर क्षेत्र में नहीं ठीक वैसे ही जैसे विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री के पद को आरक्षित नही किया जा सकता .......
                        - संजीव शुक्ल अतुल