Thursday, 29 November 2018

जाति बिना सब सून... जोगीरा सा....रा...रा

     अब हनुमानजी भी अनुसूचित जाति में दर्ज़ हुए .... हनुमानजी की सारी होशियारी निकल गई...  हनुमानजी सोच रहे थे कि हम नहीं बताएंगे तो क्या कोई जान पायेगा। मग़र इस कलियुग में एक से एक खोजी टाइप के लोग हैं, आप कितना भी बचें वह पता लगाकर मानेंगे। माना कि आप सरकारी सहायता लेने के सख्त खिलाफ हैं और स्वाभिमानवश दलितात्मकता को अच्छा नहीं मानते पर अपनी जाति को भूलना क्या अच्छी बात है। हम यह भी मानते है कि ऊंची से ऊंची जाति वाले भी आपका  आशीर्वाद-कृपा पाने के लिए टकटकी लगाकर आपकी तरफ देखते रहते हैं पर फिर भी आप द्वारा अपनी जाति का तिरस्कार करना बहुत ही संज्ञेय अपराध है। अगर आपको यह डर सता रहा है कि लोगबाग हमारी जाति को जानकर हमको पूजना छोड़ देंगे तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। संत रविदास जी का उदाहरण आपके सामने है। उनकी कौन पूजा नहीं करता ???
 आजकल जाति और गोत्र का ही जमाना है। हर कोई एक-दूसरे की जाति और गोत्र जानना चाहता है
सारे विकास के रास्ते यहीं से होकर के जाते हैं। चुनाव में जाति देखकर के ही उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं और जाति देखकरके ही कान पकड़ के बैठाए भी जाते हैं। दुष्यंत जी के समय बाढ़ ज्यादा आती होगी इसीलिए उनको लिखना पड़ा कि "बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं" आज यदि वह जिंदा होते शायद यह लिखते "जाति की संभावनाएं सामने हैं और ......" अतः प्रभु अपनी जाति को छुपाये नहीं और अब तो सब जान ही गये हैं !!!!   लेकिन प्रभु एक विनती है आपसे, वह यह कि आप अपनी जाति से प्रेम करिये लेकिन भक्तों में जाति के आधार पर भेदभाव मत करियेगा, क्योंकि आपके सेवक सभी जातियों में थोक के भाव पाए जाते हैं।
 अब जबकि सब लोग जान गए हैं, लोग आपका कानूनी दुरुपयोग करने की कोशिश करेंगे, इसलिए होशियार रहिएगा
अब ये लोग आपको बहला-फुसलाकर भगवान रामजी और उनके पुत्र लव-कुश के खिलाफ दलित उत्पीड़न के तहत आपसे एस.सी/एस.टी.एक्ट लगवा देंगे।  लोकतंत्र में अतिरिक्त रूप से सजग रहना होता है प्रभु, यहां ज़रा सा भी चुके तो आप को लोग रावण से नहीं श्रीराम जी से ही आप की लड़ाई करवा देंगे।
 आपकी तरफ से ये लोग थाने चले जाएंगे और आरोप लगाएंगे कि भगवान राम हनुमानजी जी को सिंघासन के नीचे बैठाते हैं और दिन-भर बंधुआ मजदूरी कराते हैं। और लव,कुश ने तो दलित उत्पीड़न की हद ही कर दी उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के दौरान घोड़े के साथ-साथ हनुमानजी को भी पेड़ से लटका दिया था ...... अतः है प्रभु होशियार रहिये। अपनी जाति से प्रेम अवश्य करें लेकिन जातिवादी न बनियेगा !!!
                            - संजीव शुक्ल

Wednesday, 28 November 2018

💐अभिनय के चलते-फिरते संस्थान💐

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💐"अभिनय के चलते-फिरते संस्थान"💐

   जिनको भी अभिनय सीखना हो,अभिनय की बारीकी सीखनी हो, उन्हें नेताओं के हाव-भाव, उनके क्रियाकलापों पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिए। ये अभिनय के चलते-फिरते सर्वसुलभ संस्थान हैं: बस आपमें सीखने की ललक हो ..... निरपेक्षता और किरदार को जीने की कला तो कोई इनसे सीखे। बड़े-बड़े सी.बी.आई.वाले तक गच्चा खा जाते हैं। इनके भोले,मासूम चेहरे को देखकर वह चकरा जाता है कि गलती किधर से हुई। गलती इनसे हुई या कि हमसे जो इनके खिलाफ़ जांच करने को हामी भर दी। जिसकी जिंदगी भर स्तुति की, चरणवंदना की उसी के विरुद्ध जांच!!!! अरे राम-राम...... वह अपराधबोध में रहते हुए जैसे-तैसे जांच निपटाता है।
  फिल्मों में तो सिर्फ़ अदाकारी होती है, लेकिन राजनीति में बेहतरीन अदाकारी से लोगों को बेवकूफ़ भी बनाया जाता है। फ़िल्म तो तीन घंटे की होती है मगर इनके यहां पूरे पांच साल का शो है और अगर शो सफल रहा तो फिर पांच साल और .... यह उच्चकोटि का अभिनय है। यह अभिनय की मास्टर डिग्री है। झूठ को सच मे तब्दील कर देना मामूली बात नहीं !! अभिनय की सार्थकता भी इसी में है। भई बात तो तब है जब सच को अपने सच होने पर शर्मिंदगी होने लगे। तभी तो बरेलवी साहब को कहना पड़ा कि "वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता"
      यहां झूठ को इतनी प्रामाणिकता के साथ बोला जाता है कि वह अप्रतिम दस्तावेज सा लगने लगता है। दस्तावेजी रंगत देने के लिये हमारे नेता भाई लोग ऐसे में दो-तीन फोटोकॉपी के पन्ने मंच से ही लहराने लगते हैं, ताकि बात बहुत मारक हो जाय, और लगने भी लगता है कि भाईसाब के वे दुर्लभ पन्ने सत्ता की गलियों में हो रही दुरभिसंधियों के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, उनके चश्मदीद गवाह हैं । भले ही उन पन्नों पर घर के दूध का हिसाब लगा हो।
  इधर नेताओं के गले मिलने के हुनर ने अदाकारी में जान फूंक दी है। गले मिलने के तरीकों पर अध्ययन किया जाना चाहिए। सामने वाले को पायरिया हो तो भी सांस रोककर उसके मुंह की तरफ़ अपनी खोपड़ी करके लपक के ऐसे मिलो कि सामने वाले को पता ही न चले कि उसे इस नाम की कोई बीमारी थी भी या नहीं। ऐसी भीषण भावनात्मक  गतिविधि पर भी अगर आदमी उसे अपना मानने की गलती न करे तो वह इंसान नहीं .......  लानत है उसकी इंसानियत पर ....
गले मिलने में अपार संभावनाएं छुपी हैं। यह वशीकरण जैसा है, इस प्रक्रिया में एक अजीब सा सम्मोहन होता है, इसमे प्रेम विवेक पर हावी हो जाता है। और वैसे भी विवेक और प्रेम की तो सनातन दुश्मनी है। कहते हैं न कि प्रेम अंधा होता है। अक्सर लोग प्रेम में ही गच्चा खाते हैं। यह नशीली जैसी चीज है।  जब तक होश आता-आता है तब तक आदमी लुट चुका होता है। जनता भी कई बार लुट चुकी है। लोग बताते हैं कि इससे गिले-शिकवे मिट जाते हैं, लोग पुरानी कही-सुनी बातों को भूल जाते हैं। नेता लोग भी चुनाव के टाइम जनता से गले मिलते हैं। सो जनता भी उनके किये गए वादों को भूलकर उन्हें क्षमा कर  फिर से अपना लेती हैं।
   राजनीति के क्षेत्र में इसका बहुत सुनहरा अतीत रहा है। एक बार अफजल खां ने भी जानबूझकर शिवाजी से गले मिलने की कोशिश की थी लेकिन शिवाजी गले मिलने के खतरे को पहले ही भांप गए और प्रेम में पड़े बग़ैर अफजल का काम तमाम कर दिया।
     मगर कभी-कभी मानवीय दुर्बलता इस अदाकारी पर भारी पड़ जाती है। ऐसी ही एक मानवीय दुर्बलता हुई आँख दबाने की। यह घटना सरे आम हो गयी। हो सकता है यह चुम्बकीय गतिविधि किसी विशिष्ट संदर्भ में कई गयी हो पर जब आप अभिनय के बड़े-बड़े धुरंधरों के सामने मौजूद हों तो ऐसी किसी गलती के लिये आपको क्षमा नहीं किया जायेगा और वैसे भी हमारे समाज मे इस क़ातिलाना इशारेबाजी को बहुत स्वागत-योग्य नहीं माना जाता।
 गले मिलने के बाद आंख दबाना बहुत गलत है, वह भी तब जब आप कैमरे के निगाह में हो। यह बताता है कि आप अभिनय की दृष्टि से सामने वाले कि तुलना में अभी बहुत नौसिखिये हैं .......  वैसे भी जब गंभीर विषयों पर बहस हो रही हो तब ऐसी हरकत करना छिछोरेपना की निशानी है। यह आपकी छिछोरावस्था है !! अगर आपको आंख दबानी ही है तो दोनों दबाइये और बेहिसाब दबाइये जिससे यह घोषित किया जा सके कि आप कोई ऐसी-वैसी हरकत नहीं कर रहे थे बल्कि देश की समस्याओं को लेकर गहन चिंतन में डूब-उतरा रहे थे। इसमें फायदा यह है कि आप लगे हाथ थोड़ी देर सो भी सकते हैं।
 अगर आप यह सब सिख लिये तो यक़ीनन आप एक दिन इस फील्ड में बेमिसाल एक्टर बनेगें। हमारी शुभकामनाएं💐💐
                                      - संजीव शुक्ल

Tuesday, 27 November 2018

बतकही

इधर मैं एक अजीब सी कशमकश में था, एक भीषण अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा था।   दरअसल मैं एक अकबर इलाहाबादी का शेर पोस्ट करना चाह रहा था सोच रहा था कर ही दूँ नहीं तो कोई और कर देगा तो क्या फायदा !! पर असली दुविधा तो यहीं पर थी। मेरे सामने धर्मसंकट और संवैधानिक संकट दोनों आ खड़े हुए। हालांकि दुविधा उनके लिखे हुए शेर को लेकर के नहीं है, शेर तो अच्छा ही है, कुछ सोच करके ही लिखा होगा। मामला दरअसल उनके नाम का है। नाम की अपार महिमा है !!!  जगत में जितने भी उंगली पर गिनाए जा सकने वाले अच्छे काम हुए उनके पीछे नाम की ही प्रेरकशक्ति है। अगर नाम कमाने की इच्छा मर जाये तो आप यकीन मानिए कि अच्छे काम करना बहुत ही कठिन हो जायेगा। एक प्रकार से असंभव। धोखाधड़ी से अच्छे काम हो जाय तो अलग बात है। यह उतना ही कठिन है, जैसे चुनाव लड़ने पर उतारू उम्मीदवार से चुनाव में बैठ जाने के लिए कहना,जैसे चुनावों में उम्मीदवारों के द्वारा जनसेवा के उन्माद में किये गये वायदों को जीतने के बाद उनके द्वारा पूरा कर पाना; जैसे जनता में अफवाह की तरह फैली कबीर की वह जनप्रिय उक्ति "जस की तस धर दीन्ही चुनरिया" को साबित करके दिखा देना। हालांकि कबीरदास जी की बात अलग है। महात्माओं में उनका एक स्तर था, वह बहुत बिगड़ैल स्वभाव के थे। लोग बताते हैं कि वह हर चीज को प्रेस्टिज इश्यू बना लेते थे। 'मसि कागद छुयो नहि कलम गह्यो नहि हाथ की घोषणा करने वाले के लिए क्या असंभव!!  पर हम लोगों के लिए असंभव। जिस सत्ता की चादर को बिछाया जाय,ओढ़ा जाय और न जाने क्या-क्या किया जाय, उसे वैसे ही कैसे रखा जा सकता है। हां, इसे वैसा का वैसा वो ही लोग रख सकते हैं जिन्हें इसे यूज करने का मौका नहीं मिल पाया।
  ख़ैर बात नाम को लेकर के थी। यहां मुख्य समस्या इलाहाबादी के नाम से से है। अब चूंकि इलाहाबाद का नाम इलाहाबाद से बदलकर प्रयागराज हो गया है इसलिए अकबर इलाहाबादी कहने से एक प्रकार से संवैधानिक संकट से आ जाता है और यदि इलाबाद की जगह प्रयागराजी कहता हूं तो बाप- दादा के दिये गए नाम को बदलने का पाप लगता है। यह बहुत बड़ा धर्मसंकट है। यद्यपि परिवर्तन प्रगति का सूचक है और इस नाते नाम मे बदलाव को मैं कई बार स्वीकार कर लेता हूं। पर व्यक्तिगत स्तर पर हर चीज को ले आना हम भारतीयों के स्वभाव में नहीं  जैसे हम लोग ईमानदारी, नैतिक आदर्शों औऱ सद्कर्मों को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं लेते। ये सब श्रीराम शर्मा जी के प्रेरक वाक्यों की तरह दीवारों पर ही ज्यादा अच्छे लगते हैं या फिर श्लोकों की तरह किसी धार्मिक अनुष्ठान,पर्व के अवसर पर उच्चारित किये जाने जैसे। चुनाव चूंकि लोकतांत्रिक पर्व है इसलिए यहां भी इन सदवाक्यों के उच्चारित किये जाने की अघोषित अनुमति रहती है। वैसे भी अभी तक चूंकि व्यक्तिगत स्तर पर नाम बदले जाने की अधिसूचना जारी नहीं हुई है इसलिए यथास्थिति कायम रखते हुए उनके असली नाम से ही उनका यह शेर दे रहा हूं, आंनद लीजिए..........

💐"आपस में अदावत कुछ भी नहीं, लेकिन इक अखाड़ा कायम है।
जब इससे फ़लक का दिल बहले, हम लोग तमाशा क्यों न करें।"💐
                   (अकबर इलाहाबादी)

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