Friday, 27 January 2017

चुनावी दांव-पेंच

सत्ता में भागीदारी हेतु उत्तर प्रदेश में गठबंधन रुपी समर्पण.  ऐतिहासिक राष्ट्रवादी पार्टी की हालत उन यात्रियों जैसी है, जिन्हें  डग्गामारी के चलते गाड़ी में जगह न मिलने पर खड़ा कर दिया जाता है। क्या बात है! चाल, चरित्र, चेहरा कुछ भी अपना नहीं .
संघर्ष से बचते हुए क्या इसे सुविधावादी राजनीति के एक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अस्तित्व की लड़ाई ऐसे तो नही जीती जाती !!!!

Friday, 20 January 2017

राजनीति का एक पहलू यह भी ...

ये सच है कि कुछ गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिध की जाती है पर वह कामयाब नही होती। अब जैसे कि असहिष्णुता के नाम पर काफी बवाल हुआ। जो एक आध घटनाएं घटी वो निःसंदेह निंदनीय है और उनकी भर्त्सना होनी ही चाहिए पर इन पर वितंडावाद खड़ा करना और इन घटनाओं को राष्ट्रीय चरित्र के रूप में व्याख्यायित करना गलत है।  
  तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता के रूप में परिभाषित करने के राजनैतिक निहितार्थ जो भी हो पर समाजिक सद्भाव की दृष्टि से यह घातक मनोवृत्ति है फिर चाहे वह तुष्टिकरण हिंदुओं का हो या मुसलमानो का या फिर किसी और सम्प्रदाय का । सर्वधर्म संभाव ही यहाँ के समाज की मुख्य पूँजी है और विश्वास है गंगा जमुनी तहजीब में। ...........चर्चा अगर होनी है तो सभी मुद्दों पर होनी चाहिए। लेकिन हमारे यहाँ नेता बहुत  चालाकी से उन विषयों पर बहस करने से कतराते है जो धार्मिक मान्यताओं से टकराते हैं।अगर कोई प्रश्न सामाजिक व मानवीय सरोकारों से जुड़ा हुआ है तो क्या उस पर इसलिए बहस नही की जा सकती है कि वह धार्मिक विषय है। तीन तलाक के अगर मानवीय और सामाजिक सरोकार है तो उस पर विमर्श क्यों नही हो सकता ।   धर्म के नाम पर संकीर्णता ठीक नहीं ।अपने राजनैतिक नफा नुकसान को ध्यान में रखकर मुद्दों को उछालना या फिर उनको विमर्श की परिधि से बाहर धकेल देना स्वस्थ मानसिकता का द्योतन नहीं है पर यह भारतीय राजनीति का वर्तमान है। इस सत्तावादी लोलुप प्रवृत्ति पर प्रहार आवश्यक है ।।।

दलों का वर्गीकरण और संभावनाएं

दलों के वर्गीकरण में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। दलों के वर्गीकरण का विस्तार किया जाना चाहिए। अफ़सोस है कि संविधान निर्माता इस मामले में अपनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय सोंच के संकुचित दायरे से आगे नही बढ़ सकेऔर आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके। अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले लोहियावादी, राष्ट्रवादी आदि आदि (सभी उदाहरण देना ठीक नही) जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता।
    आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान केप्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा।  कुछ प्रदेशों में तो आलम ये है कि अगर एक ही परिवार में बाप-बेटे,चाचा-भतीजे में नही बनी तो  लड़ने की इच्छाशक्ति के चलते वह नई पार्टी की नींव रख देते हैं और इस तरह वह  पारिवारिक असहमति को लोकतान्त्रिक स्वरूप देकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं।
जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती।। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि परिवार के लोगों को राजनैतिक रोजगार देने पर लोग-बाग आपत्ति न उठा सकें....... जय परिवारवाद ।

Tuesday, 17 January 2017

चलते-चलते....

चुनाव आयोग का अखिलेश के पक्ष में फैसला... पार्टी नाम और सिम्बल पर अखिलेश गुट का अधिकार स्थापित..... अभी तक पुत्र को अभूतपूर्व मुख्यमन्त्री बताने वाले भूतपूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अब उन्हीं मुख्यमंत्री को गलत साबित कर धुर्वीकरण की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं..... आखिर हो भी क्यों न ऐसा जब माननीय का "बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले" जैसा वर्तमान हो ।।।

एक निग़ाह इधर भी...

तिवारीजी ने पूर्व पार्टीअध्यक्ष को अपने अनुभव से समझाया था कि बेटे से पंगा न लो, वह अपना हक लेकर रहेगा. काहे को जीते-जी बची-खुची मिटाने पर तुले हो और फिर ये आपभी मानते हो कि इस उम्र में गलतियां हो ही जाती हैं.अब हमी को ही देख लीजिये, हमने क्या-क्या जुगत नही भिड़ायी पर कोई फायदा नही।  सैम्पल तक देने से मनाकर दिया था, लाख चिल्लाया कि  इस लड़के की पैदाइस में हमारा कोई हाथ नही,  हमने जो भी किया पार्टी के हित में किया ।पार्टी के हित के लिए हमें जो भी  करना  पड़ेगा हम करेंगे। ... लेकिन खैर ....विधि के विधान के आगे कब किसकी चली है। कोर्ट भी जाने से कोई फायदा नही; वहां भी कोई नही सुनता; कानून के नाम पर बड़ा अत्याचार हुआ अपने पर . हम आज तक ये नही जान पाये कि  हमको वैज्ञानिक  जांच के आधार पर पिता घोषित किया गया या पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर हमारा हाथ होना स्वीकार किया गया.  लेकिन अब जो है सो है......इसलिए समय रहते बेटे का सम्मान करना सीखिये... हम तो सीख लिए.......

Monday, 16 January 2017

बस यूं ही ......

इधर एक खबर बहुत बुरी तरह से वायरल हो रही है कि राहुल जी का कुर्ता फटा हुआ है . वैसे ये अति गोपनीय खबर स्वयं  राहुल गांधी ने ही लीक की है.  ध्यान रहे कि राहुल गांधी का फटा हुआ कुर्ता उनकी गरीबी की वजह से नहीं जैसाकि वो बता रहें हैं, दरअसल उनको एक कुशल बीवी  की जरूरत है जो उनकी देखभाल के साथ-साथ उनको सही राय दे सके और उनको यह समझा सके कि उनकी तथाकथित गरीबी की वजह कुछ व्यवस्थागत पारिवारिक कमियां (यह अलग बात है यहाँ परिवार को राजनैतिक भाषा में लोग बाग पार्टी कह देते हैं)  हैं. और हाँ वह यह भी ताकीद कर सके कि भाषण देते समय जोश में आकर जोर से अपना हाथ कुर्ते की जेब  में न घुसेडें, कुर्ते की जेब फटने की एक वजह ये भी हो सकती है। भाई हाथ को हाथ ही रहने दो,चुनाव चिन्ह न बनाओ।

Thursday, 12 January 2017

रचनाकार: गोपालदास "नीरज"

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।