Monday, 22 July 2019

या ते नीचे नैन

""या ते नीचे नैन""😊

 एक बार रहीमदास जी से किसी ने पूछा कि आप दान देते समय नजरें नीची क्यों कर लेते हैं, तो जवाब में रहीमदास जी ने एक दोहा पढ़ दिया।चूँकि रहीमदास जी जाने-माने कवि थे, सो उन्होंने कविता में जवाब देने का निर्णय लिया। दोहा यह था --
" देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन-रैन।
लोग भरम हम पर धरैं, या ते नीचे नैन"
 कहने का मतलब यह था कि देने वाला तो कोई और है, जो रात-दिन भेजता रहता है, पर लोग भ्रमवश हमको दाता समझ रहें हैं बस इसीसे संकोचवश नयन नीचे हैं। लोग-बाग रहीम जी की दानवीरता की जय-जयकार करते नहीं थकते थे। पर रहीमदास जी किसी भी प्रकार के अतिरिक्त सम्मान लेने के सख़्त खिलाफ़ थे। सामान्य व्यवहार में इसे विनम्रता कहते हैं। ऐसे लोग अपना सारा श्रेय दूसरे को दे डालते हैं। बड़े लोग ऐसा ही करते हैं। रहीमदास जी भी बड़े लोगों में से थे, इसलिए दान देते समय उनका नजरें नीची  रखना, बनता था।  निश्चित रुप से यह उनकी विनम्रता ही रही होगी, पर व्यवहारिक दृष्टि से उनका ऎसा करना कतई ठीक नहीं था। भई ऐसे में सबसे बड़ा जो ख़तरा होता है वह यह कि धूर्त आदमी आपकी नीची निगाहों का फ़ायदा उठाकर कई बार आपके सामने आकर आपसे अशर्फियाँ झीट लेगा और आप जान भी न पाऐंगे।
  बताते चलें कि रहीम जी को दान देने का बहुत शौक़ था। पैदाइशी रहा होगा ये शौक़ या यह भी हो सकता है कि शुरुआत में एक-आध बार दान देने पर उनको उसका अच्छा रिस्पॉन्स मिला होगा, लोगों ने वाहवाही की होगी, अच्छे कमेंट्स आए होंगे, तो उन्होंने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया होगा। ठीक वैसे ही जैसे आजकल फेसबुक पर मिलने वाले लाइक्स व कमेंट्स से प्रेरित होकर लोग रोज़ लिखने में हाथ साफ करते हैं।
 हाँ, तो रहीमदास जी तो अपनी आदत से मजबूर थे। उनकी और आदतों का तो पता नहीं, पर दान देने की आदत ने उनको बहुत परेशान किया। वैसे इस आदत ने बहुतों की नाश पढ़ी है। दानी कर्ण सब कुछ जानते हुए भी अपना जीवन रक्षक कवच-कुण्डल दान कर दिया। राजा बलि का भी यही हाल हुआ। किस-किस का नाम लिया जाय!!  रहीमदास जी भी जिनका कि बाद में अपने बॉस से बिगाड़ हो गया था जिसके कारण उनको राज्य निकाला दे दिया गया। वह महल से सड़क पर आगये पर माँगने वालों ने तब भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। हारकर उनको कहना ही पड़ा कि भाई अब क्या हमारी जान लोगे? उन्होंने कहा भी है "वे रहीम अब नाहिं"।
  हालांकि नई पीढ़ी के लोग समझदार हैं। वे 'दान' के इस ख़राब इतिहास से सबक लेकर अब ख़ासा एहतियात बरतने लगे हैं। वो बड़ा सोच-समझकर दान करते हैं ताकि उन्हें दान की आदत न लगने पाए। कुछ लोगों ने तो दान देना ही बिलकुल बंद कर दिया है। तो कुछ लोग टोटका कर के दान देने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ लोग दान (सरकारी अनुदान में) देने के एवज में कुछ धनराशि सुविधा-शुल्क के नाम पर ले लेते हैं ताकि  इसे पूरी तरह से 'दान' न कहा जा सके और इसके दुष्प्रभाव से बचा जा सके। अधिकारी, कर्मचारी व नेताओं द्वारा कुछ दिये जाने के बदले में जो नाममात्र का परसेंटेज लिया जाता है, वह और कुछ नहीं सिर्फ़ टोटका ही है। जैसे कि कुछ भाई लोग(सब नहीं) सांसद-निधि, विधायक-निधि से वांछित राशि देते समय इसका कुछ हिस्सा "दान" के नाम के दुष्प्रभाव की काट के लिए वापस ले लेते हैं।
  कुछ लोगों को लग सकता है कि ये तथाकथित माननीय लोग  बहुत घमंडी और स्वार्थी होते हैं, पर ऐसा कतई नहीं है। ये लोग बहुत विनम्र होते हैं। साथ ही दानी होने का दंभ तो बिलकुल पालते ही नहीं। उल्टे माननीयगण तो अपनी पहचान छुपाने की कोशिश करते हैं। आप किसी भी चुनाव में देख लीजिये हमारे जनप्रिय उम्मीदवार पैसे बांटने के लिये रात का चुनाव करते हैं ताकि कोई जान न पाये। निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसे दानियों की खोज कर सम्मानित करने की सारी कवायद धरी की धरी रह जाती है ...... कौन करेगा ऐसा गुप्त दान !!!!  वह भी आज के जमाने में। "नेकी कर दरिया में डाल" का जितना पवित्र भाव यहां दिखता है अन्यत्र दुर्लभ है। इस मामले में ख़ैर हमें इनकी तारीफ़ करनी होगी, अन्यथा हमारे माननीय जो अर्थी तक में जाते समय मीडिया को ले जाने की हसरत रखते हों, क्या इस पुण्य कार्य मे मीडिया को नहीं ले जा सकते हैं ?????? लेकिन नहीं दान का क्या प्रचार करना !!
  इस प्रजाति के अलावा एक और प्रजाति है,जो अर्थदान तो नहीं करती पर हाँ, जनता को उनके जरूरी कामों में सुविधा उपलब्ध कराकर 'सेवा दान' देती है। अब यह अलग बात है कि बदले में कृतकृत्य हुए लोग जबरदस्ती कुछ न कुछ उनके हाथों पर रख जाते हैं।  आप आश्चर्य करेंगे कि "नयन नीचे करने" के संदर्भ में यह प्रजाति भी रहीमदास जी को अक्षरशः फॉलो करती है। यह प्रजाति जो लगभग हर ऑफिस में खरपतवार की तरह पाई जाती है, का कहना है कि नयन तो हमारे भी नीचे हो जाते हैं। अब हम कहें तो किससे कहें ??? उसका कहना है कि देनेवाला तो कोई और है जो दिन-रात लोगों के माध्यम से रूपया-पैसा भेजता रहता है, पर लोग हम पर शक करते हैं कि यही आदमी पैसा ले रहा है।  हम क्या करें, कहां जाएं????
    बस याते नीचे नैन🙏

                       -संजीव शुक्ल

Saturday, 22 June 2019

आठवले को नमन 🙏🙏

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अठावले को नमन🙏

अपनी कविता से तुकबंदी साहित्य को शिखर पर ले जाने वाले काव्य-जगत के कोहिनूर श्री अठावले अब भारतीय लोकतंत्र को भी ऊँचाईयों पर ले जाएंगे। लोकतंत्र को ऊँचाईयों पर ले जाने की एक तरह से उन्होंने ज़िद पकड़ ली है और जब उन्होंने ज़िद पकड़ ही ली है तो फ़िर इसमें हम-आप क्या कर सकते हैं?? आप कई गुणों को धारते हैं, उदाहरण के तौर पर आप  हवा के रुख के आधार पर भावी सत्ता-समीकरणों का पता लगा लेते हैं। बिल्कुल रडार समझिए इन्हें, बस बादल बीच में न फटै। आप दलों के मोह-जाल से परे सिर्फ़ एक परमतत्व 'सत्ता' के उपासक हैं। इस तरह दलों के मामले में आपको विदेह कहा जा सकता है। इनको देखकर के पूरी की पूरी पीढ़ी दो तरह से प्रेरित हुई;  ख़ासतौर से नए लौड़े-लपाड़े दुःसाहस की सीमा तक आशावादी हो गए हैं।  प्रेरणा का एक क्षेत्र तो उन लोगों का है जो बहुत चाह करके भी कविता नहीं रच पा रहे थे क्योंकि उन्हें लिखने-पढ़ने और कविता रचने के बेसिक फार्मूलों को जानने से हमेशा से ही परहेज रहा है,सो उनके लिये कविता लिखना एक दुर्लंघ्य पहाड़ जैसा था जिस पर चढ़ने के अपने ख़तरे थे, सो यह काम उन्होंने दूसरों के लिये रख छोड़ा था। खुद आप नीचे खड़े होकर ताली बजाते थे।
 क्या यह साहित्यिक अत्याचार का विषय नहीं है कि दोहा, चौपाई, सोरठा और छंदों की मात्रा आदि की दुरूहता ने पता नहीं कितने लोगों को कवि बनने से रोका ?? कितनों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ताला जड़ दिया ??  ऐसा करके हमने साहित्यिक जगत में एक शून्यता पैदा कर दी है। हमने ज्ञानपीठ हड़पने वालों की एक रचनाधर्मी-नस्ल ही  ख़तम कर दी ।
 पर अब ऐसा नहीं है। अठावले को देखकर प्रेरित पीढ़ी की रचनाधर्मिता बल्लियों उछाल मार रही है। अब वह इस फील्ड में भी अन्य कवियों से दो-दो हाथ करने पर उतारू है। प्रेरित पीढ़ी के लोगों का विश्वास है कि 'बलम पिचकारी' टाइप के गाने तो हम भी लिख सकते हैं। वो खुद में भविष्य का मजरूह सुल्तानपुरी बनने की संभावनाएं देखने लगें हैं।
   अब आते हैं प्रेरणा के दूसरे क्षेत्र में। दूसरा क्षेत्र राजनीति का था, जहाँ जनसेवा का शुष्क भावक्षेत्र उनको उसमें जाने से रोकता था। कई बार हवा के रुख़ को भाँपने में माहिर खिलाड़ी भी इसी जनसेवा के चक्कर में राजनीति में पैर आगे नहीं बढ़ा सकें। कुछ लोग आत्मप्रगति की भावना से आगे बढ़े भी तो लोकलाज तथा देश के कानून ने उन्हें बहुत आगे तक जाने न दिया। ख़ैर अब अठावले और उन जैसे और बावलों ने हया की यह दीवार गिरा दी। इनसे प्रेरित होकर अब नए लड़के-लड़कियां हवा के रुख़ को भाँपकर सत्ता समीकरणों को साधने का प्रशिक्षण लेने लगे हैं। इसमें पीढ़ियों तक के संवर जाने की व्यवस्था है। इस क्षेत्र में प्रगति की अपार संभावनाऐं हैं जो अब उनको बेचैन करने लगीं हैं। वह 'उठो, जागो और आगे बढ़ो' में विश्वास करने लगे हैं।
अठावले की इस प्रतिभा और योगदान के प्रति हम सभी नमित हैं।
 वास्तव में, राजनीति के ऐसे संतों, जो हवा के रुख़ को देखकर पाला बदलने में माहिर हों, को शत-शत नमन !!! विनम्र श्रद्धांजलि ऐसे रहनुमाओं को💐💐
                         --  संजीव शुक्ल

Monday, 3 June 2019

नमामि घोटाले

घोटाले निराकार, निर्गुण होते हैं। वो ईश्वर की भांति होते हैं। जिस तरह ईश्वर होता तो है पर दिखाई नही देता, ठीक उसी तरह घोटाले होते तो हैं पर दिखते नहीं।
                                  - संजीव शुक्ल

Wednesday, 30 January 2019

पुरस्कारों का दुत्कारीकरण

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इधर हम भारतीयों में एक सकारात्मक बदलाव आया है, वह है पुरस्कारों का दिल खोलकर देना। अब वो दिन लद गए जब पुरस्कार पाना ईश्वर को पाने जैसा था। अब ट्रेंड बदल गया है, पुरस्कार कम पड़ जाते हैं मगर देने का दिल नहीं भरता। यश भारती को ही ले लीजिए, कौन कमबख़्त बचा?? पर दुर्भाग्य से इस उदार ट्रेंड के युग मे भी एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है और वह है पुरस्कार लेने से मना कर देना। यह दुःखद है। ऐसे लोग हर मामले में टांग अड़ाते रहते हैं और कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं, विशेषकर पुरस्कार ग्रहण करने को लेकर यह दुत्कारीकरण दिनोंदिन बढ़ रहा है।
    कुछ लोग स्वभावतः बहुत आड़े-तिरछे होते हैं। "तुम अगर दिन को रात कहो, रात कहेंगे" से ठीक उलट। इनसे अगर आप पूरब की तरफ चलने को कहेंगें तो यक़ीन मानिये साहब पश्चिम को ही जायेंगे। और ऐसे लोगों को अगर आप सम्मान देने की कोशिश करेंगे तो वह पचास कोने का मुंह बनाकर सम्मान लेने से साफ़ मना कर देंगे। वह डायलॉग मारेंगे कि हम प्रशस्ति-पत्र लेते नहीं, देते हैं .....कहने का मतलब वो आपको आपके व्यक्ति-चुनाव के निर्णय पर गर्व करने का कभी-कोई मौका नहीं देंगे।  यह पूरी की पूरी खेप अहम ब्रम्हास्मि की गर्जनात्मक धारणा में विश्वास करती है।
पुरस्कार के मामले ऐसे लोग बहुत ही चूज़ी होते हैं। अब पद्मश्री से चयनित इन्हीं मोहतरमा को ही देखिए, नाम है गीता मेहता, आपने पद्मश्री लेने से साफ़ इंकार कर दिया।  कोई बता रहा था कि नवीन पटनायक की रिश्तेदार हैं, हालांकि यह कोई सम्मान पाने की निर्धारित पात्रता नहीं है, हां अतिरिक्त योग्यता जरूर है। योग्य तो होंगी ही... ख़ैर, बात की बात होती है, कह दिया सो कह दिया। लोग पुरस्कार पाने की लिस्ट में अपना नाम डलवाने के लिए क्या-क्या नहीं करते और इन मैडम को मिला है, तो इनको चहिये नहीं। वैसे कुछ लोग इसलिए मना कर देते हैं ताकि लोग उनको जाने ..... उनकी खुद्दारी को पहचाने।
  पुरस्कार वापसी की घोषणा करने के बाद से ही ये आदरणीया भी रातोंरात लोगों की निगाह में चढ़ गयीं। लोग-बाग खोजी पत्रकारिता पर उतर आए। वो जानकारी जुटा रहे थे कि आखिर इन मैडम ने ऐसा क्या कर दिया कि सरकार उनको पद्म पुरस्कार देने पर अड़ गयी।  ये लोग बहुत घटिया टाइप के लोग होते हैं जो सरकार की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। अरे सरकार को क्या इतना अधिकार नहीं कि वो किसी को सम्मानित कर सके। भई, उसके लिए क्या असम्भव!!! ..."जासु कृपा सो दयाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन".......

    पर मैडम जी को ये न करना था...अरे ये तो साहब की सदाशयता है कि वो पुरस्कारों के निर्धारित कड़े मानकों को अत्यंत ढीला करके उसे सांत्वना पुरस्कार की हद तक ले आये। मग़र वही है ना कि जितना करो उतने ही नखरे!! ऐसा नहीं कि सिर्फ़ आपने ही ऐसा किया और भी कई लोगों ने सम्मान की बेकदरी की है। यह प्रवृत्ति इधर एक-आध दशक से घातक रूप से फल-फूल रही है।
    ऐसे लोग प्रथमतः तो पुरस्कार लेते नहीं और अगर धोखे से ले भी लिया तो कभी भी वापस कर सकते हैं साथ ही जितने दिन पुरस्कार अपने पास रखा उतने दिन की रखवाई का पैसा भी मांग सकते हैं।  कुछ दिनों पहले देश में फैली  असहिष्णुता के खिलाफ़ थोक भाव में सम्मान वापसी का अभियान चला। इस अभियान के दौरान ही देशवासियों को पहली बार पता चला कि हमारे देश में इतने सम्मानित लोग हैं। कई भाई लोग तो एक ही सम्मान की चार-चार फोटोकॉपी कराकर और अपने सात-आठ पुरस्कार बताकर पुरस्कार वापसी के उत्सव में अखबार में अपनी फ़ोटो छपा लिए
......... बिल्कुल अब हम तो सफ़र करते हैं वाली स्टाइल में !!
कुछ लोग तो पुरस्कार लेने के लिए जुगाड़ ही सिर्फ़ इसलिए लगाते हैं ताकि समय आने पर वह इसे ससम्मान वापस कर सकें। ये लोग "एक हाथ सम्मान दो और दूसरे हाथ सम्मान वापस करो" की विचारधारा में विश्वास रखते हैं। इसलिए आपको सम्मान लेना जरूर चाहिए,फिर भले ही आप वापस कर दें। ये सम्मान की लाज है

    अरे सरकार अगर आपको जिंदा रहते सम्मानित कर रही है, वह भी सम्मान से उसका सम्मान छीनकर,  कम-से-कम तब तो आपको उसकी पवित्र भावना का सम्मान करना चाहिए। आज की इस गलाकाट प्रतियोगिता में सम्मान कहाँ सबको नसीब होता है। पहले जब मरणोपरांत पुरस्कार देने का चलन था तब की सोचिये, भाई लोगों के दिल पर क्या गुजरती होगी !!! उस समय जिंदा रहना पुरस्कार के लिए घोर अपात्रता मानी जाती थी। बहुत से लोग जो  सरकार के अंदर घुसकर अंदर तक देख आये और जब कहीं-कोई पुरस्कार मिलने की सुगबुगाहट नहीं मिली तो मरने में ही बेहतरी समझी पर पुरस्कार नहीं छोड़ा।
   इसलिए सम्मान की बेकद्री ठीक नहीं। और जो लोग ऐसा करने में अपनी शेखी समझते हैं उन्हें समझना चाहिए कि घमंड तो रावण का नहीं चला तो आप किस खेत की मूली हैं!! आप तो अभी रावण का दसवां हिस्सा भी नहीं बन पाए

Saturday, 26 January 2019

ईवीएम का जिन्न

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ये दावा कि EVM गलत है तो फ़िर उसे साबित क्यों नहीं करते। सिर्फ़ आरोप लगाने से आपकी हैसियत में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं होने वाला। आरोप चुनाव जीतने के हथकंडे तो हो सकते हैं,जैसा कि हर चुनावों में होता भी है, पर ये आरोप हमेशा नैय्या पर लगाएगें ऐसा संभव नहीं। क्योंकि अगर आप किसी पर आरोप लगाते हैं तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। मिथ्या आरोप लगाकर आप किसी को बार-बार बेवकूफ़ नहीं बना सकते ।  पिछले चुनाव में वाड्रा पर तमाम आरोप लगाए गए, पर उन आरोपों की परिणति क्या रही?? अगर दोषी हैं तो उन्हें जेल क्यों नहीं भेजा गया उसके लिए किसके दिशा-निर्देशों की प्रतीक्षा की जा रही थी?? सत्ता मिलने के बाद गलबहियों का खेल ........ क्या सत्ता में रहने के बाद आप फिर से इन्हीं आरोपों को दुहरायेंगे, जबकि आप आरोपी व्यक्ति की जांच करवाकर उसे जेल भिजवा सकते थे।
  निश्चित रूप से  चुनाव निष्पक्ष होने ही चाहिये क्योंकि चुनाव लोकमत की अभिव्यक्ति के साधन हैं और इस पर आई हुई आंच लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को खण्डित कर देगी। पर ये नहीं चलेगा कि जहां हम जीतें वहां ठीक और जहां हारें वहां EVM गड़बड़। बाकी जगह यदि टेक्नोलॉजी को हाथोंहाथ लेने की होड़ है तो फ़िर चुनाव के मामले में बैलटपेपर के प्रति इतना आग्रह क्यों? आखिर यह प्रतिगामी रवैय्या क्यों ? यह तो ट्रेन के युग मे बैलगाड़ी से चलने वाली बात हुई
राजीव गांधी तकनीकी प्रगति के पक्षधर थे और अब उन्ही की पार्टी के नेता EVMके बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने का राग अलाप रहे है.अब इसे क्या कहें, प्रतिगामी मानसिकता या फिर सुविधावादी राजनीति की पक्षधरता। अपनी हार की असली वजहों को जानने के बजाय EVM में हार को तलाश करना दर्शाता है कि कांग्रेस अभी भी सकारात्मक राजनीति की इच्छुक नहीं है।
  कांग्रेस को अपने  ही दल के उन नेताओं पर गौर करना चाहिए जो दिग्भ्रमित पार्टी को सही दिशा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, अन्यथा  पार्टी को अपने इतिहास पर गर्व करते-करते  खुद ही इतिहास की विषयवस्तु बनते देर नही लगेगी ........

Saturday, 12 January 2019

चुनाव सिर्फ चुनाव है युद्ध नहीं

लोकतांत्रिक चुनाव को पानीपत के युद्ध से जोड़ना बताता है कि चुनावी हार का भय मन में बहुत गहरे से पैठ गया है। गुलाम हो जाने का भय दिखाकर स्वयं के लिये सत्ता सुरक्षित करने का उपक्रम नितांत अवसरवादिता है जो असुरक्षा के भाव बोध से जन्मा है। अगर यह असुरक्षा का भावबोध नहीं है, तब तो ऐसी आक्रामक भाषा सर्वथा निंदनीय है। हालांकि यह शब्दावली भले ही पूर्व में किसी दल के नेतृत्व ने उपयोग न की हो, पर भाव रूप में यह प्रवृत्ति विद्यमान रही है। अधिकांश दलों में अधिकांश अवसरों पर ऐसी प्रवृत्ति वर्तमान रही है और यह कोई नई चीज नहीं पर नग्न रूप में ऐसा कह ले जाना बड़े कलेजे का काम है। भाषा की अपनी गरिमा होती है। अगर आप अपने ही दल के शीर्षस्थ नेताओं से वाणी-संयम की कला सीख लें तो ऐसी स्थितियां उत्पन्न न हों। क्या कोई इस तरह की भाषा-शैली की उम्मीद सुषमा स्वराज या जोशी जी से कर सकता है, कतई नहीं। उनका भाषा स्तर ऐसा हो ही नही सकता। अटल जी तो तब भी ऐसी भाषा नही बोले जब अपार जनसमर्थन के बावजूद वो संसद में एक वोट से पराजित हो गए थे,जबकि विरोध में वोट डालने वाले वह माननीय सदस्य महोदय तकनीकी स्तर पर ही पर  ऐसा करने के लिए अधिकृत हुए थे, विशुद्ध नैतिक स्तर पर नहीं। यह भाषा संस्कार था .....राजनीतिक मर्यादा का पालन था .. राजधर्म का निर्वहन था। पर जब कोई स्वयं को स्वयम्भू से कम न माने तो वह क्यों किसी से सीखे।
  'गुलाम हो जाने का डर' ......आखिर यह लोकतंत्र है या राजतंत्र। ये लोकतांत्रिक व्यवहार बताता है कि हम एक विशाल लोकतंत्र होने के बावजूद लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में अभी तक जी न पाए। खेद है कि हमने लोकतंत्र को सत्ता-परिवर्तन का ज़रिया ही समझा, व्यवस्था-परिवर्तन का नहीं।  यह  राजनीतिक सन्निपात की अवस्था है।

Friday, 28 December 2018

मुक्तिबोध की संवेदना

आधुनिक हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध बहुत ही उल्लेखनीय कवि हैं। फैंटेसी का जितना अद्भुत प्रयोग आपने किया उतना और किसी ने नहीं। मुक्तिबोध भावनाओं के ही नहीं संभावनाओं के भी कवि हैं, उनका लेखन सकारात्मक बदलाव लाने की शुभेच्छा से प्रेरित है। वे कवि हैं, जनवादी चेतना के। वह प्रतीकों और बिम्बों की भाषा बोलते हैं और उस भाषा के जरिये वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर चोट करते हैं। यहां बिंब और प्रतीक कथ्य को आश्चर्यजनक तरीके से विचारोत्तेजक बनाते हैं और यही मुक्तिबोध के लेखकीय कौशल की सार्थकता है।लोकतंत्र में जिन खतरों को लेकर वह आशंकित थे, वो आज समक्ष हैं। उनकी एक बहुत ही चर्चित कविता है- 'अंधेरे में', यह बहुत बड़ी कविता है। यद्यपि यह कविता स्वतंत्रता के पश्चात नेहरू युग के काल खंड से जुड़ी है तथापि इस रचना का दृष्टि विस्तार उसी कालखंड तक सीमित नहीं है। कविता में उन परिस्थितियों, प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को अलोकतांत्रिक बनाने पर तुली हैं। वह तत्कालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के सतहीपन को बेनकाब करते हैं। यह जनवादी चेतना का आत्मकेंद्रित सत्ता के विरुद्ध एक तरह से विद्रोह है और आग्रह है यह लोकधर्मी चेतना का सुशासन हेतु।
     नेहरू के मॉडल की निर्मम आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने, उन्हीं नेहरू की मृत्यु पर  बहुत दुःखी होकर कहा कि लोकतंत्र के लिए अब ख़तरा और बढ़ गया है....
    आइये इस ऐतिहासिक कविता की कुछ पंक्तियां देखें...

"अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक"

विशुद्ध बुद्धिवाद और घोर आत्मकेंद्रीकता को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं कि--

 "ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,
बन गये पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य--त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य--मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए, फँस गये,
अपने ही कीचड़ में धँस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम..."

   और वे यहीं नहीं रुकते वह सामाजिक दायित्व का गम्भीर सवाल भी खड़ा करते हैं  ---

"वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’
  इस तरह मुक्तिबोध सम्पूर्ण मानव समाज की चिंताओं से सरोकार रखने वाले एक बहुत ही संवेदनशील दार्शनिक कवि हैं।।