Wednesday, 30 January 2019

पुरस्कारों का दुत्कारीकरण

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इधर हम भारतीयों में एक सकारात्मक बदलाव आया है, वह है पुरस्कारों का दिल खोलकर देना। अब वो दिन लद गए जब पुरस्कार पाना ईश्वर को पाने जैसा था। अब ट्रेंड बदल गया है, पुरस्कार कम पड़ जाते हैं मगर देने का दिल नहीं भरता। यश भारती को ही ले लीजिए, कौन कमबख़्त बचा?? पर दुर्भाग्य से इस उदार ट्रेंड के युग मे भी एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है और वह है पुरस्कार लेने से मना कर देना। यह दुःखद है। ऐसे लोग हर मामले में टांग अड़ाते रहते हैं और कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं, विशेषकर पुरस्कार ग्रहण करने को लेकर यह दुत्कारीकरण दिनोंदिन बढ़ रहा है।
    कुछ लोग स्वभावतः बहुत आड़े-तिरछे होते हैं। "तुम अगर दिन को रात कहो, रात कहेंगे" से ठीक उलट। इनसे अगर आप पूरब की तरफ चलने को कहेंगें तो यक़ीन मानिये साहब पश्चिम को ही जायेंगे। और ऐसे लोगों को अगर आप सम्मान देने की कोशिश करेंगे तो वह पचास कोने का मुंह बनाकर सम्मान लेने से साफ़ मना कर देंगे। वह डायलॉग मारेंगे कि हम प्रशस्ति-पत्र लेते नहीं, देते हैं .....कहने का मतलब वो आपको आपके व्यक्ति-चुनाव के निर्णय पर गर्व करने का कभी-कोई मौका नहीं देंगे।  यह पूरी की पूरी खेप अहम ब्रम्हास्मि की गर्जनात्मक धारणा में विश्वास करती है।
पुरस्कार के मामले ऐसे लोग बहुत ही चूज़ी होते हैं। अब पद्मश्री से चयनित इन्हीं मोहतरमा को ही देखिए, नाम है गीता मेहता, आपने पद्मश्री लेने से साफ़ इंकार कर दिया।  कोई बता रहा था कि नवीन पटनायक की रिश्तेदार हैं, हालांकि यह कोई सम्मान पाने की निर्धारित पात्रता नहीं है, हां अतिरिक्त योग्यता जरूर है। योग्य तो होंगी ही... ख़ैर, बात की बात होती है, कह दिया सो कह दिया। लोग पुरस्कार पाने की लिस्ट में अपना नाम डलवाने के लिए क्या-क्या नहीं करते और इन मैडम को मिला है, तो इनको चहिये नहीं। वैसे कुछ लोग इसलिए मना कर देते हैं ताकि लोग उनको जाने ..... उनकी खुद्दारी को पहचाने।
  पुरस्कार वापसी की घोषणा करने के बाद से ही ये आदरणीया भी रातोंरात लोगों की निगाह में चढ़ गयीं। लोग-बाग खोजी पत्रकारिता पर उतर आए। वो जानकारी जुटा रहे थे कि आखिर इन मैडम ने ऐसा क्या कर दिया कि सरकार उनको पद्म पुरस्कार देने पर अड़ गयी।  ये लोग बहुत घटिया टाइप के लोग होते हैं जो सरकार की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। अरे सरकार को क्या इतना अधिकार नहीं कि वो किसी को सम्मानित कर सके। भई, उसके लिए क्या असम्भव!!! ..."जासु कृपा सो दयाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन".......

    पर मैडम जी को ये न करना था...अरे ये तो साहब की सदाशयता है कि वो पुरस्कारों के निर्धारित कड़े मानकों को अत्यंत ढीला करके उसे सांत्वना पुरस्कार की हद तक ले आये। मग़र वही है ना कि जितना करो उतने ही नखरे!! ऐसा नहीं कि सिर्फ़ आपने ही ऐसा किया और भी कई लोगों ने सम्मान की बेकदरी की है। यह प्रवृत्ति इधर एक-आध दशक से घातक रूप से फल-फूल रही है।
    ऐसे लोग प्रथमतः तो पुरस्कार लेते नहीं और अगर धोखे से ले भी लिया तो कभी भी वापस कर सकते हैं साथ ही जितने दिन पुरस्कार अपने पास रखा उतने दिन की रखवाई का पैसा भी मांग सकते हैं।  कुछ दिनों पहले देश में फैली  असहिष्णुता के खिलाफ़ थोक भाव में सम्मान वापसी का अभियान चला। इस अभियान के दौरान ही देशवासियों को पहली बार पता चला कि हमारे देश में इतने सम्मानित लोग हैं। कई भाई लोग तो एक ही सम्मान की चार-चार फोटोकॉपी कराकर और अपने सात-आठ पुरस्कार बताकर पुरस्कार वापसी के उत्सव में अखबार में अपनी फ़ोटो छपा लिए
......... बिल्कुल अब हम तो सफ़र करते हैं वाली स्टाइल में !!
कुछ लोग तो पुरस्कार लेने के लिए जुगाड़ ही सिर्फ़ इसलिए लगाते हैं ताकि समय आने पर वह इसे ससम्मान वापस कर सकें। ये लोग "एक हाथ सम्मान दो और दूसरे हाथ सम्मान वापस करो" की विचारधारा में विश्वास रखते हैं। इसलिए आपको सम्मान लेना जरूर चाहिए,फिर भले ही आप वापस कर दें। ये सम्मान की लाज है

    अरे सरकार अगर आपको जिंदा रहते सम्मानित कर रही है, वह भी सम्मान से उसका सम्मान छीनकर,  कम-से-कम तब तो आपको उसकी पवित्र भावना का सम्मान करना चाहिए। आज की इस गलाकाट प्रतियोगिता में सम्मान कहाँ सबको नसीब होता है। पहले जब मरणोपरांत पुरस्कार देने का चलन था तब की सोचिये, भाई लोगों के दिल पर क्या गुजरती होगी !!! उस समय जिंदा रहना पुरस्कार के लिए घोर अपात्रता मानी जाती थी। बहुत से लोग जो  सरकार के अंदर घुसकर अंदर तक देख आये और जब कहीं-कोई पुरस्कार मिलने की सुगबुगाहट नहीं मिली तो मरने में ही बेहतरी समझी पर पुरस्कार नहीं छोड़ा।
   इसलिए सम्मान की बेकद्री ठीक नहीं। और जो लोग ऐसा करने में अपनी शेखी समझते हैं उन्हें समझना चाहिए कि घमंड तो रावण का नहीं चला तो आप किस खेत की मूली हैं!! आप तो अभी रावण का दसवां हिस्सा भी नहीं बन पाए

Saturday, 26 January 2019

ईवीएम का जिन्न

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ये दावा कि EVM गलत है तो फ़िर उसे साबित क्यों नहीं करते। सिर्फ़ आरोप लगाने से आपकी हैसियत में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं होने वाला। आरोप चुनाव जीतने के हथकंडे तो हो सकते हैं,जैसा कि हर चुनावों में होता भी है, पर ये आरोप हमेशा नैय्या पर लगाएगें ऐसा संभव नहीं। क्योंकि अगर आप किसी पर आरोप लगाते हैं तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। मिथ्या आरोप लगाकर आप किसी को बार-बार बेवकूफ़ नहीं बना सकते ।  पिछले चुनाव में वाड्रा पर तमाम आरोप लगाए गए, पर उन आरोपों की परिणति क्या रही?? अगर दोषी हैं तो उन्हें जेल क्यों नहीं भेजा गया उसके लिए किसके दिशा-निर्देशों की प्रतीक्षा की जा रही थी?? सत्ता मिलने के बाद गलबहियों का खेल ........ क्या सत्ता में रहने के बाद आप फिर से इन्हीं आरोपों को दुहरायेंगे, जबकि आप आरोपी व्यक्ति की जांच करवाकर उसे जेल भिजवा सकते थे।
  निश्चित रूप से  चुनाव निष्पक्ष होने ही चाहिये क्योंकि चुनाव लोकमत की अभिव्यक्ति के साधन हैं और इस पर आई हुई आंच लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को खण्डित कर देगी। पर ये नहीं चलेगा कि जहां हम जीतें वहां ठीक और जहां हारें वहां EVM गड़बड़। बाकी जगह यदि टेक्नोलॉजी को हाथोंहाथ लेने की होड़ है तो फ़िर चुनाव के मामले में बैलटपेपर के प्रति इतना आग्रह क्यों? आखिर यह प्रतिगामी रवैय्या क्यों ? यह तो ट्रेन के युग मे बैलगाड़ी से चलने वाली बात हुई
राजीव गांधी तकनीकी प्रगति के पक्षधर थे और अब उन्ही की पार्टी के नेता EVMके बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने का राग अलाप रहे है.अब इसे क्या कहें, प्रतिगामी मानसिकता या फिर सुविधावादी राजनीति की पक्षधरता। अपनी हार की असली वजहों को जानने के बजाय EVM में हार को तलाश करना दर्शाता है कि कांग्रेस अभी भी सकारात्मक राजनीति की इच्छुक नहीं है।
  कांग्रेस को अपने  ही दल के उन नेताओं पर गौर करना चाहिए जो दिग्भ्रमित पार्टी को सही दिशा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, अन्यथा  पार्टी को अपने इतिहास पर गर्व करते-करते  खुद ही इतिहास की विषयवस्तु बनते देर नही लगेगी ........

Saturday, 12 January 2019

चुनाव सिर्फ चुनाव है युद्ध नहीं

लोकतांत्रिक चुनाव को पानीपत के युद्ध से जोड़ना बताता है कि चुनावी हार का भय मन में बहुत गहरे से पैठ गया है। गुलाम हो जाने का भय दिखाकर स्वयं के लिये सत्ता सुरक्षित करने का उपक्रम नितांत अवसरवादिता है जो असुरक्षा के भाव बोध से जन्मा है। अगर यह असुरक्षा का भावबोध नहीं है, तब तो ऐसी आक्रामक भाषा सर्वथा निंदनीय है। हालांकि यह शब्दावली भले ही पूर्व में किसी दल के नेतृत्व ने उपयोग न की हो, पर भाव रूप में यह प्रवृत्ति विद्यमान रही है। अधिकांश दलों में अधिकांश अवसरों पर ऐसी प्रवृत्ति वर्तमान रही है और यह कोई नई चीज नहीं पर नग्न रूप में ऐसा कह ले जाना बड़े कलेजे का काम है। भाषा की अपनी गरिमा होती है। अगर आप अपने ही दल के शीर्षस्थ नेताओं से वाणी-संयम की कला सीख लें तो ऐसी स्थितियां उत्पन्न न हों। क्या कोई इस तरह की भाषा-शैली की उम्मीद सुषमा स्वराज या जोशी जी से कर सकता है, कतई नहीं। उनका भाषा स्तर ऐसा हो ही नही सकता। अटल जी तो तब भी ऐसी भाषा नही बोले जब अपार जनसमर्थन के बावजूद वो संसद में एक वोट से पराजित हो गए थे,जबकि विरोध में वोट डालने वाले वह माननीय सदस्य महोदय तकनीकी स्तर पर ही पर  ऐसा करने के लिए अधिकृत हुए थे, विशुद्ध नैतिक स्तर पर नहीं। यह भाषा संस्कार था .....राजनीतिक मर्यादा का पालन था .. राजधर्म का निर्वहन था। पर जब कोई स्वयं को स्वयम्भू से कम न माने तो वह क्यों किसी से सीखे।
  'गुलाम हो जाने का डर' ......आखिर यह लोकतंत्र है या राजतंत्र। ये लोकतांत्रिक व्यवहार बताता है कि हम एक विशाल लोकतंत्र होने के बावजूद लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में अभी तक जी न पाए। खेद है कि हमने लोकतंत्र को सत्ता-परिवर्तन का ज़रिया ही समझा, व्यवस्था-परिवर्तन का नहीं।  यह  राजनीतिक सन्निपात की अवस्था है।