Friday, 28 December 2018

मुक्तिबोध की संवेदना

आधुनिक हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध बहुत ही उल्लेखनीय कवि हैं। फैंटेसी का जितना अद्भुत प्रयोग आपने किया उतना और किसी ने नहीं। मुक्तिबोध भावनाओं के ही नहीं संभावनाओं के भी कवि हैं, उनका लेखन सकारात्मक बदलाव लाने की शुभेच्छा से प्रेरित है। वे कवि हैं, जनवादी चेतना के। वह प्रतीकों और बिम्बों की भाषा बोलते हैं और उस भाषा के जरिये वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर चोट करते हैं। यहां बिंब और प्रतीक कथ्य को आश्चर्यजनक तरीके से विचारोत्तेजक बनाते हैं और यही मुक्तिबोध के लेखकीय कौशल की सार्थकता है।लोकतंत्र में जिन खतरों को लेकर वह आशंकित थे, वो आज समक्ष हैं। उनकी एक बहुत ही चर्चित कविता है- 'अंधेरे में', यह बहुत बड़ी कविता है। यद्यपि यह कविता स्वतंत्रता के पश्चात नेहरू युग के काल खंड से जुड़ी है तथापि इस रचना का दृष्टि विस्तार उसी कालखंड तक सीमित नहीं है। कविता में उन परिस्थितियों, प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को अलोकतांत्रिक बनाने पर तुली हैं। वह तत्कालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के सतहीपन को बेनकाब करते हैं। यह जनवादी चेतना का आत्मकेंद्रित सत्ता के विरुद्ध एक तरह से विद्रोह है और आग्रह है यह लोकधर्मी चेतना का सुशासन हेतु।
     नेहरू के मॉडल की निर्मम आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने, उन्हीं नेहरू की मृत्यु पर  बहुत दुःखी होकर कहा कि लोकतंत्र के लिए अब ख़तरा और बढ़ गया है....
    आइये इस ऐतिहासिक कविता की कुछ पंक्तियां देखें...

"अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक"

विशुद्ध बुद्धिवाद और घोर आत्मकेंद्रीकता को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं कि--

 "ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,
बन गये पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य--त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य--मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए, फँस गये,
अपने ही कीचड़ में धँस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम..."

   और वे यहीं नहीं रुकते वह सामाजिक दायित्व का गम्भीर सवाल भी खड़ा करते हैं  ---

"वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’
  इस तरह मुक्तिबोध सम्पूर्ण मानव समाज की चिंताओं से सरोकार रखने वाले एक बहुत ही संवेदनशील दार्शनिक कवि हैं।।

Wednesday, 19 December 2018

नागार्जुन जी हिंदी साहित्य के अप्रतिम कवि हैं। भाषा के स्तर पर भी और शिल्प के स्तर पर भी। वह सिर्फ़ इसलिए स्मरणीय नहीं हैं कि उन्होंने बंग्ला,मैथिली और हिंदी में बहुत कुछ रचा बल्कि वह इसलिए स्मरणीय हैं कि इन्होंने जनसाहित्य को रचा; आप इसलिए भी स्मरणीय हैं कि आपने अपने साहित्य में आमजन को नायकत्व प्रदान किया। आमजन की व्यथा-कथा आपके रचनाकर्म की विषयवस्तु बनी ......यह साहित्य की एक नयी प्रगतिधर्मी चेतना थी जो अपनी संवेदनशीलता से साहित्य को अपनी ही तरह से समृद्ध कर रही थी।
 आपने कथित लोकतंत्री व्यवस्था के उस पक्ष पर प्रहार किया जो समाजवाद के नाम पर सत्ता में आया था पर पूंजीवादी तत्वों से गठजोड़ कर स्वहितों को बढ़ावा दे रहा था। बाबा ने इस सफेदपोशी छलछद्म को अनावृत्त कर दिया। कहना न होगा कि बाबा ने शोषित-असहाय जनसामान्य की मूकवेदना को स्वर दिया।
   बाबा नागार्जुन मानवीय संवेदनाओं और व्यंग्य के अप्रतिम कवि हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर कटाक्ष करने में  उनका कोई मुकाबला नहीं। जब नामवर सिंह जी यह कहते हैं कि "यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नही हुआ"  तो यूं ही नहीं कहते। उनकी एक कविता मन्त्र है जो मौजूदा दौर के जीवन के सभी पक्षों विशेष रूप से सामाजिक औ राजनैतिक पक्षों में विद्यमान वीभत्सता पर गहरा प्रहार करती है। हिंदी काव्य-जगत की बेहद चर्चित इस  कविता में भारतीय परम्परा के सर्वाधिक पवित्र रूप-विधान (मंत्र) का उपयोग समकालीन राजनीति के सर्वाधिक अपवित्र पक्ष को व्यक्त करने के लिए किया गया है। यह भी एक व्यंग्य का तरीका है.जो बाबा नागार्जुन ही कर सकतेहैं... .यह शिल्प के स्तर पर एक अद्भुत प्रयोग है .......  देखें

रचनाकार: नागार्जुन

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्वं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी खुश‌हाली
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती अर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली
ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड

ॐ ॐ ॐ
ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌
ॐ अष्ट‌धातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे
ॐ म‌हाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌मा जाय स‌र्व‌हारा
ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌

Friday, 7 December 2018

💐तुम्हारा नेता नहीं मेरा नेता बड़ा💐

💐तुम्हारा नेता नहीं मेरा नेता बड़ा💐

आज के इस अति बुद्धिवादी दौर में अगर आप भावनाओं से जुड़े तथ्यों को रेखांकित करते हैं तो आप प्रगतिशीलता के विरोधी ठहराये जायेंगे। बुद्धिवाद इस कदर हावी है कि लोग मानव समाज के विशुद्ध भावनात्मक सम्बन्धों को भी विवेक के तराजू पर तौलकर नये-नये निष्कर्ष निकालते हैं। पर ऐसे स्वघोषित निष्कर्ष हमेशा विशुद्ध बुद्धिवादी खेमे से आएं ऎसा जरूरी नहीं,  कभी-कभी यह प्रायोजित होता है। अगर ईमानदारी से देखा जाय तो यह ज़्यादातर प्रायोजित ही होता है, हालांकि होता बुद्धिवाद के आवरण में ही है; ठीक उसी तरह जैसे सामान से ज़्यादा उसकी पैकिंग महत्वपूर्ण होती है। ये श्रेष्ठता के स्थापन का मनोविज्ञान है।
   प्रायोजित इसलिए होता है कि इससे निकाले गये निष्कर्ष वांछित परिणामों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। राजनीति के क्षेत्र में यह प्रवृत्ति खूब फल-फूल रही है। राष्ट्रीय नायकों और राजनीतिज्ञों के आपसी संबंधों को मनचाहे रूप में व्याख्यायित करने के अपने निहितार्थ हैं। उनके वैचारिक विरोध को उनके आपसी संबंधों की दशा व दिशा तय करने वाला एकमात्र मुख्य निर्धारक बिंदु मान की गई सुविधावादी  राजीनीतिक व्याख्या के कई फायदे हैं।
दो राजनेताओं के मध्य विचार वैभिन्य को व्यक्तिगत शत्रुता के रूप में चित्रित कर उन्हें परस्पर विरोधी गुट के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाने की प्रवृत्ति इधर कुछ ज्यादा ही मुखर हुई है। वस्तुतः इस दुष्प्रवृत्ति के पीछे राजनेताओं को दो गुटों में बांटकर उनमें से एक गुट को अपने साथ जोड़कर उनसे जुड़े लोगों को साधने की कोशिश की जाती है, अर्थात अनुयायियों को वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश की जाती है। इस प्रकार यह सारा अभियान, सारा उपक्रम सत्ता प्राप्ति के निमित्त है। यह लोग यहीं नहीं रुकते बल्कि यह लोग तो महापुरुषों को जाति-विशेष में कैद करके जातिवादी राजनीति को और हवा देते हैं। भले ही वे महापुरुष अपने जीवन में जातिवाद के घोर विरोधी रहें हों, पर इससे उन्हें क्या फ़र्क पड़ता..... आदर्शवाद से चुनाव तो नहीं जीत सकते न!!! चुनाव जीतने के लिये ध्रुवीकरण जरूरी है।
   हां तो बात मत-मतांतर को विवाद की शक्ल में पेश करने पर हो रही थी। इधर सोशल मीडिया पर स्वघोषित इतिहासकारों की बाढ़ आ गयी है। ये लोग नेहरू,पटेल,राजेंद्र प्रसाद तथा नेताजी के आपसी संबंधों पर ऐसे साधिकार टिप्पणी करते हैं जैसेकि वह स्वयं इन महान चरित्रों के कार्य व्यापार व संबंधों के साक्षी रहें हों।
   कुछ मनीषी नेहरू व पटेल तथा नेहरू और प्रसाद को प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करते हैं। निश्चित रूप से कई मुद्दों पर बड़े नेताओं के मध्य मत-भिन्नता होती थी जो कि बहुत ही स्वाभाविक है। मत भिन्नता कहां नहीं होती? यह तो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। यही तो लोकतांत्रिक व्यवहार की अपनी खूबसूरती है।  इसे लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लेने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
  नेहरू- पटेल व नेहरू-प्रसाद के   आपसी संबंधों पर चर्चा करते समय प्रायः ही नेहरू को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। ऐसा लगता है कि नेहरू ताउम्र प्रतिद्वंद्वी नेताओं के लिये षड्यंत्र ही रचते रहे। इसके अलावा उन्होंने कोई सार्थक काम न किया। ऐसा करके आलोचक जाने-अनजाने में पटेल और राजेंद्र प्रसाद जी के विराट व्यक्तित्व को भी बौना कर देते हैं। क्या पटेल जी इतने समझौतापरस्त इंसान थे कि उन्होंने अपने विरोधी विचारधारा और सिद्धांतविहीन व्यक्ति वाले के साथ काम करना स्वीकार कर लिया। क्या ऐसे वीतरागी को भी सत्ता का मोह विचलित कर सकता है!!!! यदि ऐसा गांधी जी के दबाव के चलते उन्होंने स्वीकार किया था तो गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्हें इस दबाव से मुक्त हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नही हुआ। पार्टी में रहना तो फिर भी ठीक था लेकिन मंत्रिमंडल में रहकर सहयोग देना कम से कम असहमत लौहपुरुष की प्रकृति में तो नहीं
ही था। निश्चित रूपसे कई मामलों में पटेल के निर्णय नेहरू की तुलना में ज्यादा दूरदर्शी सोच वाले साबित हुए पर इससे इंकार कहां ??  प्रधानमंत्री का पद उनके विराट व्यक्तित्व के सामने महत्वहीन था।
   वस्तुतः उन दोनों के मध्य बहुत मधुर संबंध थे, उन दोंनो के बीच हुए पत्राचार इसकी गवाही देते हैं। उदाहरण के तौर पर पटेल के एक पत्र का हवाला दिया जा सकता है,जो उन्होंने नेहरू के उस अनुरोधपत्र के जवाब में लिखा था जिसमें पटेल से मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया गया था .... पटेल ने लिखा-
” आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”

 बेबाक़ राय देना बताता है कि ये राष्ट्र पुरूष स्वतंत्र चेतना से संपृक्त थे। विचारों की भिन्नता उनके आपसी संबंधों का निर्धारण नही करती थी। वे एक दूसरे के प्रति बहुत ही आदरभाव रखते थे। एक बार बताते हैं कि प्रसाद स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान किसी बिंदु पर चर्चा करने के लिये देर रात नेहरू से मिलने उनके निवास पर गए पर पता चला कि नेहरू सो गए हैं, प्रसाद जी ने नेहरूजी को जगाने से मना कर दिया और खुद बरामदे में ही सो गए। सुबह नेहरू जी उठे तो यह जानकर बहुत दुखी हुए कि प्रसादजी को उनकी वजह से कष्ट हुआ।
 इसी तरह एक और उदाहरण गांधी और सुभाष के संदर्भ में है। दोंनो भिन्न-भिन्न विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले जननेता थे। गांधीजी ने सुभाषबाबू के दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बनने का कड़ा विरोध किया पर सुभाष बाबू गांधीजी के विरोध के बावजूद चुनाव लड़े और जीते भी। बाद में इस्तीफा भी दे दिया। पर ध्यान दिया जाय कि गांधीजी की कार्यसंस्कृति के प्रखर विरोधी रहे नेताजी अपने व्यक्तिगत जीवन में गांधीजी के प्रति बहुत आदर का भाव रखते थे। विदेश में अपने सशस्त्र क्रान्ति के अभियान की शुरुआत के अवसर पर सबसे पहले आपने ही अपने रेडियो प्रसारण में बापू से आशीर्वाद लेते हुए श्रद्धाभाव से उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। विचारों का टकराव अपनी जगह था और एक-दूसरे के प्रति सम्मान व सद्भाव अपनी जगह।
     वो बड़े लोग एक दूसरे का सम्मान करके खुश होते थे और आज कुछ लोग उन बड़े लोगों की आपस मे तुलना करके और स्वघोषित परिणामों के आधार पर बड़े और छोटे कद के रूप में एक दूसरे को वर्गीकृत करके आत्मसंतुष्टि पाते हैं। अगर उन लोगों में कद और पहचान को लेकर इतनी महत्त्वाकांक्षा होती तो शायद एक पार्टी और प्रतिद्वंद्वी साथी के साथ इतने लंबे समय तक काम करना उनके लिए संभव न होता।  अलग पार्टी बनाने का विकल्प तब भी खुला रहता था पर तब पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर गठित होती थीं न कि अपनी पहचान व कद को बचाने की खातिर ।।
  निश्चित रूपसे गाँधी, नेहरू या अन्य कोई भी आलोचना से परे नहीं हो सकता, पर आलोचना तथ्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए; पूर्वाग्रहसे प्रेरित नहीं।कई निर्णयों के लिये गाँधीजी और पंडित नेहरू की निर्मम आलोचना की जाती है, की भी जानी चाहिए यदि ईमानदार विवेचना की ऐसी मांग हो; यदि उनके निर्णयों से देश की दशा और दिशा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हो।
                               -संजीव शुक्ल

Tuesday, 4 December 2018

उन्मादी भीड़ द्वारा किसी को मार दिया जाना बहुत ही दुःखद और बहुत ही जघन्यपूर्ण है। यह इंसानियत की हत्या है। मरने वाला चाहे जिस धर्म का हो, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता ..... दर्द तो एक जैसा ही होता है .....मरता तो इंसान ही है न !!
उन्माद और कानून दोनों परस्पर विरोधी चीजें हैं, दोनों साथ-साथ नही चल सकते। उन्माद विवेक विरोधी स्थिति है तो  कानून विवेक और व्यवस्था की उपस्थिति का सूचक। उन्माद को मौन स्वीकृति देकर आप कानून के राज की कल्पना नहीं कर सकते। अगर भीड़ ही न्याय-अन्याय का फैसला करेगी तो फिर कानून को स्थापित करने वाले निकायों को भंग कर दिया जाना चाहिए। प्रायः सियासी लाभ के लिये ऐसी हरकतों को बढ़ावा दिया जाता है। पक्ष की तरफ़ से भी और विपक्ष की तरफ़ से भी। कट्टरता, कट्टरता है, उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती चाहे जिस तरफ से हो। ये नहीं हो सकता कि इनकी वाली कट्टरता अच्छी और तर्कसंगत है और उनकी वाली बुरी!!!
  ... तुष्टिकरण खतरनाक है फिर चाहे वह जिसका भी हो। सामाजिक समरसता को ख़त्म करके आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं
अगर किसी भी पक्ष का तुष्टिकरण न किया जाय और कानून को निष्पक्षता के साथ काम करने दिया जाय तो ऐसी अप्रिय परिस्थियाँ पैदा ही नहीं होंगी .......

Thursday, 29 November 2018

जाति बिना सब सून... जोगीरा सा....रा...रा

     अब हनुमानजी भी अनुसूचित जाति में दर्ज़ हुए .... हनुमानजी की सारी होशियारी निकल गई...  हनुमानजी सोच रहे थे कि हम नहीं बताएंगे तो क्या कोई जान पायेगा। मग़र इस कलियुग में एक से एक खोजी टाइप के लोग हैं, आप कितना भी बचें वह पता लगाकर मानेंगे। माना कि आप सरकारी सहायता लेने के सख्त खिलाफ हैं और स्वाभिमानवश दलितात्मकता को अच्छा नहीं मानते पर अपनी जाति को भूलना क्या अच्छी बात है। हम यह भी मानते है कि ऊंची से ऊंची जाति वाले भी आपका  आशीर्वाद-कृपा पाने के लिए टकटकी लगाकर आपकी तरफ देखते रहते हैं पर फिर भी आप द्वारा अपनी जाति का तिरस्कार करना बहुत ही संज्ञेय अपराध है। अगर आपको यह डर सता रहा है कि लोगबाग हमारी जाति को जानकर हमको पूजना छोड़ देंगे तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। संत रविदास जी का उदाहरण आपके सामने है। उनकी कौन पूजा नहीं करता ???
 आजकल जाति और गोत्र का ही जमाना है। हर कोई एक-दूसरे की जाति और गोत्र जानना चाहता है
सारे विकास के रास्ते यहीं से होकर के जाते हैं। चुनाव में जाति देखकर के ही उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं और जाति देखकरके ही कान पकड़ के बैठाए भी जाते हैं। दुष्यंत जी के समय बाढ़ ज्यादा आती होगी इसीलिए उनको लिखना पड़ा कि "बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं" आज यदि वह जिंदा होते शायद यह लिखते "जाति की संभावनाएं सामने हैं और ......" अतः प्रभु अपनी जाति को छुपाये नहीं और अब तो सब जान ही गये हैं !!!!   लेकिन प्रभु एक विनती है आपसे, वह यह कि आप अपनी जाति से प्रेम करिये लेकिन भक्तों में जाति के आधार पर भेदभाव मत करियेगा, क्योंकि आपके सेवक सभी जातियों में थोक के भाव पाए जाते हैं।
 अब जबकि सब लोग जान गए हैं, लोग आपका कानूनी दुरुपयोग करने की कोशिश करेंगे, इसलिए होशियार रहिएगा
अब ये लोग आपको बहला-फुसलाकर भगवान रामजी और उनके पुत्र लव-कुश के खिलाफ दलित उत्पीड़न के तहत आपसे एस.सी/एस.टी.एक्ट लगवा देंगे।  लोकतंत्र में अतिरिक्त रूप से सजग रहना होता है प्रभु, यहां ज़रा सा भी चुके तो आप को लोग रावण से नहीं श्रीराम जी से ही आप की लड़ाई करवा देंगे।
 आपकी तरफ से ये लोग थाने चले जाएंगे और आरोप लगाएंगे कि भगवान राम हनुमानजी जी को सिंघासन के नीचे बैठाते हैं और दिन-भर बंधुआ मजदूरी कराते हैं। और लव,कुश ने तो दलित उत्पीड़न की हद ही कर दी उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के दौरान घोड़े के साथ-साथ हनुमानजी को भी पेड़ से लटका दिया था ...... अतः है प्रभु होशियार रहिये। अपनी जाति से प्रेम अवश्य करें लेकिन जातिवादी न बनियेगा !!!
                            - संजीव शुक्ल

Wednesday, 28 November 2018

💐अभिनय के चलते-फिरते संस्थान💐

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2166084750275137&id=100006208982108


💐"अभिनय के चलते-फिरते संस्थान"💐

   जिनको भी अभिनय सीखना हो,अभिनय की बारीकी सीखनी हो, उन्हें नेताओं के हाव-भाव, उनके क्रियाकलापों पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिए। ये अभिनय के चलते-फिरते सर्वसुलभ संस्थान हैं: बस आपमें सीखने की ललक हो ..... निरपेक्षता और किरदार को जीने की कला तो कोई इनसे सीखे। बड़े-बड़े सी.बी.आई.वाले तक गच्चा खा जाते हैं। इनके भोले,मासूम चेहरे को देखकर वह चकरा जाता है कि गलती किधर से हुई। गलती इनसे हुई या कि हमसे जो इनके खिलाफ़ जांच करने को हामी भर दी। जिसकी जिंदगी भर स्तुति की, चरणवंदना की उसी के विरुद्ध जांच!!!! अरे राम-राम...... वह अपराधबोध में रहते हुए जैसे-तैसे जांच निपटाता है।
  फिल्मों में तो सिर्फ़ अदाकारी होती है, लेकिन राजनीति में बेहतरीन अदाकारी से लोगों को बेवकूफ़ भी बनाया जाता है। फ़िल्म तो तीन घंटे की होती है मगर इनके यहां पूरे पांच साल का शो है और अगर शो सफल रहा तो फिर पांच साल और .... यह उच्चकोटि का अभिनय है। यह अभिनय की मास्टर डिग्री है। झूठ को सच मे तब्दील कर देना मामूली बात नहीं !! अभिनय की सार्थकता भी इसी में है। भई बात तो तब है जब सच को अपने सच होने पर शर्मिंदगी होने लगे। तभी तो बरेलवी साहब को कहना पड़ा कि "वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता"
      यहां झूठ को इतनी प्रामाणिकता के साथ बोला जाता है कि वह अप्रतिम दस्तावेज सा लगने लगता है। दस्तावेजी रंगत देने के लिये हमारे नेता भाई लोग ऐसे में दो-तीन फोटोकॉपी के पन्ने मंच से ही लहराने लगते हैं, ताकि बात बहुत मारक हो जाय, और लगने भी लगता है कि भाईसाब के वे दुर्लभ पन्ने सत्ता की गलियों में हो रही दुरभिसंधियों के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, उनके चश्मदीद गवाह हैं । भले ही उन पन्नों पर घर के दूध का हिसाब लगा हो।
  इधर नेताओं के गले मिलने के हुनर ने अदाकारी में जान फूंक दी है। गले मिलने के तरीकों पर अध्ययन किया जाना चाहिए। सामने वाले को पायरिया हो तो भी सांस रोककर उसके मुंह की तरफ़ अपनी खोपड़ी करके लपक के ऐसे मिलो कि सामने वाले को पता ही न चले कि उसे इस नाम की कोई बीमारी थी भी या नहीं। ऐसी भीषण भावनात्मक  गतिविधि पर भी अगर आदमी उसे अपना मानने की गलती न करे तो वह इंसान नहीं .......  लानत है उसकी इंसानियत पर ....
गले मिलने में अपार संभावनाएं छुपी हैं। यह वशीकरण जैसा है, इस प्रक्रिया में एक अजीब सा सम्मोहन होता है, इसमे प्रेम विवेक पर हावी हो जाता है। और वैसे भी विवेक और प्रेम की तो सनातन दुश्मनी है। कहते हैं न कि प्रेम अंधा होता है। अक्सर लोग प्रेम में ही गच्चा खाते हैं। यह नशीली जैसी चीज है।  जब तक होश आता-आता है तब तक आदमी लुट चुका होता है। जनता भी कई बार लुट चुकी है। लोग बताते हैं कि इससे गिले-शिकवे मिट जाते हैं, लोग पुरानी कही-सुनी बातों को भूल जाते हैं। नेता लोग भी चुनाव के टाइम जनता से गले मिलते हैं। सो जनता भी उनके किये गए वादों को भूलकर उन्हें क्षमा कर  फिर से अपना लेती हैं।
   राजनीति के क्षेत्र में इसका बहुत सुनहरा अतीत रहा है। एक बार अफजल खां ने भी जानबूझकर शिवाजी से गले मिलने की कोशिश की थी लेकिन शिवाजी गले मिलने के खतरे को पहले ही भांप गए और प्रेम में पड़े बग़ैर अफजल का काम तमाम कर दिया।
     मगर कभी-कभी मानवीय दुर्बलता इस अदाकारी पर भारी पड़ जाती है। ऐसी ही एक मानवीय दुर्बलता हुई आँख दबाने की। यह घटना सरे आम हो गयी। हो सकता है यह चुम्बकीय गतिविधि किसी विशिष्ट संदर्भ में कई गयी हो पर जब आप अभिनय के बड़े-बड़े धुरंधरों के सामने मौजूद हों तो ऐसी किसी गलती के लिये आपको क्षमा नहीं किया जायेगा और वैसे भी हमारे समाज मे इस क़ातिलाना इशारेबाजी को बहुत स्वागत-योग्य नहीं माना जाता।
 गले मिलने के बाद आंख दबाना बहुत गलत है, वह भी तब जब आप कैमरे के निगाह में हो। यह बताता है कि आप अभिनय की दृष्टि से सामने वाले कि तुलना में अभी बहुत नौसिखिये हैं .......  वैसे भी जब गंभीर विषयों पर बहस हो रही हो तब ऐसी हरकत करना छिछोरेपना की निशानी है। यह आपकी छिछोरावस्था है !! अगर आपको आंख दबानी ही है तो दोनों दबाइये और बेहिसाब दबाइये जिससे यह घोषित किया जा सके कि आप कोई ऐसी-वैसी हरकत नहीं कर रहे थे बल्कि देश की समस्याओं को लेकर गहन चिंतन में डूब-उतरा रहे थे। इसमें फायदा यह है कि आप लगे हाथ थोड़ी देर सो भी सकते हैं।
 अगर आप यह सब सिख लिये तो यक़ीनन आप एक दिन इस फील्ड में बेमिसाल एक्टर बनेगें। हमारी शुभकामनाएं💐💐
                                      - संजीव शुक्ल

Tuesday, 27 November 2018

बतकही

इधर मैं एक अजीब सी कशमकश में था, एक भीषण अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा था।   दरअसल मैं एक अकबर इलाहाबादी का शेर पोस्ट करना चाह रहा था सोच रहा था कर ही दूँ नहीं तो कोई और कर देगा तो क्या फायदा !! पर असली दुविधा तो यहीं पर थी। मेरे सामने धर्मसंकट और संवैधानिक संकट दोनों आ खड़े हुए। हालांकि दुविधा उनके लिखे हुए शेर को लेकर के नहीं है, शेर तो अच्छा ही है, कुछ सोच करके ही लिखा होगा। मामला दरअसल उनके नाम का है। नाम की अपार महिमा है !!!  जगत में जितने भी उंगली पर गिनाए जा सकने वाले अच्छे काम हुए उनके पीछे नाम की ही प्रेरकशक्ति है। अगर नाम कमाने की इच्छा मर जाये तो आप यकीन मानिए कि अच्छे काम करना बहुत ही कठिन हो जायेगा। एक प्रकार से असंभव। धोखाधड़ी से अच्छे काम हो जाय तो अलग बात है। यह उतना ही कठिन है, जैसे चुनाव लड़ने पर उतारू उम्मीदवार से चुनाव में बैठ जाने के लिए कहना,जैसे चुनावों में उम्मीदवारों के द्वारा जनसेवा के उन्माद में किये गये वायदों को जीतने के बाद उनके द्वारा पूरा कर पाना; जैसे जनता में अफवाह की तरह फैली कबीर की वह जनप्रिय उक्ति "जस की तस धर दीन्ही चुनरिया" को साबित करके दिखा देना। हालांकि कबीरदास जी की बात अलग है। महात्माओं में उनका एक स्तर था, वह बहुत बिगड़ैल स्वभाव के थे। लोग बताते हैं कि वह हर चीज को प्रेस्टिज इश्यू बना लेते थे। 'मसि कागद छुयो नहि कलम गह्यो नहि हाथ की घोषणा करने वाले के लिए क्या असंभव!!  पर हम लोगों के लिए असंभव। जिस सत्ता की चादर को बिछाया जाय,ओढ़ा जाय और न जाने क्या-क्या किया जाय, उसे वैसे ही कैसे रखा जा सकता है। हां, इसे वैसा का वैसा वो ही लोग रख सकते हैं जिन्हें इसे यूज करने का मौका नहीं मिल पाया।
  ख़ैर बात नाम को लेकर के थी। यहां मुख्य समस्या इलाहाबादी के नाम से से है। अब चूंकि इलाहाबाद का नाम इलाहाबाद से बदलकर प्रयागराज हो गया है इसलिए अकबर इलाहाबादी कहने से एक प्रकार से संवैधानिक संकट से आ जाता है और यदि इलाबाद की जगह प्रयागराजी कहता हूं तो बाप- दादा के दिये गए नाम को बदलने का पाप लगता है। यह बहुत बड़ा धर्मसंकट है। यद्यपि परिवर्तन प्रगति का सूचक है और इस नाते नाम मे बदलाव को मैं कई बार स्वीकार कर लेता हूं। पर व्यक्तिगत स्तर पर हर चीज को ले आना हम भारतीयों के स्वभाव में नहीं  जैसे हम लोग ईमानदारी, नैतिक आदर्शों औऱ सद्कर्मों को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं लेते। ये सब श्रीराम शर्मा जी के प्रेरक वाक्यों की तरह दीवारों पर ही ज्यादा अच्छे लगते हैं या फिर श्लोकों की तरह किसी धार्मिक अनुष्ठान,पर्व के अवसर पर उच्चारित किये जाने जैसे। चुनाव चूंकि लोकतांत्रिक पर्व है इसलिए यहां भी इन सदवाक्यों के उच्चारित किये जाने की अघोषित अनुमति रहती है। वैसे भी अभी तक चूंकि व्यक्तिगत स्तर पर नाम बदले जाने की अधिसूचना जारी नहीं हुई है इसलिए यथास्थिति कायम रखते हुए उनके असली नाम से ही उनका यह शेर दे रहा हूं, आंनद लीजिए..........

💐"आपस में अदावत कुछ भी नहीं, लेकिन इक अखाड़ा कायम है।
जब इससे फ़लक का दिल बहले, हम लोग तमाशा क्यों न करें।"💐
                   (अकबर इलाहाबादी)

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2168564730027139&id=100006208982108

Thursday, 11 January 2018

हंगामों का महोत्सव हो या फिर महोत्सवों का हंगामा, दोनों ही स्थितियां वर्तमान (तत्कालीन) नेतृत्व की राजनैतिक व्यूह-रचना का परिणाम होतीं हैं  जिसमें जनता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की कसमें खायीं जाती हैं। कुल मिलाकर जनता में यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि जनता के हितों का बेहतर संरक्षण हमारे अलावा कोई नहीं कर सकता। इसके लिए अगर महोत्सव जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिये आत्म विज्ञापन किया जाय तो क्या बात है !! एक लंबे-चौड़े बजट वाला महोत्सव !!! सुना है  वंशवादी राजनीति की प्रभुता के प्रतीक वाले महोत्सव की तर्ज़ पर वैसा ही कुछ इस बार भी अन्यत्र.......
 ऐसे में अगर सांस्कृतिक धरोहर को जिंदा रखने और समाज के सांस्कृतिक परिवेश को सम्पुष्ट करने के नाम पर सरकारों द्वारा प्रायोजित महोत्सव यदि अपनी प्रतिबद्धताओं से इतर सिर्फ शिखर नेतृत्व के विरुद-गायन के केंद्र बनकर रह गये हैं, तो इसमें आश्चर्य कैसा ?? साहिर साहब भी कुछ      ऐसे ही ख़यालात रखते हैं। उनकी इस नज़्म से असहमत होना कठिन है ----
 "ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने है..
कुछ लोगों की कोशिश है,कुछ लोग बहल जायें..
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते है..
मुमकिन है कि कुछ अर्सा,इस जश्न पर टल जाए!
                   -साहिर

(वादा-ए-फ़रदा=कल के लिए किया गया वादा)"

Thursday, 4 January 2018

बाबा नागार्जुन

जिनकी लेखनी की तीखी नोक ने सत्ता के प्रतिष्ठानों में फल-फूल रहे राजनीतिक पाखंड को अनावृत्त किया जो कि कथित  शुचिता की धवल चादर से ढकें थे.....और राजनीतिक पाखंड ही क्यों; धर्म व समाजसेवा के नाम पर हो रहे अनाचार भी उनके नुकीले व्यंग्य बाणों के प्रहार से बच न सके ।   नागार्जुन का शिल्प विधान जितना विविधवर्णी था उतना ही विविध स्तरीय उनका वस्तु विधान भी था। संवेदना के विविध स्वरों की उपस्थिति बताती है कि वो कितने अद्भुत कलमकार थे। ऐसे ऊर्जस्वित कलम के धनी, व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर  कविकुल श्रेष्ठ नागार्जुन को प्रणाम !!
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रचनाकार: नागार्जुन

"जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !"
बाबा नागार्जुन मानवीय संवेदनाओं और व्यंग्य के अप्रतिम कवि हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर कटाक्ष करने में  उनका कोई मुकाबला नहीं। जब नामवर सिंह जी यह कहते हैं कि "यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नही हुआ"  तो यूं ही नहीं कहते। उनकी एक कविता मन्त्र है जो मौजूदा दौर के जीवन के सभी पक्षों यथा सामाजिक औ राजनैतिक पक्षों में विद्यमान वीभत्सता पर गहरा प्रहार करती है। हिंदी काव्य-जगत की बेहद चर्चित इस  कविता में भारतीय परम्परा के सर्वाधिक पवित्र रूप विधान (मंत्र) का उपयोग समकालीन राजनीति के सर्वाधिक अपवित्र पक्ष को व्यक्त करने के लिए किया गया है। यह भी एक व्यंग्य का तरीका है.जो बाबा नागार्जुन ही कर सकतेहैं....कुछ पंक्तियां देखें

रचनाकार: नागार्जुन


ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌।।