अंध समर्थन और अंध विरोध दोनों ही कभी भी सार्थक दिशा नही दे सकते उल्टे ये प्रतिगामी विचारधारा के पोषक बन सामाजिक सद्भाव को खण्डित करते हैं। यह प्रवृत्ति गांधारी की तरह है जो जानबूझकर यथार्थ का साक्षात्कार न करने की नीयत से अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती है ......यह प्रवृत्ति सामाजिक दायित्व के बोध से परे निजी लाभ और सम्बन्धों को सर्वोपरि मान उसी के हिसाब से अपनी राह तय करती है। आज की राजनीति में यह गांधारी प्रवृत्ति खूब फल-फूल रही है ......
Monday, 28 August 2017
Thursday, 24 August 2017
दलों का वर्गीकरण
दलों के वर्गीकरण में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। दलों के वर्गीकरण का विस्तार किया जाना चाहिए। अफ़सोस है कि संविधान निर्माता इस मामले में अपनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय सोंच के संकुचित दायरे से आगे नही बढ़ सके
और आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके।अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले जनवादी, लोहियावादी व राष्ट्रवादी आदि-आदि जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता। आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान के प्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। इसके अलावा जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टियों के जरिये समाजसेवा-राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठा रक्खा है क्या उनके प्रति समाज का कोई दायित्व नही बनता?? यह परोपकारी प्रवृत्ति कहीं लुप्त न हो जाय इसके लिये इसका तत्काल संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही कुछ विशिष्ट परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही समाज सेवा की इच्छा को लोगों के द्वारा राजनैतिक रोजगार का ताना मारकर अपमानित न किया जा सके, इसके लिये भी इस तरफ लोगों में सकारात्मक सोंच को विकसित करने की जरूरत है ........ विशेषकर तब जब कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा,और बिहार में इसका बड़ा क्रेज हो....... जय परिवारवाद ।।।।
और आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके।अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले जनवादी, लोहियावादी व राष्ट्रवादी आदि-आदि जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता। आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान के प्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। इसके अलावा जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टियों के जरिये समाजसेवा-राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठा रक्खा है क्या उनके प्रति समाज का कोई दायित्व नही बनता?? यह परोपकारी प्रवृत्ति कहीं लुप्त न हो जाय इसके लिये इसका तत्काल संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही कुछ विशिष्ट परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही समाज सेवा की इच्छा को लोगों के द्वारा राजनैतिक रोजगार का ताना मारकर अपमानित न किया जा सके, इसके लिये भी इस तरफ लोगों में सकारात्मक सोंच को विकसित करने की जरूरत है ........ विशेषकर तब जब कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा,और बिहार में इसका बड़ा क्रेज हो....... जय परिवारवाद ।।।।
Monday, 21 August 2017
मौजूदा दौर
व्यवस्थागत बदलाव अभी भी एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है। जिले स्तर के जितने भी कार्यालय है उनकी कार्यप्रणाली यथापूर्व ही है। सारी समस्याएं और उन समस्याओं को दूर करने की वह सभी सुविधाएं जो पूर्ववर्ती सरकारों में उपलब्ध थीं, आज भी सहज उपलब्ध है। ऑनलाइन शिकायती तन्त्र होने के बावजूद समस्याओं का निस्तारण उन्ही अधिकारियों से कराया जाता है जिनके खिलाफ शिकायत है और यह सब योगी जैसे ईमानदार,कर्मठ व समाजसेवी मुख्यमंत्री के रहते हो रहा है......दुष्यंत कुमार की इन लाइनों से ही अपनी बात खत्म कर रहा हूं.....
"मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं"
- संजीव शुक्ल अतुल
"मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं"
- संजीव शुक्ल अतुल
Thursday, 3 August 2017
एक परिचय
हालांकि जिस व्यक्ति का मैं परिचय करवाने जा रहाँ हूँ, उनके परिचय की आवश्यकता होनी नहीं चाहिए, पर है; होनी इसलिये नहीं चाहिए कि वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उनका क्षेत्र-विशेष में इतना बड़ा योगदान है कि आज नहीं तो कल जब भी मनीषी लोग उनकी रचनाधर्मिता के आकलन के लिये लेखनी उठाएंगे तो शायद वह स्वयं को गर्वित महसूस करें। पर विडंबना है भारतीय समाज की कि वह समय रहते उत्कृष्ट लोगों को सम्मान देने के अपने दायित्व के प्रति संवेदनशील नही रहता। निराला, प्रेमचंद जैसे न जाने कितने लोग होंगे जो समाज की जड़वादी धारा से संघर्ष करते हुए;अर्थाभाव से जूझते हुए साहित्य-साधना में रत रहे। निराला जी को तो अपने प्रारंभिक साहित्यिक जीवन मे अपनी कविता को कविता मनवाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। यह अलग बात है कि आज निरालाजी की 'राम की शक्ति पूजा' सिविल एग्जाम के पाठ्यक्रम में शामिल है।
ऐसा ही कुछ-कुछ हाल है एक ऐतिहासिक उपन्यासकार श्री रमाकांत पांडेय 'अकेले' जी का जिन्हें अपने उपन्यास को छपवाने के लिए छपवाई देने के साथ-साथ तमाम संघर्ष करना पड़ा। इन्हें अपनी किताबें बेंचकर उससे मिले धन को अगली किताब को छपवाने के लिए देने पड़ते हैं। अभी पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार स्वंय सम्मानित हुआ ....हालांकि पुरस्कार की दहलीज तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई थी श्री ए.के.सिंह राठौर जी ने जो कि हरदोई के जिलाधिकारी सहित तमाम बड़े प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। वह स्वयं बहुत अच्छे साहित्य साधक हैं। आपने ही बताया कि पांडेय जी के उपन्यास विदेशों तक में अपना स्थान बना चुके हैं।
पांडेय जी के उपन्यासों से लोंगो को रूबरू कराने के लिए सबसे पहले हमारे पिताजी (श्री वीरेंद्र शुक्ल) ने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी मासिक मैगज़ीन 'चीनी उद्योग' में आपके उपन्यास 'मितौलगढ़' को धारावाहिक में छापा था। पांडेय जी ने करीब 72 उपन्यासों की रचना की है जिनमें कि केवल 35 उपन्यास ही प्रकाशित हो पाएं हैं। इसके अलावा आपके 10 या 12 उपन्यास रखरखाव के अभाव के चलते दीमकों की भेंट चढ़ गए।
मौजूदा समय में आपके उपन्यास अमेरिका, जर्मनी, यू.के, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व फ्रांस सहित लगभग 6-7 देशों की लाइब्रेरीज में शोभित हो रहें हैं। अमेरिका में तो क़रीब 16 और विदेशों के लगभग 240 पुस्तकालयों में पांडेय जी की किताबें वर्तमान में मौजूद हैं।
87 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार श्री पांडेय जी आचार्य चतुरसेन, के.एम.मुंशी तथा वृन्दावन लाल वर्मा की परंपरा के ऐतिहासिक उपन्यासकर हैं। यथार्थ और कल्पना के मिश्रित संयोजन से रचेआपके ऐतिहासिक उपन्यास अद्भुत हैं। इस समय आप उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रह्मावली गांव में रहते हुए साहित्य-साधना में रत हैं। आपके सम्मानित होने से प्रशंसकों की चिर संचित अभिलाषा अब फलित होती दिख रही है। आश्चर्य है कि अमेरिका की बर्कले, येले यूनिवर्सिटी और आस्ट्रेलिया के कई पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहीं पाण्डेय जी की पुस्तकें अपने देश में परिचय की मोहताज़ ही रहीं .....
ऐसा ही कुछ-कुछ हाल है एक ऐतिहासिक उपन्यासकार श्री रमाकांत पांडेय 'अकेले' जी का जिन्हें अपने उपन्यास को छपवाने के लिए छपवाई देने के साथ-साथ तमाम संघर्ष करना पड़ा। इन्हें अपनी किताबें बेंचकर उससे मिले धन को अगली किताब को छपवाने के लिए देने पड़ते हैं। अभी पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार स्वंय सम्मानित हुआ ....हालांकि पुरस्कार की दहलीज तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई थी श्री ए.के.सिंह राठौर जी ने जो कि हरदोई के जिलाधिकारी सहित तमाम बड़े प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। वह स्वयं बहुत अच्छे साहित्य साधक हैं। आपने ही बताया कि पांडेय जी के उपन्यास विदेशों तक में अपना स्थान बना चुके हैं।
पांडेय जी के उपन्यासों से लोंगो को रूबरू कराने के लिए सबसे पहले हमारे पिताजी (श्री वीरेंद्र शुक्ल) ने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी मासिक मैगज़ीन 'चीनी उद्योग' में आपके उपन्यास 'मितौलगढ़' को धारावाहिक में छापा था। पांडेय जी ने करीब 72 उपन्यासों की रचना की है जिनमें कि केवल 35 उपन्यास ही प्रकाशित हो पाएं हैं। इसके अलावा आपके 10 या 12 उपन्यास रखरखाव के अभाव के चलते दीमकों की भेंट चढ़ गए।
मौजूदा समय में आपके उपन्यास अमेरिका, जर्मनी, यू.के, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व फ्रांस सहित लगभग 6-7 देशों की लाइब्रेरीज में शोभित हो रहें हैं। अमेरिका में तो क़रीब 16 और विदेशों के लगभग 240 पुस्तकालयों में पांडेय जी की किताबें वर्तमान में मौजूद हैं।
87 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार श्री पांडेय जी आचार्य चतुरसेन, के.एम.मुंशी तथा वृन्दावन लाल वर्मा की परंपरा के ऐतिहासिक उपन्यासकर हैं। यथार्थ और कल्पना के मिश्रित संयोजन से रचेआपके ऐतिहासिक उपन्यास अद्भुत हैं। इस समय आप उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रह्मावली गांव में रहते हुए साहित्य-साधना में रत हैं। आपके सम्मानित होने से प्रशंसकों की चिर संचित अभिलाषा अब फलित होती दिख रही है। आश्चर्य है कि अमेरिका की बर्कले, येले यूनिवर्सिटी और आस्ट्रेलिया के कई पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहीं पाण्डेय जी की पुस्तकें अपने देश में परिचय की मोहताज़ ही रहीं .....
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