[ क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलिस्वरूप
यह लेख 1997 में कादंबिनी के अगस्त के अंक में प्रकाशित हुआ था उन क्रांतिकारियों को सादर जिन्होंने राष्ट्र के स्वातान्त्र्य यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी । ]
यवनिका के
उठते ही घोटालों के अप्रत्याशित दर्शनों से ऐसा
लगा जैसे किसी नाटक में समय पूर्व ही भूलवश अचानक परदा उठ गया हो और अंदर बैठे
पात्रों की वास्तविकता
और स्थिति दर्शकों के
सामने आ जाए । यह तो एक छोटी सी नजीर है, वर्तमान राजनीति के चरित्र की । जीवन
में नैतिकता का आँचल तो शायद हमने वहीं छोड़ दिया था, जहां
पर हमें ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ के
आश्वासन की अनुगूँज सुनाई पड़ी ।
काकोरी कांड के ऐतिहासिक महापुरुष श्री
रामकृष्ण खत्री की
अन्त्येष्टि में
किसी भी वरिष्ठ राजनेता ने वहाँ जाने की कर्तव्य-परायणता नहीं दिखाई । राजभवन की
तरफ से भी मात्र औपचारिकता की खाना-पूरी हुई । अब तो औपचारिकता की भी विवशता नहीं
रहीं । कितनी कृतघ्न हो चली है भारतीय राजनीति ।
अभी दो-तीन वर्ष पहले ही राष्ट्र-पुत्र
श्री खत्री जी राष्ट्रीय-पर्व पर
राज्यपाल के आमंत्रण पर [जहां तक मेरी जानकारी है] राजभवन गए, पर विचित्र एवं दुखद स्थिति वहाँ पर तब
आ गई, जब राजभवन के द्वार पर ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन्हें अंदर
जाने से रोक दिया ।
इस लज्जास्पद व्यवहार से न जाने कितने
देशभक्तों के हृदय व्यथित हुए होंगे अनुमान कर लेना कठिन नहीं । कौन जाने
स्वाभिमानी खत्री जी उस समय इन्हीं पंक्तियों को दुहरा बैठे हों ।
वक्त गुलशन पे पड़ा, तो लहू हमने दिया ।
बहार आई तो कहते हैं
कि तेरा काम नहीं ।।
क्रांतिकारी
बनाम आतंकवादी
सरकारी मानसिकता का तो खैर हमेशा से ही
क्रांतिकारियों के प्रति विरोधी और द्वेषपूर्ण दृष्टिकोण रहा है। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी सरकारी
शैक्षिक पाठ्यक्रमों में क्रांतिकारियों को आतंकवादियों बताया जाना कहाँ तक उचित
है ? क्या इसे वर्तमान
पीढ़ी को भ्रमित करने की कुचेष्टा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए । आज का
छात्र एक ही शब्द में दो परस्पर विरोधी
विचारधाराओं का सामंजस्य कैसे बिठा पाएगा ।
उद्देश्य को प्रधान न मानकर
क्रांतिकारियों की कुछ आतंकपूर्ण कार्रवाइयों को ही आधार मान लेना और फिर उसे
आतंकवादी विचारधारा से जोड़ दिया जाना अनुचित ही नहीं अन्यायपूर्ण भी है।
क्रांतिकारियों की मानसिकता आतंकपूर्ण नहीं थी, क्रांतिकारियों ने हिंसापूर्ण कार्रवाइयाँ जरूर की पर वे सीमित
रूप में मर्यादित और विवेकपूर्ण थीं न कि उच्छृखलतापूर्ण । क्रांतिकारियों कि
सशस्त्र क्रान्ति की भावना अंग्रेजों के विरुद्ध न होकर
अंग्रेजों की साम्राज्यवादी एवं शोषणवादी व्यवस्था के खिलाफ थी ।
यह बात भगत सिंह के एवं दत्त
के असेंबली में बम फेकनें और नारे लगाने
से भी स्पष्ट हो जाती है। उनके द्वारा लगाए गए “साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे को किसी भी दृष्टि से अंग्रेज़
विरोधी मानसिकता नहीं माना जा सकता । वहीं बम की प्रकृति हिंसापूर्ण न होकर ‘बहरों को सुनाने के लिए विस्फोट के
बहुत ऊंचे शब्द की आवश्यकता होती है’ के
होने में थी ।”
आतंकपूर्ण कार्रवाइयों को करते समय सदैव
इस बात की विशेष सावधानी बरती जाती थी कि चोट का शिकार कोई अन्य निर्दोष व्यक्ति न हो ।
क्रान्ति के उपकरण
क्रान्ति को और अधिक स्पष्ट शब्दों में
परिभाषित करते हुए भगत सिंह कहते हैं “क्रान्ति
का विरोध करने वाले लोग केवल पिस्तौल, बम, तलवार, और रक्तपात को ही क्रान्ति का नाम देते हैं, परंतु क्रांति इन चीजों में ही सीमित
नहीं है । ये चीजें क्रांति के उपकरण हो सकती हैं, परंतु इन उपकरणों के पीछे क्रांति की वास्तविक शक्ति जनता द्वारा समाज की
आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तन करने की इच्छा होती है
।”
यह सारा विश्व जानता है कि
ब्रिटिश नीति अन्यायपूर्ण और उसका
चरित्र औपनिवेशिक था, पर
इसके बावजूद यह हम पर गुलामी की मानसिकता
का ही प्रभाव है कि हम
उन्हीं की[शोषणवादी व्यवस्था की] दृष्टि
से हर चीज देखने का प्रयास करते हैं ।
कैसे मान लिया जाये कि
हमने उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्व का
समीक्षात्मक निष्कर्ष निकाल लिया है। क्या सरकारी मानसिकता को उनके व्यक्तित्व और
कृतित्व को परिभाषित करने के लिए सम्पूर्ण वाङमय में केवल यही एक उपयुक्त शब्द
मिला है : आतंकवादी ।
आतंकवादी शब्द हमारे सशस्त्र क्रांति
में विश्वास रखने वाले क्रांतिकारियों के हृदय को कितना बेधता होगा, इसका अहसास हमें उनकी क्रोध और
वेदनापूर्ण अभिव्यक्तियों में सहज ही देखने को मिलता है।
क्रांति और आतंकवाद में अंतर
क्रांतिकारी यशपाल सिंहावलोकन में
क्रांति एवं आतंकवाद पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि “क्रांति
और आतंकवाद’ में भेद हैं ।
ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर इस भेद कि
उपेक्षा की है, कांग्रेसजन शायद इस भेद को समझते ही न
थे। भारतीय क्रांतिकारियों की भावना और नीति कोई सदा एक रूप और परिमित पदार्थ नहीं
था ।”
भगतसिंह भी इस तथाकथित सोच के प्रखर विरोधी थे ।
असेंबली बम कांड के मामले में भगतसिंह ने अपनी इस टीस को व्यक्त करते हुए हाई कोर्ट में कहा
था, “हमें जो दंड दिया गया
है, उसके प्रति हमें कोई
ऐतराज नहीं है, हमें तो ऐतराज है केवल कातिल कहे जाने
पर और हमारा उद्देश्य गलत समझे जाने
पर।” यह महज भावावेग नहीं
बल्कि यह एक राजनैतिक चिंतक
का क्रांति दर्शन के प्रति तटस्थ चिंतन है।
शोषण एवं साम्राज्यवादी व्यवस्था की
प्रतीक ब्रिटिश सरकार तो चली गई, पर
इन क्रांति के संवाहकों को स्वतंत्र भारत में भी न्याय न मिल सका । भगतसिंह ने
उद्दे श्य
को कार्य से अलग न कर सकने के पक्ष में सेशन जज के सामने अपनी दलील रखते हुए कहा, “किसी आदमी को धमकाकर जेब खाली करा लेना
और राज्य कर वसूलने वाले सरकारी आदमी को एक ही कोटि में नहीं रखा जा सकता, हालांकि परिणाम दोनों का एक ही होता है।
’’ निश्चित ही ये तर्कपूर्ण विचार उनकी सोद्देश्यपरक व्यापक
दृष्टि को परिलक्षित करने में समर्थ है ।
आतंक सहारा एक अध्यापक भी लेता है, लेकिन यथोचित एवं कल्याण के लिए । आतंक
का सहारा कानून को स्थापित करने के विभिन्न निकाय भी लेते हैं ।
आतंक का सहारा राम ने सुग्रीव और समुद्र
के विरुद्ध भी लिया था । निश्चित ही आतंक का यथोचित एवं मर्यादित सहारा लेने वाला
आतंकवादी नहीं हो सकता ।
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा था, “स्वराज्य
की प्राप्ति में हिंसा और अहिंसा का प्रतिबंध-विवेचन ठीक नहीं ।”
स्वराज्य को पृथकतावाद या अलगाववाद मान
लेना भूल है । स्वराज्य में केवल अपनी ही सहभागिता का भाव नहीं ,बल्कि दूसरों के साथ अपनी सहभागिता का
भाव ही मुख्य होता
है ।
अंग्रेज़ यदि यहाँ के होकर रहते और शासन
करते, तो कुछ भी बुरा न था
। वह भी अकबर या शाहजहाँ की तरह भारतीयों के दिल में चिरस्थायी जगह बना लेते, लेकिन उनकी प्रवृत्ति भारत के
उपनिवेशिकरण में थी । कहना न होगा कि शासकों की प्रवृत्ति
महमूद गजनवी जैसी थी ।
अंग्रेजों के अत्याचार
सन 1898 में ही वायसराय एलिगन ने खुली
धमकी दी थी कि भारतवर्ष
तलवार के बल पर जीता गया था और तलवार के ही बल पर उसे ब्रितानी कब्जे में रखा
जाएगा ।
लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ में अरविंद की आतंकपूर्ण नीतियों के समर्थन में लिखा “यदि प्रशासन का रूसीकरण हुआ तो जनता निश्चय ही रूसी तरीके
अपनाएगी ।”
हिंसक
आंदोलन की आड़ में वायसराय इरविन द्वारा ‘पब्लिक
सेफ़्टी बिल’ के जारी किए जाने को
चुनौती देते हुए नेहरू के यह शब्द “
हिंसक और अहिंसक आंदोलनों के द्वंद्व के
कारण यह बिल नहीं आया है । ब्रिटिश सरकार स्वयमेव हिंसा की प्रतीक है, उसे उपदेशात्मक भाषण देने का कोई अधिकार
नहीं ।”
जब
अत्याचारी सरकार लोकतान्त्रिक तरह से विरोध करने के तरीकों का ही गला घोंटने पर
तुली हो, तो अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग में लाना
स्वाभाविक ही है । जलियांवालाबाग का हत्याकांड और साइमन कमीशन के विरोध में तमाम
राष्ट्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस का भारी दमनचक्र इसके प्रत्यक्ष
ऐतिहासिक उदाहरण हैं । यह नृशंसतापूर्ण कार्यवाही ही लाला लाजपतराय
की मृत्यु का कारण बनी ।
यही कारण है कि क्रांतिकारियों के प्रति जनता की
विश्वसनीयता और श्रद्धा उत्तरोत्तर दृढ़
होती जा
रही थी, वे उनकी [जनता] भावनाओं के आदरणीय पुरुष थे ।
यतींद्रनाथ दास के अंतिम दर्शनों हेतु लाखों लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आतंक को
नकारते हुए उनकी शवयात्रा में सम्मिलित हुए ।
भगतसिंह की फांसी से जनता ही नहीं वरन
करांची का कांग्रेस अधिवेशन भी शोक में डूब गया था । प्रख्यात अहिंसावादी और
गांधीजी के अनन्य भक्त श्री पट्टाभि सीतारमैय्या
के मतानुसार, “उस समय भगतसिंह का नाम सारे देश में
गांधीजी की तरह ही लोकप्रिय हो
गया था । ”
क्रांति : सात्विक घृणा
आजाद हिन्द फौज के कुछ अफसरों पर मुकदमा
चलाकर दंडित किए जाने के निर्णय से
भारतीय जनमानस विक्षुब्ध हो उठा । देशव्यापी विरोध के कारण ब्रिटिश सरकार को अपना
निर्णय बदलना पड़ा । वहीं इसके विपरीत आतंकवादी निरुद्देश्यपूर्ण कार्यों से एवं
जनविरोधी कार्यों के कारण जनता का विश्वास पाने में विफल रहे । आतंकवादियों का न
जनता में विश्वास होता है और न ही जनता का इनके प्रति । आतंकवाद को समाप्त करने के
लिए जनता का भी यथेष्ट सहयोग मिलता रहता है । आतंकवाद पृथकतावादी मानसिकता से
संचालित होता है जबकि क्रांति एकत्ववाद की भावना से उत्प्रेरित, जहां आतंकवादी विचारधारा कोरी घृणा पर
टिकी हुई है, वहीं
क्रांतिकारी विचारधारा अज्ञेय के अनुसार, ‘सात्विक
घृणा में विश्वास रखती है।’
क्रांतिकारी किसी भी प्रकार के
दुराग्रहों से पूर्णत: मुक्त
थे । जेल में अव्यवस्था एवं अनीतिपूर्ण व्यवहार को खत्म करने के लिए अनशन –
जैसे पूर्ण अहिंसक अस्त्र का भी सहारा
लिया, हालांकि इन लोगों ने अनशन को एक रणनीति के तहत इस्तेमाल किया, जिससे कि जनता-जनार्दन
से प्राप्त सहानुभूति से ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला जा सके । यतींद्रनाथ दास
तथा मणीन्द्रनाथ बैनर्जी अपने
क्रांतिकारी अनशन के कारण ही शहीद हुए ।
इतना सब होते हुए भी हास्यास्पद स्थिति
तब आती है, जब कभी-कभी सशस्त्र
क्रांति के संवाहकों को सफलता और असफलता के मापदँडों से तोला
जाता है, उन्हें शायद यह
सूक्ति नहीं मालूम कि प्रयास की पूर्णता
आत्मोसर्ग में है सफलता में नहीं
।
---संजीव शुक्ल ‘अतुल’