माफ़ कीजिएगा , यह किसी प्रतियोगिता का दृश्य नहीं है ।
यह तो देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ कुछ बड़े-बड़े
साहित्यकारों ,वैज्ञानिकों
और प्रबुद्धजनों द्वारा विरोधस्वरूप अपने-अपने पुरस्कारों को वापस करने की
घटना-श्रंखला है। इधर पुरस्कार-वापसी की जो होड़
शुरू हुई है वह थमने का नाम नहीं ले रही है। एक बार
तो लगा कि वाकई में देश अशांत है, देश
में गृह-युद्ध जैसे हालात हैं,और
पूरा देश सांप्रदायिकता की आग में जल रहा है। पर लोग धीरे-धीरे वास्तविकता से अवगत
हुए । देश की ऐसी छवि बना करके क्या सांप्रदायिकता की समस्या को हल किया जा सकता
है? क्या इन दुर्घटनाओं को समाज की सामान्य- मनोवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जा
सकता है? वैसे जिस असहिष्णुता
को लेकरके यह आंदोलन (पुरस्कार-वापसी) गतिमान
है वह स्वयं सहिष्णुता का त्याग कर चुका है। पुरस्कार वापस करने वाले जिस नाटकीय
अंदाज में पुरस्कारों को वापस कर रहें हैं उससे न केवल इन दुखद घटनाओं पर लोगों को
सियासत करने का मौका मिल रहा
है अपितु इससे संवेदनशील विषयों पर स्वस्थ-बहस की चिंतन–परंपरा भी बाधित हुई है।
पुरस्कार लौटाना
असहमति दर्शाने का एक तरीका है। पूर्व में भी कई लोगों ने अपने पुरस्कार या
उपाधियाँ लौटाई हैं । जी सुब्रमण्यम अय्यर ने बेसेंट की गिरफ्तारी के विरोध में ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी तो जालियाँवाला बाग हत्याकांड से आहत
होकर टैगोर ने अपनी ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी थी । इसी तरह
महात्मा गांधी ने भी अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध अपने विरोध को मुखर करते हुए ‘केसर-ए–हिन्द’ की उपाधि लौटा दी थी । यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि
जिन घटनाओं के विरोध में इन महापुरुषों ने अपनी उपाधियाँ लौटाई थीं वे घटनाएँ
अंग्रेज़ सरकार की
नृशंस कार्यवाहियों का परिणाम थीं । जालियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम देने वाले जनरल डायर
की अंग्रेज़ सरकार ने खुलकर तारीफ की थी । ऐसी परिस्थिति में उपाधियों को लौटाना
जनभावनाओं का सम्मान करने जैसा था ।
बेशक आपके पास असहमति की अभिव्यक्ति का
अधिकार है और उस अधिकार के तहत आप विरोधस्वरूप अपना पुरस्कार लौटा सकते हैं , मगर यह विरोध पूर्वाग्रह से मुक्त होना
चाहिए । असहमति या विरोध जिन वजहों को
लेकरके है उन पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए । जिस पार्टी या सरकार पर असहिष्णुता को बढ़ावा
देने का आरोप लगाया गया है , कम
से कम उसको अपनी बात
रखने का मौका तो दिया जाना चाहिए । वर्तमान में जिन घटनाओं का हवाला देकर
केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है क्या उन घटनाओं में सरकार की किसी
प्रकार की संलिप्तता उजागर हुई है? क्या
वास्तव में, देश में अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता पर पहरा
बैठा दिया गया है? पर
आज माहौल कुछ ऐसा ही बनाया जा रहा
है जैसे पूरा समाज असहिष्णु हो उठा हो और ये घटित घटनाएँ सरकार द्वारा प्रायोजित
हों । दुर्भाग्य से यह स्थिति उन लेखकों के द्वारा पैदा की गई है जिनसे ईमानदार
कलमकार होने की अपेक्षा की जाती है। जहां ये दुःखद घटनाएँ घटी
हैं वहाँ की राज्य-सरकारों की जवाबदेही
को नजरंदाज करते हुए सीधे केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा देना कहाँ तक जायज है
? कर्नाटक में जहां
लेखक एम एम
कलबुर्गी की
हत्या हुई वहाँ पर कांग्रेस का शासन है। दादरी में इकलाख की हत्या हुई वहाँ पर सपा
की सरकार है । इसी तरह दाभोलकर की हत्या 2014 में महाराष्ट्र में कांग्रेस-
एनसीपी शासन के दौरान हुई थी ।आश्चर्य
है कि उस समय की घटना आज पुरस्कारों को लौटाने की वजह बन रही है। क्या इन
घटनाओं पर राज्य सरकारों
की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती थी । क्या इसे,
कानून-व्यवस्था को बनाए रखने में राज्यों
की असफलता तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए । आखिर ये लेखक राज्य सरकारों की जवाबदेही
पर क्यों कुछ नहीं बोलते ? अमुक
सरकार पर आरोप लगाना और अमुक सरकार को बरी कर देना अवसरवादिता
नहीं तो और क्या है?
या फिर इसके कुछ और निहितार्थ हैं.
निश्चित ही, देश में जो असहिष्णुता की घटनाएँ घटी हैं, वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं । चाहे कर्नाटक
में कलबुर्गी की
हत्या हो या फिर दादरी में इकलाख की, ये
घटनाएँ सभ्य समाज के लिए कलंक हैं । इन घटनाओं को
रोकने के लिए विचारधारात्मक स्तर पर लड़ाई लड़नी होगी। तुष्टीकरण जो कि आज की राजनीति का सच है, ने प्रकारांतर से कट्टरवादिता को बढ़ावा
दिया है । ।
अगर हम एक पक्ष का तुष्टीकरण करते हैं तो दूसरा पक्ष खुद-ब-खुद प्रतिक्रियावादी बन
जाता है । इसलिए पंथनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने के लिए तुष्टीकरण की नीति को
खत्म किया जाना चाहिए । तुष्टीकरण की नीति के अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं जिन्हें समझने की जरूरत है, ताकि वोटों के ध्रुवीकरण की घिनौनी
कोशिश को रोका जा सके । ।
असहिष्णुता को खेमों
मे बाँट कर देखने की प्रवृ त्ति
से बचा जाना चाहिए । इससे तो असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई कमजोर ही पड़ेगी ।
जो लेखक आज पूरे देश के माहौल को
असहिष्णु और सांप्रदायिक बता कर चिंतित नजर आ रहे हैं आश्चर्य है कि उनकी लेखनी
अपनी सहिष्णुता का
एक कोना भी तसलीमा नसरीन को
न दे सकी। तसलीमा नसरीन गत कई वर्षों से पश्चिम
बंगाल में रह रहीं हैं । वह अपने निर्वासित जीवन से उतनी दुःखी नहीं हैं, जितनी दुःखी वह प0
बंगाल के पुस्तक मेलों में
न जा पाने से हैं । वह अपनी टीस व्यक्त करते हुए कहती हैं“ बांग्ला भाषा की
मूलभूमि में एक बांग्ला लेखक को, जिसने बांग्ला में चालीस से भी अधिक
किताबें लिखीं हैं और जिसे पुरस्कृत भी किया गया है, पुस्तक मेले में घुसने का कोई अधिकार नहीं ।दोनों बंगाल आज मेरे खिलाफ हैं। मैं जानती
हूँ की मेरा दोष क्या है । मैंने सच बोला है और मैं धारा के विरुद्ध गई हूँ ।” असहिष्णुता से आहत ये
लेखक यदि पश्चिम बंगाल की सरकार को भी सवालों के घेरे में खड़ा करते तो और अच्छा
होता ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (सीमा
के अंदर) पर प्रहार फिर चाहे वह किसी भी धर्म,संप्रदाय के कट्टरपंथियों के द्वारा
किया जाय, रोका जाना चाहिए । वैचारिक-भिन्नता
को हिंसा के जरिये खत्म करने की कोशिशों का विरोध होना ही चाहिए । इधर हिन्दुत्व
की रक्षा के नाम पर जिस तरह के अतिवादी बयान दिये गए हैं, वह कहीं से भी हिन्दू धर्म की आत्मा और
उदारता से मेल नहीं खाते। इन बयानों से देश की गंगा-जमुनी
संस्कृति को ठेस लगी है। हिन्दू धर्म
तो वैचारिक भिन्नता को सम्मान देने के लिए ही विख्यात है। नास्तिकवादी जैसी धुर
विरोधी विचारधारा जो कि ईश्वर
के अस्तित्व को ही नकारती है, को आत्मसात करने की विशिष्टता केवल
हिन्दू धर्म में है । हिन्दुत्व की व्याख्या करते हुए तरुण विजय जो कि भाजपा
के राज्यसभा सांसद हैं
कहते “यदि कोई हिन्दू ऐसी किसी हिंसा का
समर्थन करता है अथवा सार्वजनिक समाज में अभद्रता और
हिंसा का सहारा लेता है तो वह अपने हिंदूपन से च्युत हो जाता है । हिन्दू होने का
अर्थ ही है, अभिव्यक्ति की
स्वतन्त्रता और वैचारिक निर्बंधता में विश्वास करना ।” वैचारिक-भिन्नता मुक्त-समाज और प्रगतिशीलता का
लक्षण है । जो लेखक समाज में बढ़ रही सांप्रदायिकता व असहिष्णुता से चिंतित हैं
उन्हें अपने लेखन के जरिये समाज को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए । पुरस्कारों को
लौटाना तो उस स्थिति में ठीक होता जब सरकार स्वयं प्रतिक्रियावादी ताकतों का
समर्थन करने लगे या फिर उम्मीदों की रोशनी धूमिल लगने लगी हो । अन्यथा समाज में
असहिष्णुता को अतिरंजित रूप से पेश करने से सिर्फ अफवाहों का बाजार ही गरम होगा
और यह स्थिति कहीं न कहीं सामाजिक सद्भाव में विचलन पैदा करेगी । ।
- संजीव
शुक्ल ‘अतुल’