Thursday, 5 November 2015

पुरस्कारों की वापसी

माफ़ कीजिएगा , यह किसी प्रतियोगिता का दृश्य नहीं है । यह तो देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ कुछ बड़े-बड़े साहित्यकारों ,वैज्ञानिकों और प्रबुद्धजनों द्वारा विरोधस्वरूप अपने-अपने पुरस्कारों को वापस करने की घटना-श्रंखला है। इधर पुरस्कार-वापसी की जो  होड़ शुरू हुई है वह थमने का नाम नहीं ले रही है। एक  बार तो लगा कि  वाकई में देश अशांत है, देश में गृह-युद्ध जैसे हालात हैं,और पूरा देश सांप्रदायिकता की आग में जल रहा है। पर लोग धीरे-धीरे वास्तविकता से अवगत हुए । देश की ऐसी छवि बना करके क्या सांप्रदायिकता की समस्या को हल किया जा सकता है?  क्या इन दुर्घटनाओं को समाज की सामान्य- मनोवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है? वैसे जिस असहिष्णुता को लेकरके यह आंदोलन (पुरस्कार-वापसी)  गतिमान है वह स्वयं सहिष्णुता का त्याग कर चुका है। पुरस्कार वापस करने वाले जिस नाटकीय अंदाज में पुरस्कारों को वापस कर रहें हैं उससे न केवल इन दुखद घटनाओं पर लोगों को सियासत करने का मौका मिल रहा है अपितु इससे संवेदनशील विषयों पर स्वस्थ-बहस की चिंतन–परंपरा भी बाधित हुई है।
पुरस्कार लौटाना असहमति दर्शाने का एक तरीका है। पूर्व में भी कई लोगों ने अपने पुरस्कार या उपाधियाँ लौटाई हैं । जी सुब्रमण्यम अय्यर ने बेसेंट की गिरफ्तारी के विरोध में सर की उपाधि लौटा दी थी तो जालियाँवाला बाग हत्याकांड से आहत होकर टैगोर ने अपनी नाइट की उपाधि त्याग दी थी । इसी तरह महात्मा गांधी ने भी अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध अपने विरोध को मुखर करते हुए केसर-ए–हिन्द की उपाधि लौटा दी थी । यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि जिन घटनाओं के विरोध में इन महापुरुषों ने अपनी उपाधियाँ लौटाई थीं वे घटनाएँ अंग्रेज़ सरकार की नृशंस कार्यवाहियों का परिणाम थीं ।  जालियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम देने वाले  जनरल  डायर की अंग्रेज़ सरकार ने खुलकर तारीफ की थी । ऐसी परिस्थिति में उपाधियों को लौटाना जनभावनाओं का सम्मान करने जैसा था ।
 बेशक आपके पास असहमति की अभिव्यक्ति का अधिकार है और उस अधिकार के तहत आप विरोधस्वरूप अपना पुरस्कार लौटा सकते हैं , मगर यह विरोध पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए । असहमति या विरोध जिन वजहों  को लेकरके है उन पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए । जिस पार्टी या सरकार पर असहिष्णुता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है , कम से कम उसको अपनी  बात  रखने का मौका तो दिया जाना चाहिए । वर्तमान में जिन घटनाओं का हवाला देकर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है क्या उन घटनाओं में सरकार की किसी प्रकार की संलिप्तता उजागर हुई है? क्या वास्तव में, देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा बैठा दिया गया है? पर आज माहौल कुछ ऐसा ही बनाया जा रहा है जैसे पूरा समाज असहिष्णु हो उठा हो और ये घटित घटनाएँ सरकार द्वारा प्रायोजित हों । दुर्भाग्य से यह स्थिति उन लेखकों के द्वारा पैदा की गई है जिनसे ईमानदार कलमकार होने की अपेक्षा की जाती है। जहां ये दुःखद घटनाएँ घटी हैं वहाँ की राज्य-सरकारों की जवाबदेही को नजरंदाज करते हुए सीधे केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा देना कहाँ तक जायज है ? कर्नाटक में  जहां लेखक एम एम कलबुर्गी  की हत्या हुई वहाँ पर कांग्रेस का शासन है। दादरी में इकलाख की हत्या हुई वहाँ पर सपा की सरकार है । इसी तरह दाभोलकर की हत्या 2014 में महाराष्ट्र में कांग्रेस- एनसीपी शासन के दौरान हुई थी ।आश्चर्य है कि उस समय की घटना आज पुरस्कारों को लौटाने की वजह बन रही है। क्या इन घटनाओं पर राज्य सरकारों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती थी । क्या इसे,  कानून-व्यवस्था को बनाए रखने में  राज्यों की असफलता तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए । आखिर ये लेखक राज्य सरकारों की जवाबदेही पर क्यों कुछ नहीं बोलते ? अमुक सरकार पर आरोप लगाना और अमुक सरकार को बरी कर देना  अवसरवादिता नहीं तो और क्या है? या फिर इसके कुछ और निहितार्थ हैं.   
निश्चित ही, देश में जो असहिष्णुता की घटनाएँ घटी हैं, वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं । चाहे कर्नाटक में कलबुर्गी की हत्या हो या फिर दादरी में इकलाख की, ये घटनाएँ सभ्य  समाज के लिए कलंक हैं । इन घटनाओं को रोकने के लिए विचारधारात्मक स्तर पर लड़ाई लड़नी होगी। तुष्टीकरण जो कि आज की राजनीति का सच है, ने प्रकारांतर से कट्टरवादिता को बढ़ावा दिया है । । अगर हम एक पक्ष का तुष्टीकरण करते हैं तो दूसरा पक्ष खुद-ब-खुद प्रतिक्रियावादी बन जाता है । इसलिए पंथनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने के लिए तुष्टीकरण की नीति को खत्म किया जाना चाहिए । तुष्टीकरण की नीति के अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं जिन्हें समझने की जरूरत है, ताकि वोटों के ध्रुवीकरण की घिनौनी कोशिश को रोका जा सके । ।
असहिष्णुता को खेमों मे बाँट कर देखने की प्रवृ त्ति से बचा जाना चाहिए । इससे तो असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई कमजोर ही पड़ेगी । जो लेखक आज पूरे देश के माहौल को असहिष्णु और सांप्रदायिक बता कर चिंतित नजर आ रहे हैं आश्चर्य है कि उनकी लेखनी अपनी सहिष्णुता  का एक कोना भी तसलीमा नसरीन  को न दे सकी।  तसलीमा नसरीन गत कई वर्षों से पश्चिम बंगाल में रह रहीं हैं । वह अपने निर्वासित जीवन से उतनी दुःखी नहीं हैं, जितनी दुःखी   वह  प0 बंगाल के पुस्तक मेलों  में न जा पाने से हैं । वह अपनी टीस  व्यक्त करते हुए कहती हैं बांग्ला भाषा की मूलभूमि  में एक बांग्ला लेखक को, जिसने बांग्ला में चालीस से भी अधिक किताबें लिखीं हैं और जिसे पुरस्कृत भी किया गया है, पुस्तक मेले में घुसने का कोई अधिकार नहीं ।दोनों बंगाल आज मेरे खिलाफ हैं। मैं जानती हूँ की मेरा दोष क्या है । मैंने सच बोला है और मैं धारा के विरुद्ध गई हूँ । असहिष्णुता से आहत ये लेखक यदि पश्चिम बंगाल की सरकार को भी सवालों के घेरे में खड़ा करते तो और अच्छा होता ।
 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  (सीमा के अंदर)  पर प्रहार फिर चाहे  वह किसी भी धर्म,संप्रदाय के कट्टरपंथियों के द्वारा किया जाय, रोका जाना चाहिए । वैचारिक-भिन्नता को हिंसा के जरिये खत्म करने की कोशिशों का विरोध होना ही चाहिए । इधर हिन्दुत्व की रक्षा के नाम पर जिस तरह के अतिवादी बयान दिये गए हैं, वह कहीं से भी हिन्दू धर्म की आत्मा और उदारता से मेल नहीं खाते।  इन बयानों से देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को ठेस लगी है। हिन्दू धर्म तो वैचारिक भिन्नता को सम्मान देने के लिए ही विख्यात है। नास्तिकवादी जैसी धुर विरोधी विचारधारा जो कि  ईश्वर के अस्तित्व को ही नकारती हैको आत्मसात करने की विशिष्टता  केवल हिन्दू धर्म में है । हिन्दुत्व की व्याख्या करते हुए तरुण विजय जो कि  भाजपा के राज्यसभा  सांसद  हैं कहते यदि कोई हिन्दू ऐसी किसी हिंसा का समर्थन करता है  अथवा सार्वजनिक समाज में अभद्रता और हिंसा का सहारा लेता है तो वह अपने हिंदूपन से च्युत हो जाता है । हिन्दू होने का अर्थ ही है, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और वैचारिक निर्बंधता में विश्वास करना ।   वैचारिक-भिन्नता मुक्त-समाज और प्रगतिशीलता का लक्षण है । जो लेखक समाज में बढ़ रही सांप्रदायिकता व असहिष्णुता से चिंतित हैं उन्हें अपने लेखन के जरिये समाज को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए । पुरस्कारों को लौटाना तो उस स्थिति में ठीक होता जब सरकार स्वयं प्रतिक्रियावादी ताकतों का समर्थन करने लगे या फिर उम्मीदों की रोशनी धूमिल लगने लगी हो । अन्यथा समाज में असहिष्णुता को अतिरंजित रूप से पेश करने से सिर्फ अफवाहों का बाजार ही गरम  होगा और यह स्थिति कहीं न कहीं सामाजिक सद्भाव में विचलन पैदा करेगी । ।


                                                                                                               -   संजीव शुक्ल अतुल

Friday, 30 October 2015

प्रार्थना

श्वेत वस्त्र धारे अंब जननि  हमारी तुम                                                    
आपके ही हाथ का सहारा हम सबको
राह भरी कंटकों से, मंजिल बहुत दूर
चलता रहूँगा माँ,  दिखाओ राह हमको
ख्यातिप्राप्त  नाम आप जननी उदारमना
हम हैं अनाम, आप नाम दे दो हमको
कामना है एक,  मातु देश के लिए जीऊँ मैं
राखूँ  मान देश का, सवारूँ देश-धन को । ।
                                                              

                         -संजीव शुक्ल अतुल

Thursday, 22 October 2015

आयोगों में दखलंदाज़ी

          अनिल यादव तो एक छोटी सी कड़ी है इस भृष्ट तंत्र की । अनिल यादव जैसे छोटे-छोटे सूत्रों को पकड़ करके असली सूत्रधार तक पहुँचने की जरूरत है। आज इन सूत्रधारों की कृपा से ही भृष्टाचार पनपता और फलता-फूलता है। इनके आपसी गठजोड़ को उद्घाटित करने की जरूरत है। नेताओं और अधिकारियों की दुरभिसंधि को पहचानकर जनता के सामने उनको बेनकाब करना होगा । आज सही काम करने या करवाने के लिए इतनी औपचारिकताएँ पूरी करनी पड़ती हैं कि  व्यक्ति उन औपचारिकताओं से ही घबड़ाकर आगे बढ़ने का हौसला खो देता है।   पर आश्चर्य है कि लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद के चुनाव में किसी भी स्थापित परंपरा और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और लोक सेवा आयोग ही क्यों माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड तथा उच्चतर शिक्षा आयोग के अध्यक्षों और सदस्यों के चुनाव में भी घोर अनियमितता के प्रमाण मिले हैं । इसे महज संयोग कहकर नहीं नकारा जा सकता । ये सुनियोजित  षड्यंत्र के नतीजे हैं । मा0शि0से0चयन बोर्ड की पूर्व अध्यक्षा की नियुक्ति को अवैधानिक मानते हुए जब कोर्ट द्वारा उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई तो उसके बाद क्या सरकार को अगले अध्यक्ष की नियुक्ति में मानकों पर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए था ।  उल्लेखनीय है कि अगले अध्यक्ष सनिल कुमार की नियुक्ति में भी मनमानी की गई । क्या यह महज संयोग ही है। उच्चतर शिक्षा आयोग के अध्यक्ष लाल बिहारी पांडे और सदस्यों की नियुक्ति भी मानकों के विपरीत की गई थी जिसे कोर्ट के द्वारा दुरुस्त किया गया । लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव के आवेदन-पत्र को सपा कार्यालय में रिसीव कराया गया , आखिर सपा कार्यालय आयोगों का आयोग जो ठहरा। गुंडा-ऐक्ट ,जिला बदर जैसी उनकी योग्यताएँ  अन्य  प्रतियोगियों की योग्यताओं पर भारी पड़ी। लोकायुक्त अपने मन का हो,  आयोगों में अध्यक्षों व सदस्यों की नियुक्तियां अपने मन की हो तो फिर कानून में आस्था का दिखावा क्यों?  जब संवैधानिक निकायों के प्रमुखों, सदस्यों की नियुक्तियाँ विशुद्ध राजनैतिक दृष्टिकोण से की जाएगी तो फिर उनके राजनैतिक निहितार्थ न  निकाले जाएँ, यह कैसे संभव है। आयोग में आए सिफारिशी लोग अपने आकाओं के इशारों पर नाचते नजर आते हैं । इन परिस्थितियों में आयोग अपनी सार्थकता खोता नजर आता है ।मा0शि0से0चयन बोर्ड के द्वारा विगत कई वर्षों से कोई भी नियुक्ति नहीं की गई है । जो एक-दो परीक्षाएँ हुईं भी हैं वो अपने विवादित परिणामों के चलते न्यायालय में विचाराधीन हैं ।
       आज हर सही काम करवाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।  आज अगर अराजकता नहीं है तो इसकी वजह कोर्ट की सक्रियता है । वर्तमान में, न्यायपालिका को वो भी  काम करने या करवाने पड़ते हैं जो विशुद्ध प्रशासनिक प्रवृत्ति के हैं । यह प्रशासन में न्यायपालिका का हस्तक्षेप नहीं, वरन यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता है। आयोग द्वारा डाली गई की-शीट्स के उत्तर यदि गलत हैं तो सही करवाने के लिए आपको कोर्ट ही जाना होगा । अगर आपको परीक्षाओं के कट-आफ जानने हैं तो आपके पास न्यायालय की शरण में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है । पीसीएस– 2014, पीसीएस-जे 2013 का कट-ऑफ, कोर्ट की फटकार लगाने के बाद आयोग द्वारा जारी किया गया । यही हाल लोअर सबार्डिनेट 2013 के कट-ऑफ का है । 
      आयोग, नियुक्तियों में चल रहे गोरखधंधे को संचालित करने वाले अड्डे के रूप में तब्दील हो गयें हैं। बड़े पैमाने पर बिना भरी हुई ओ0एम0आर0शीटों का पाया जाना क्या संकेत करता है। जब आयोगों के सदस्यों व अध्यक्षों की नियुक्तियों में ही घालमेल है तो फिर इन आयोगों के द्वारा की जाने वाली भर्तियाँ कितनी पारदर्शी और मानकों के अनुरूप होंगी, यह सोंचने की बात है ।      
      आयोगों में सरकार की दखलंदाज़ी चिंता का विषय है। इससे पूर्व कितनी ही सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी ने भी संवैधानिक आयोगों और वैधानिक व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं की । समाजवाद के इन घोषित अनुयायियों ने समाजवादी सिद्धांतों,मूल्यों,परम्पराओं को जितनी क्षति पहुंचाई है उतनी क्षति तो समाजवाद के घोर विरोधी भी नहीं पहुंचा सकते । लोहिया जी और जयप्रकाश जी के समाजवादी मूल्यों की विरासत को बढ़ाने का दायित्व जिन लोगों पर था, वो लोग परिवारवाद और जातिवाद की राजनीति में व्यस्त हो गए । लोहिया व जयप्रकाश जी के समाजवादी संस्कार राम-राज्य की संकल्पना से निर्मित थे लेकिन आज के घोषित समाजवादी राम-राज्य की संकल्पना को सांप्रदायिक मान इसे धर्म-निरपेक्षता के लिए खतरा मानते हैं । समाजवाद, सुविधावादी राजनीति की कभी भी इजाजत नहीं देता। यह गैर-बराबरी और किसी भी तरह के पक्षपातपूर्ण व्यवहार का घोर विरोधी है। आयोगों व परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए इसे राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाना चाहिए । तभी आयोगों की सार्थकता रहेगी।

                                                                                                                       -     संजीव शुक्लअतुल

Saturday, 17 October 2015

लोक सेवा आयोग की अध्यक्षी

      लोक सेवा आयोग के ललित ललाम छवि रखने वाले अध्यक्ष की छुट्टी हो जाने से उन तमाम गुंडों की महत्वाकांक्षाएँ मिट्टी में मिल गयीं  जो उनके बाद  अध्यक्ष की कुर्सी पर आँख गड़ाए थे । वह चाहते थे कि अध्यक्ष महोदय पानी पीने के बहाने से या फिर किसी भी तरह की शंका-निवारण के बहाने से कुर्सी से उठें और इधर वह अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना रूमाल फेंककर सीट का रिज़र्वेशन सुनिश्चित करवा लें । लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से करा धरा सब बेकार हो गया । तमाम कुवांरी इच्छाएँ बिन-ब्याहे ही सती हो गयीं । उन तमाम गुंडों की पत्नियों की सिंदूरी अभिलाषा का रंग फीका पड़ गया जो भविष्य में अध्यक्ष की पत्नी बनने का ख्वाब देख रहीं थीं । उनके पति जो अभी तक सिर्फ गुंडा थे अध्यक्षी पाते ही गुंडाधिकारी बन जाते । लेकिन खैर ।
       वैसे न्यायाधीश महोदय को डराने वाला यह फैसला सुनाना ही था तो सुनाते ही ,उनको कौन रोक सकता था लेकिन मानवीय पहलू पर गौर करते हुए उन्हें कम से कम करवा-चौथ तक तो रुक ही जाना चाहिए था । इससे न्यायपालिका के फैसले को सुरक्षित रखने की परंपरा का निर्वाह भी हो जाता और किसी का करवा-चौथ (उत्साह सहित) भी सफल हो जाता । लेकिन कोर्ट के विधान के आगे कब किसकी चली है । दो-दो सनातनी परंपराओं  के निर्वाह का संयोग यूं ही जाता रहा।
    अध्यक्ष महोदय पर तमाम तरह की धांधली करने और करवाने का आरोप है। लेकिन इससे लोकसेवा आयोग में उनके द्वारा दिये गए योगदान को न तो कम किया जा सकता है और न ही इससे उनके इस श्रेय को छीना जा सकता है कि उन्होने लोक सेवा आयोग  की लोकप्रियता को जन-जन तक पहुंचाया । लोकसेवा आयोग की लोकप्रियता में चार-चाँद लगाने में निवर्तमान अध्यक्ष की भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए । अध्यक्ष पर आरोप है कि  उन्होने अपने खास लोगों पर मेहरबानी की । यह आरोप तो प्रथम दृष्ट्या खारिज होने के लायक है । अरे भाई आदमी अपनों पर मेहरबानी नहीं करेगा तो क्या गैरों पर मेहरबानी करेगा । अपनों पे सितम, गैरों पे करम वाली लाइन फिल्मों में  ही ठीक लगती है ।       लोकलाज भी कोई चीज होती है । कोर्ट के द्वारा सीट से उतारे जाने पर क्या लोग यह ताना नहीं मारेगें कि तुमसे इतने  भी गलत काम न हो सके लानत है तुम पर और तुम्हारी अध्यक्षी पर । तुमको तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए । हालांकि यह तो कहने वाली बात है अन्यथा चुल्लू भर पानी में कितने लोग डूब कर मरे होंगे,  सभी जानते हैं । अपनों का काम न करके क्या कोई जमीर वाला आदमी अपनों से आँखें मिला सकता है , हाँ, काम करके जरूर आदमी आँखों में आँखों घुसेड़ कर बात कर सकता है। अब यदि उस तथाकथित व्यक्ति की आँखें ही दिपदिपाती हों तो अलग बात है।
    निवर्तमान अध्यक्ष महोदय को इस बात का भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होने कोर्ट के माध्यम से पहली बार अध्यक्षी हासिल करने की शर्तों को लोगों के सामने उद्घाटित किया ।  तमाम लोग तो सिर्फ    इस कारण से ही अध्यक्षी पाने से चूक गए की उन्होने गलत पते का चुनाव कर लिया था । जब आवेदन-पत्र ही गलत जगह पहुंचेगा तो कोई कैसे अध्यक्ष बन सकता है। आवेदन-पत्र को आयोग के पते पर नहीं वरन तत्कालीन सरकार से संबन्धित पार्टी के मुख्यालय में रिसीव कराना चाहिए ।
    जब से ये अध्यक्ष बने थे और लोगों को इनकी योग्यता के बारे पता चला तब से एक खास वर्ग में खासा उत्साह बढ़ चला था । तो कुछ दावेदार इसलिए संकोच कर रहे थे कि वे बाकी सारी शर्ते तो पूरी कर  रहे हैं पर जिला-बदर की अवधि वर्तमान (तत्कालीन) अध्यक्ष के मुक़ाबले में कुछ कम पड रही है । पर समझाने वाले सहृदय लोग भी कम नहीं थे, सो समझा भी रहे थे कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । अभी तो तुम्हारे पास 2-3 वर्ष का समय है,कोशिश करोगे तो जिला-बदर की अवधि क्या चीज है ,प्रदेश-बदर भी कर लोगे । तहसील-बदर तो तुम तभी हो गए थे जब तुम्हारी कायदे से मूंछ  भी नहीं जमी थी।  इसलिए घबड़ाओ नहीं ।  “ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं  होइ तात तुमह पाहीं ।
    उधर कुछ पत्नियाँ अध्यक्ष की मेरिट गिरने की राह देख रहीं थीं तो कई पत्नियाँ गुंडई की वर्तमान मेरिट को क्रास कर जाने के लिए अपने-अपने पतियों को उकसा रहीं थीं । लेकिन कोर्ट के फैसले को क्या कहा जाए । इतने सम्मानित अध्यक्ष को इतनी बेदर्दी से उतार दिया गया कि अब क्या कहा जाये । अब तो लोग अध्यक्ष बनने से ही डरने लगे हैं लेकिन कोर्ट का फैसला अपनी जगह है, सरकार को उनकी ऐतिहासिक सेवाओं को देखते हुए उनको सम्मानित करना चाहिए । अगर ये माननीय कुछ दिन और टिक जाते तो पीसीएस में प्री और मेंस का झंझट ही खत्म कर देते । बात भी सही है, आखिर प्रशासन में जाने के लिए प्री और मेंस को क्वालीफ़ाई करने की क्या जरूरत है विद्वान बनकर कौन सा इनको ज्ञानपीठ लेना है । और फिर परीक्षा प्रणाली की दुरूहता न जाने कितने बच्चों को फार्म भरने से ही रोक देती है,जो कि स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का सरासर उल्लंघन है।।  
  इस प्रकार अध्यक्ष बनकर आप बहुत से रचनात्मक काम कर सकते हैं जो बगैर बने संभव नहीं । इधर इस जालिम निर्णय के बाद भगवान जाने कौन इस सीट पर आएगा, लेकिन इस सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए भरोसा है कि आनेवाला कैंडीडेट जानेवाले से कम हुनरदार  नहीं होगा । ।

                                                                                                       --संजीव शुक्ल अतुल



Monday, 12 October 2015

कब तक हम कहेंगे क्रातिकारियों को आतंकवादी

             [  क्रांतिकारियों के प्रति  श्रद्धांजलिस्वरूप यह लेख 1997 में कादंबिनी के अगस्त के अंक में प्रकाशित हुआ था  उन क्रांतिकारियों को सादर जिन्होंने राष्ट्र के स्वातान्त्र्य यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी । ]


      यवनिका के उठते ही  घोटालों के अप्रत्याशित दर्शनों से ऐसा लगा जैसे किसी नाटक में समय पूर्व ही भूलवश अचानक परदा उठ गया हो और अंदर बैठे पात्रों की वास्तविकता और स्थिति दर्शकों के सामने आ जाए । यह तो एक छोटी सी नजीर है,  वर्तमान राजनीति के चरित्र की । जीवन में नैतिकता का आँचल तो शायद हमने वहीं छोड़ दिया थाजहां पर हमें  अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’  के आश्वासन की अनुगूँज सुनाई पड़ी ।
      काकोरी कांड के ऐतिहासिक महापुरुष श्री रामकृष्ण खत्री की अन्त्येष्टि में किसी भी वरिष्ठ राजनेता ने वहाँ जाने की कर्तव्य-परायणता नहीं दिखाई । राजभवन की तरफ से भी मात्र औपचारिकता की खाना-पूरी हुई । अब तो औपचारिकता की भी विवशता नहीं रहीं । कितनी कृतघ्न हो चली है भारतीय राजनीति ।
      अभी दो-तीन वर्ष पहले ही राष्ट्र-पुत्र श्री खत्री जी राष्ट्रीय-पर्व पर राज्यपाल के आमंत्रण पर [जहां तक मेरी जानकारी है] राजभवन गए,   पर विचित्र एवं दुखद स्थिति वहाँ पर तब आ गईजब राजभवन के द्वार पर ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन्हें अंदर जाने से रोक दिया ।
      इस लज्जास्पद व्यवहार से न जाने कितने देशभक्तों के हृदय व्यथित हुए होंगे अनुमान कर लेना कठिन नहीं । कौन जाने स्वाभिमानी खत्री जी उस समय इन्हीं पंक्तियों को दुहरा बैठे हों ।
वक्त गुलशन पे पड़ा,  तो लहू हमने दिया
बहार आई तो कहते हैं कि तेरा काम नहीं ।।  
  क्रांतिकारी बनाम आतंकवादी
   सरकारी मानसिकता का तो खैर हमेशा से ही क्रांतिकारियों के प्रति विरोधी और द्वेषपूर्ण दृष्टिकोण रहा है।  स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी सरकारी शैक्षिक पाठ्यक्रमों में क्रांतिकारियों को आतंकवादियों बताया जाना कहाँ तक उचित है ? क्या इसे वर्तमान पीढ़ी को भ्रमित करने की कुचेष्टा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए । आज का छात्र एक ही शब्द में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का सामंजस्य कैसे बिठा पाएगा ।
   उद्देश्य को प्रधान न मानकर क्रांतिकारियों की कुछ आतंकपूर्ण कार्रवाइयों को ही आधार मान लेना और फिर उसे आतंकवादी विचारधारा से जोड़ दिया जाना अनुचित ही नहीं अन्यायपूर्ण भी है। क्रांतिकारियों की मानसिकता आतंकपूर्ण नहीं थी, क्रांतिकारियों ने हिंसापूर्ण कार्रवाइयाँ जरूर की पर वे सीमित रूप में मर्यादित और विवेकपूर्ण थीं न कि उच्छृखलतापूर्ण । क्रांतिकारियों कि सशस्त्र क्रान्ति की  भावना अंग्रेजों के विरुद्ध न होकर अंग्रेजों की साम्राज्यवादी एवं शोषणवादी व्यवस्था के खिलाफ थी ।
 यह बात भगत सिंह के एवं दत्त के असेंबली में बम फेकनें और नारे लगाने से भी स्पष्ट हो जाती है।  उनके द्वारा लगाए गए साम्राज्यवाद का नाश होके नारे को किसी भी दृष्टि से अंग्रेज़ विरोधी मानसिकता नहीं माना जा सकता । वहीं बम की प्रकृति हिंसापूर्ण न होकर बहरों को सुनाने के लिए विस्फोट  के बहुत ऊंचे शब्द की आवश्यकता होती हैके होने में थी ।
   आतंकपूर्ण कार्रवाइयों को करते समय सदैव इस बात की विशेष सावधानी बरती जाती थी कि चोट का शिकार कोई अन्य निर्दोष व्यक्ति न हो ।
        क्रान्ति के उपकरण
    क्रान्ति को और अधिक स्पष्ट शब्दों में परिभाषित करते हुए भगत सिंह कहते हैं क्रान्ति का विरोध करने वाले लोग केवल पिस्तौल, बम, तलवार, और रक्तपात को ही क्रान्ति का नाम देते हैं, परंतु क्रांति इन चीजों में ही सीमित नहीं है । ये चीजें क्रांति के उपकरण हो सकती हैं, परंतु इन उपकरणों के पीछे क्रांति की वास्तविक शक्ति जनता द्वारा समाज की आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तन करने की इच्छा होती है
  यह सारा विश्व जानता है कि ब्रिटिश नीति अन्यायपूर्ण और उसका चरित्र औपनिवेशिक था, पर इसके बावजूद यह हम पर गुलामी की मानसिकता का ही प्रभाव है कि हम उन्हीं की[शोषणवादी व्यवस्था की] दृष्टि से हर चीज देखने का प्रयास करते हैं ।
  कैसे मान लिया जाये कि हमने उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्व का समीक्षात्मक निष्कर्ष निकाल लिया है। क्या सरकारी मानसिकता को उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को परिभाषित करने के लिए सम्पूर्ण वाङमय में केवल यही एक उपयुक्त शब्द मिला है : आतंकवादी ।
   आतंकवादी शब्द हमारे सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखने वाले क्रांतिकारियों के हृदय को कितना बेधता होगा, इसका अहसास हमें उनकी क्रोध और वेदनापूर्ण अभिव्यक्तियों में सहज ही देखने को मिलता है।
   क्रांति और आतंकवाद में अंतर
 क्रांतिकारी यशपाल सिंहावलोकन में क्रांति एवं आतंकवाद पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि  “क्रांति और आतंकवादमें भेद हैं ।
   ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर इस भेद कि उपेक्षा की है, कांग्रेसजन शायद इस भेद को समझते ही न थे। भारतीय क्रांतिकारियों की भावना और नीति कोई सदा एक रूप और परिमित पदार्थ नहीं था ।
    भगतसिंह भी इस तथाकथित सोच के प्रखर विरोधी थे । असेंबली बम कांड के मामले में भगतसिंह ने अपनी इस टीस को व्यक्त करते हुए हाई कोर्ट में कहा था, “हमें जो दंड दिया गया है, उसके प्रति हमें कोई ऐतराज नहीं है,  हमें तो ऐतराज है केवल कातिल कहे जाने पर और हमारा उद्देश्य गलत  समझे  जाने पर।यह महज भावावेग नहीं बल्कि यह एक राजनैतिक चिंतक का क्रांति दर्शन के प्रति तटस्थ चिंतन है।
   शोषण एवं साम्राज्यवादी व्यवस्था की प्रतीक ब्रिटिश सरकार तो चली गई, पर इन क्रांति के संवाहकों को स्वतंत्र भारत में भी न्याय न मिल सका । भगतसिंह ने उद्दे श्य को कार्य से अलग न कर सकने के पक्ष में सेशन जज के सामने अपनी दलील रखते हुए कहा, “किसी आदमी को धमकाकर जेब खाली करा लेना और राज्य कर वसूलने वाले सरकारी आदमी को एक ही कोटि में नहीं रखा जा सकता, हालांकि परिणाम दोनों का एक ही होता है। ’’  निश्चित ही ये तर्कपूर्ण विचार उनकी सोद्देश्यपरक व्यापक दृष्टि को परिलक्षित करने में समर्थ है
   आतंक सहारा एक अध्यापक भी लेता है, लेकिन यथोचित एवं कल्याण के लिए । आतंक का सहारा कानून को स्थापित करने के विभिन्न निकाय भी लेते हैं । आतंक का सहारा राम ने सुग्रीव और समुद्र के विरुद्ध भी लिया था । निश्चित ही आतंक का यथोचित एवं मर्यादित सहारा लेने वाला आतंकवादी नहीं हो सकता ।
   राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा था,  “स्वराज्य की प्राप्ति में हिंसा और अहिंसा का प्रतिबंध-विवेचन ठीक नहीं ।
   स्वराज्य को पृथकतावाद या अलगाववाद मान लेना भूल है । स्वराज्य में केवल अपनी ही सहभागिता का भाव नहीं ,बल्कि दूसरों के साथ अपनी सहभागिता का भाव ही मुख्य होता है ।
   अंग्रेज़ यदि यहाँ के होकर रहते और शासन करते, तो कुछ भी बुरा न था । वह भी अकबर या शाहजहाँ की तरह भारतीयों के दिल में चिरस्थायी जगह बना लेते, लेकिन उनकी प्रवृत्ति भारत के उपनिवेशिकरण में थी । कहना न होगा कि शासकों की प्रवृत्ति महमूद गजनवी जैसी थी ।
         अंग्रेजों के अत्याचार
   सन 1898 में ही वायसराय एलिगन ने खुली धमकी दी थी कि भारतवर्ष तलवार के बल पर जीता गया था और तलवार के ही बल पर उसे ब्रितानी कब्जे में रखा जाएगा ।
    लोकमान्य तिलक नेकेसरीमें अरविंद की  आतंकपूर्ण नीतियों के समर्थन में लिखा यदि प्रशासन का रूसीकरण हुआ तो जनता निश्चय ही रूसी तरीके अपनाएगी ।
  हिंसक आंदोलन की आड़ में वायसराय इरविन द्वारा पब्लिक सेफ़्टी बिलके जारी किए जाने को चुनौती देते हुए नेहरू के यह शब्द हिंसक और अहिंसक आंदोलनों के द्वंद्व के कारण यह बिल नहीं आया है । ब्रिटिश सरकार स्वयमेव हिंसा की प्रतीक है, उसे उपदेशात्मक भाषण देने का कोई अधिकार नहीं ।
   जब अत्याचारी सरकार लोकतान्त्रिक तरह से विरोध करने के तरीकों का ही गला घोंटने पर तुली हो, तो  अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग में लाना स्वाभाविक ही है । जलियांवालाबाग का हत्याकांड और साइमन कमीशन के विरोध में तमाम राष्ट्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस का भारी दमनचक्र इसके प्रत्यक्ष ऐतिहासिक उदाहरण हैं । यह नृशंसतापूर्ण कार्यवाही ही लाला लाजपतराय की मृत्यु का कारण बनी ।
   यही कारण है कि क्रांतिकारियों के प्रति जनता की विश्वसनीयता और श्रद्धा उत्तरोत्तर दृढ़ होती जा
रही थी, वे उनकी [जनता] भावनाओं के आदरणीय पुरुष थे । यतींद्रनाथ दास के अंतिम दर्शनों हेतु लाखों लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आतंक को नकारते हुए उनकी शवयात्रा में सम्मिलित हुए ।
   भगतसिंह की फांसी से जनता ही नहीं वरन करांची का कांग्रेस अधिवेशन भी शोक में डूब गया था । प्रख्यात अहिंसावादी और गांधीजी के अनन्य  भक्त श्री पट्टाभि सीतारमैय्या के मतानुसार, “उस समय भगतसिंह का नाम सारे देश में गांधीजी की तरह ही लोकप्रिय हो गया था । 
     क्रांति : सात्विक घृणा
   आजाद हिन्द फौज के कुछ अफसरों पर मुकदमा चलाकर दंडित किए जाने के निर्णय से भारतीय जनमानस विक्षुब्ध हो उठा । देशव्यापी विरोध के कारण ब्रिटिश सरकार को अपना निर्णय बदलना पड़ा । वहीं इसके विपरीत आतंकवादी निरुद्देश्यपूर्ण कार्यों से एवं जनविरोधी कार्यों के कारण जनता का विश्वास पाने में विफल रहे । आतंकवादियों का न जनता में विश्वास होता है और न ही जनता का इनके प्रति । आतंकवाद को समाप्त करने के लिए जनता का भी यथेष्ट सहयोग मिलता रहता है । आतंकवाद पृथकतावादी मानसिकता से संचालित होता है जबकि क्रांति एकत्ववाद की भावना से उत्प्रेरित, जहां आतंकवादी विचारधारा कोरी घृणा पर टिकी हुई है, वहीं क्रांतिकारी विचारधारा अज्ञेय के अनुसार, ‘सात्विक घृणा में विश्वास रखती है।
     क्रांतिकारी किसी भी प्रकार के दुराग्रहों से पूर्णत: मुक्त थे । जेल में अव्यवस्था एवं अनीतिपूर्ण व्यवहार को खत्म करने के लिए अनशन – जैसे पूर्ण अहिंसक अस्त्र का भी सहारा लियाहालांकि इन लोगों ने अनशन को एक रणनीति के तहत इस्तेमाल किया, जिससे कि  जनता-जनार्दन से प्राप्त सहानुभूति से ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला जा सके । यतींद्रनाथ दास तथा मणीन्द्रनाथ बैनर्जी अपने क्रांतिकारी अनशन के कारण ही शहीद हुए ।
    इतना सब होते हुए भी हास्यास्पद स्थिति तब आती है, जब कभी-कभी सशस्त्र क्रांति के संवाहकों को सफलता और असफलता के मापदँडों से  तोला जाता है, उन्हें शायद यह सूक्ति नहीं मालूम कि प्रयास की पूर्णता आत्मोसर्ग में है सफलता में नहीं ।

                                                                                                           ---संजीव शुक्ल अतुल