Friday, 28 December 2018

मुक्तिबोध की संवेदना

आधुनिक हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध बहुत ही उल्लेखनीय कवि हैं। फैंटेसी का जितना अद्भुत प्रयोग आपने किया उतना और किसी ने नहीं। मुक्तिबोध भावनाओं के ही नहीं संभावनाओं के भी कवि हैं, उनका लेखन सकारात्मक बदलाव लाने की शुभेच्छा से प्रेरित है। वे कवि हैं, जनवादी चेतना के। वह प्रतीकों और बिम्बों की भाषा बोलते हैं और उस भाषा के जरिये वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर चोट करते हैं। यहां बिंब और प्रतीक कथ्य को आश्चर्यजनक तरीके से विचारोत्तेजक बनाते हैं और यही मुक्तिबोध के लेखकीय कौशल की सार्थकता है।लोकतंत्र में जिन खतरों को लेकर वह आशंकित थे, वो आज समक्ष हैं। उनकी एक बहुत ही चर्चित कविता है- 'अंधेरे में', यह बहुत बड़ी कविता है। यद्यपि यह कविता स्वतंत्रता के पश्चात नेहरू युग के काल खंड से जुड़ी है तथापि इस रचना का दृष्टि विस्तार उसी कालखंड तक सीमित नहीं है। कविता में उन परिस्थितियों, प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को अलोकतांत्रिक बनाने पर तुली हैं। वह तत्कालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के सतहीपन को बेनकाब करते हैं। यह जनवादी चेतना का आत्मकेंद्रित सत्ता के विरुद्ध एक तरह से विद्रोह है और आग्रह है यह लोकधर्मी चेतना का सुशासन हेतु।
     नेहरू के मॉडल की निर्मम आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने, उन्हीं नेहरू की मृत्यु पर  बहुत दुःखी होकर कहा कि लोकतंत्र के लिए अब ख़तरा और बढ़ गया है....
    आइये इस ऐतिहासिक कविता की कुछ पंक्तियां देखें...

"अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक"

विशुद्ध बुद्धिवाद और घोर आत्मकेंद्रीकता को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं कि--

 "ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,
बन गये पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य--त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य--मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए, फँस गये,
अपने ही कीचड़ में धँस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम..."

   और वे यहीं नहीं रुकते वह सामाजिक दायित्व का गम्भीर सवाल भी खड़ा करते हैं  ---

"वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’
  इस तरह मुक्तिबोध सम्पूर्ण मानव समाज की चिंताओं से सरोकार रखने वाले एक बहुत ही संवेदनशील दार्शनिक कवि हैं।।

Wednesday, 19 December 2018

नागार्जुन जी हिंदी साहित्य के अप्रतिम कवि हैं। भाषा के स्तर पर भी और शिल्प के स्तर पर भी। वह सिर्फ़ इसलिए स्मरणीय नहीं हैं कि उन्होंने बंग्ला,मैथिली और हिंदी में बहुत कुछ रचा बल्कि वह इसलिए स्मरणीय हैं कि इन्होंने जनसाहित्य को रचा; आप इसलिए भी स्मरणीय हैं कि आपने अपने साहित्य में आमजन को नायकत्व प्रदान किया। आमजन की व्यथा-कथा आपके रचनाकर्म की विषयवस्तु बनी ......यह साहित्य की एक नयी प्रगतिधर्मी चेतना थी जो अपनी संवेदनशीलता से साहित्य को अपनी ही तरह से समृद्ध कर रही थी।
 आपने कथित लोकतंत्री व्यवस्था के उस पक्ष पर प्रहार किया जो समाजवाद के नाम पर सत्ता में आया था पर पूंजीवादी तत्वों से गठजोड़ कर स्वहितों को बढ़ावा दे रहा था। बाबा ने इस सफेदपोशी छलछद्म को अनावृत्त कर दिया। कहना न होगा कि बाबा ने शोषित-असहाय जनसामान्य की मूकवेदना को स्वर दिया।
   बाबा नागार्जुन मानवीय संवेदनाओं और व्यंग्य के अप्रतिम कवि हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर कटाक्ष करने में  उनका कोई मुकाबला नहीं। जब नामवर सिंह जी यह कहते हैं कि "यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नही हुआ"  तो यूं ही नहीं कहते। उनकी एक कविता मन्त्र है जो मौजूदा दौर के जीवन के सभी पक्षों विशेष रूप से सामाजिक औ राजनैतिक पक्षों में विद्यमान वीभत्सता पर गहरा प्रहार करती है। हिंदी काव्य-जगत की बेहद चर्चित इस  कविता में भारतीय परम्परा के सर्वाधिक पवित्र रूप-विधान (मंत्र) का उपयोग समकालीन राजनीति के सर्वाधिक अपवित्र पक्ष को व्यक्त करने के लिए किया गया है। यह भी एक व्यंग्य का तरीका है.जो बाबा नागार्जुन ही कर सकतेहैं... .यह शिल्प के स्तर पर एक अद्भुत प्रयोग है .......  देखें

रचनाकार: नागार्जुन

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्वं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी खुश‌हाली
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती अर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली
ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड

ॐ ॐ ॐ
ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌
ॐ अष्ट‌धातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे
ॐ म‌हाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌मा जाय स‌र्व‌हारा
ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌

Friday, 7 December 2018

💐तुम्हारा नेता नहीं मेरा नेता बड़ा💐

💐तुम्हारा नेता नहीं मेरा नेता बड़ा💐

आज के इस अति बुद्धिवादी दौर में अगर आप भावनाओं से जुड़े तथ्यों को रेखांकित करते हैं तो आप प्रगतिशीलता के विरोधी ठहराये जायेंगे। बुद्धिवाद इस कदर हावी है कि लोग मानव समाज के विशुद्ध भावनात्मक सम्बन्धों को भी विवेक के तराजू पर तौलकर नये-नये निष्कर्ष निकालते हैं। पर ऐसे स्वघोषित निष्कर्ष हमेशा विशुद्ध बुद्धिवादी खेमे से आएं ऎसा जरूरी नहीं,  कभी-कभी यह प्रायोजित होता है। अगर ईमानदारी से देखा जाय तो यह ज़्यादातर प्रायोजित ही होता है, हालांकि होता बुद्धिवाद के आवरण में ही है; ठीक उसी तरह जैसे सामान से ज़्यादा उसकी पैकिंग महत्वपूर्ण होती है। ये श्रेष्ठता के स्थापन का मनोविज्ञान है।
   प्रायोजित इसलिए होता है कि इससे निकाले गये निष्कर्ष वांछित परिणामों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। राजनीति के क्षेत्र में यह प्रवृत्ति खूब फल-फूल रही है। राष्ट्रीय नायकों और राजनीतिज्ञों के आपसी संबंधों को मनचाहे रूप में व्याख्यायित करने के अपने निहितार्थ हैं। उनके वैचारिक विरोध को उनके आपसी संबंधों की दशा व दिशा तय करने वाला एकमात्र मुख्य निर्धारक बिंदु मान की गई सुविधावादी  राजीनीतिक व्याख्या के कई फायदे हैं।
दो राजनेताओं के मध्य विचार वैभिन्य को व्यक्तिगत शत्रुता के रूप में चित्रित कर उन्हें परस्पर विरोधी गुट के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाने की प्रवृत्ति इधर कुछ ज्यादा ही मुखर हुई है। वस्तुतः इस दुष्प्रवृत्ति के पीछे राजनेताओं को दो गुटों में बांटकर उनमें से एक गुट को अपने साथ जोड़कर उनसे जुड़े लोगों को साधने की कोशिश की जाती है, अर्थात अनुयायियों को वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश की जाती है। इस प्रकार यह सारा अभियान, सारा उपक्रम सत्ता प्राप्ति के निमित्त है। यह लोग यहीं नहीं रुकते बल्कि यह लोग तो महापुरुषों को जाति-विशेष में कैद करके जातिवादी राजनीति को और हवा देते हैं। भले ही वे महापुरुष अपने जीवन में जातिवाद के घोर विरोधी रहें हों, पर इससे उन्हें क्या फ़र्क पड़ता..... आदर्शवाद से चुनाव तो नहीं जीत सकते न!!! चुनाव जीतने के लिये ध्रुवीकरण जरूरी है।
   हां तो बात मत-मतांतर को विवाद की शक्ल में पेश करने पर हो रही थी। इधर सोशल मीडिया पर स्वघोषित इतिहासकारों की बाढ़ आ गयी है। ये लोग नेहरू,पटेल,राजेंद्र प्रसाद तथा नेताजी के आपसी संबंधों पर ऐसे साधिकार टिप्पणी करते हैं जैसेकि वह स्वयं इन महान चरित्रों के कार्य व्यापार व संबंधों के साक्षी रहें हों।
   कुछ मनीषी नेहरू व पटेल तथा नेहरू और प्रसाद को प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करते हैं। निश्चित रूप से कई मुद्दों पर बड़े नेताओं के मध्य मत-भिन्नता होती थी जो कि बहुत ही स्वाभाविक है। मत भिन्नता कहां नहीं होती? यह तो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। यही तो लोकतांत्रिक व्यवहार की अपनी खूबसूरती है।  इसे लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लेने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
  नेहरू- पटेल व नेहरू-प्रसाद के   आपसी संबंधों पर चर्चा करते समय प्रायः ही नेहरू को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। ऐसा लगता है कि नेहरू ताउम्र प्रतिद्वंद्वी नेताओं के लिये षड्यंत्र ही रचते रहे। इसके अलावा उन्होंने कोई सार्थक काम न किया। ऐसा करके आलोचक जाने-अनजाने में पटेल और राजेंद्र प्रसाद जी के विराट व्यक्तित्व को भी बौना कर देते हैं। क्या पटेल जी इतने समझौतापरस्त इंसान थे कि उन्होंने अपने विरोधी विचारधारा और सिद्धांतविहीन व्यक्ति वाले के साथ काम करना स्वीकार कर लिया। क्या ऐसे वीतरागी को भी सत्ता का मोह विचलित कर सकता है!!!! यदि ऐसा गांधी जी के दबाव के चलते उन्होंने स्वीकार किया था तो गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्हें इस दबाव से मुक्त हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नही हुआ। पार्टी में रहना तो फिर भी ठीक था लेकिन मंत्रिमंडल में रहकर सहयोग देना कम से कम असहमत लौहपुरुष की प्रकृति में तो नहीं
ही था। निश्चित रूपसे कई मामलों में पटेल के निर्णय नेहरू की तुलना में ज्यादा दूरदर्शी सोच वाले साबित हुए पर इससे इंकार कहां ??  प्रधानमंत्री का पद उनके विराट व्यक्तित्व के सामने महत्वहीन था।
   वस्तुतः उन दोनों के मध्य बहुत मधुर संबंध थे, उन दोंनो के बीच हुए पत्राचार इसकी गवाही देते हैं। उदाहरण के तौर पर पटेल के एक पत्र का हवाला दिया जा सकता है,जो उन्होंने नेहरू के उस अनुरोधपत्र के जवाब में लिखा था जिसमें पटेल से मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया गया था .... पटेल ने लिखा-
” आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”

 बेबाक़ राय देना बताता है कि ये राष्ट्र पुरूष स्वतंत्र चेतना से संपृक्त थे। विचारों की भिन्नता उनके आपसी संबंधों का निर्धारण नही करती थी। वे एक दूसरे के प्रति बहुत ही आदरभाव रखते थे। एक बार बताते हैं कि प्रसाद स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान किसी बिंदु पर चर्चा करने के लिये देर रात नेहरू से मिलने उनके निवास पर गए पर पता चला कि नेहरू सो गए हैं, प्रसाद जी ने नेहरूजी को जगाने से मना कर दिया और खुद बरामदे में ही सो गए। सुबह नेहरू जी उठे तो यह जानकर बहुत दुखी हुए कि प्रसादजी को उनकी वजह से कष्ट हुआ।
 इसी तरह एक और उदाहरण गांधी और सुभाष के संदर्भ में है। दोंनो भिन्न-भिन्न विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले जननेता थे। गांधीजी ने सुभाषबाबू के दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बनने का कड़ा विरोध किया पर सुभाष बाबू गांधीजी के विरोध के बावजूद चुनाव लड़े और जीते भी। बाद में इस्तीफा भी दे दिया। पर ध्यान दिया जाय कि गांधीजी की कार्यसंस्कृति के प्रखर विरोधी रहे नेताजी अपने व्यक्तिगत जीवन में गांधीजी के प्रति बहुत आदर का भाव रखते थे। विदेश में अपने सशस्त्र क्रान्ति के अभियान की शुरुआत के अवसर पर सबसे पहले आपने ही अपने रेडियो प्रसारण में बापू से आशीर्वाद लेते हुए श्रद्धाभाव से उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। विचारों का टकराव अपनी जगह था और एक-दूसरे के प्रति सम्मान व सद्भाव अपनी जगह।
     वो बड़े लोग एक दूसरे का सम्मान करके खुश होते थे और आज कुछ लोग उन बड़े लोगों की आपस मे तुलना करके और स्वघोषित परिणामों के आधार पर बड़े और छोटे कद के रूप में एक दूसरे को वर्गीकृत करके आत्मसंतुष्टि पाते हैं। अगर उन लोगों में कद और पहचान को लेकर इतनी महत्त्वाकांक्षा होती तो शायद एक पार्टी और प्रतिद्वंद्वी साथी के साथ इतने लंबे समय तक काम करना उनके लिए संभव न होता।  अलग पार्टी बनाने का विकल्प तब भी खुला रहता था पर तब पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर गठित होती थीं न कि अपनी पहचान व कद को बचाने की खातिर ।।
  निश्चित रूपसे गाँधी, नेहरू या अन्य कोई भी आलोचना से परे नहीं हो सकता, पर आलोचना तथ्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए; पूर्वाग्रहसे प्रेरित नहीं।कई निर्णयों के लिये गाँधीजी और पंडित नेहरू की निर्मम आलोचना की जाती है, की भी जानी चाहिए यदि ईमानदार विवेचना की ऐसी मांग हो; यदि उनके निर्णयों से देश की दशा और दिशा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हो।
                               -संजीव शुक्ल

Tuesday, 4 December 2018

उन्मादी भीड़ द्वारा किसी को मार दिया जाना बहुत ही दुःखद और बहुत ही जघन्यपूर्ण है। यह इंसानियत की हत्या है। मरने वाला चाहे जिस धर्म का हो, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता ..... दर्द तो एक जैसा ही होता है .....मरता तो इंसान ही है न !!
उन्माद और कानून दोनों परस्पर विरोधी चीजें हैं, दोनों साथ-साथ नही चल सकते। उन्माद विवेक विरोधी स्थिति है तो  कानून विवेक और व्यवस्था की उपस्थिति का सूचक। उन्माद को मौन स्वीकृति देकर आप कानून के राज की कल्पना नहीं कर सकते। अगर भीड़ ही न्याय-अन्याय का फैसला करेगी तो फिर कानून को स्थापित करने वाले निकायों को भंग कर दिया जाना चाहिए। प्रायः सियासी लाभ के लिये ऐसी हरकतों को बढ़ावा दिया जाता है। पक्ष की तरफ़ से भी और विपक्ष की तरफ़ से भी। कट्टरता, कट्टरता है, उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती चाहे जिस तरफ से हो। ये नहीं हो सकता कि इनकी वाली कट्टरता अच्छी और तर्कसंगत है और उनकी वाली बुरी!!!
  ... तुष्टिकरण खतरनाक है फिर चाहे वह जिसका भी हो। सामाजिक समरसता को ख़त्म करके आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं
अगर किसी भी पक्ष का तुष्टिकरण न किया जाय और कानून को निष्पक्षता के साथ काम करने दिया जाय तो ऐसी अप्रिय परिस्थियाँ पैदा ही नहीं होंगी .......