Thursday, 11 January 2018

हंगामों का महोत्सव हो या फिर महोत्सवों का हंगामा, दोनों ही स्थितियां वर्तमान (तत्कालीन) नेतृत्व की राजनैतिक व्यूह-रचना का परिणाम होतीं हैं  जिसमें जनता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की कसमें खायीं जाती हैं। कुल मिलाकर जनता में यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि जनता के हितों का बेहतर संरक्षण हमारे अलावा कोई नहीं कर सकता। इसके लिए अगर महोत्सव जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिये आत्म विज्ञापन किया जाय तो क्या बात है !! एक लंबे-चौड़े बजट वाला महोत्सव !!! सुना है  वंशवादी राजनीति की प्रभुता के प्रतीक वाले महोत्सव की तर्ज़ पर वैसा ही कुछ इस बार भी अन्यत्र.......
 ऐसे में अगर सांस्कृतिक धरोहर को जिंदा रखने और समाज के सांस्कृतिक परिवेश को सम्पुष्ट करने के नाम पर सरकारों द्वारा प्रायोजित महोत्सव यदि अपनी प्रतिबद्धताओं से इतर सिर्फ शिखर नेतृत्व के विरुद-गायन के केंद्र बनकर रह गये हैं, तो इसमें आश्चर्य कैसा ?? साहिर साहब भी कुछ      ऐसे ही ख़यालात रखते हैं। उनकी इस नज़्म से असहमत होना कठिन है ----
 "ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने है..
कुछ लोगों की कोशिश है,कुछ लोग बहल जायें..
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते है..
मुमकिन है कि कुछ अर्सा,इस जश्न पर टल जाए!
                   -साहिर

(वादा-ए-फ़रदा=कल के लिए किया गया वादा)"

Thursday, 4 January 2018

बाबा नागार्जुन

जिनकी लेखनी की तीखी नोक ने सत्ता के प्रतिष्ठानों में फल-फूल रहे राजनीतिक पाखंड को अनावृत्त किया जो कि कथित  शुचिता की धवल चादर से ढकें थे.....और राजनीतिक पाखंड ही क्यों; धर्म व समाजसेवा के नाम पर हो रहे अनाचार भी उनके नुकीले व्यंग्य बाणों के प्रहार से बच न सके ।   नागार्जुन का शिल्प विधान जितना विविधवर्णी था उतना ही विविध स्तरीय उनका वस्तु विधान भी था। संवेदना के विविध स्वरों की उपस्थिति बताती है कि वो कितने अद्भुत कलमकार थे। ऐसे ऊर्जस्वित कलम के धनी, व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर  कविकुल श्रेष्ठ नागार्जुन को प्रणाम !!
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रचनाकार: नागार्जुन

"जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !"
बाबा नागार्जुन मानवीय संवेदनाओं और व्यंग्य के अप्रतिम कवि हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर कटाक्ष करने में  उनका कोई मुकाबला नहीं। जब नामवर सिंह जी यह कहते हैं कि "यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नही हुआ"  तो यूं ही नहीं कहते। उनकी एक कविता मन्त्र है जो मौजूदा दौर के जीवन के सभी पक्षों यथा सामाजिक औ राजनैतिक पक्षों में विद्यमान वीभत्सता पर गहरा प्रहार करती है। हिंदी काव्य-जगत की बेहद चर्चित इस  कविता में भारतीय परम्परा के सर्वाधिक पवित्र रूप विधान (मंत्र) का उपयोग समकालीन राजनीति के सर्वाधिक अपवित्र पक्ष को व्यक्त करने के लिए किया गया है। यह भी एक व्यंग्य का तरीका है.जो बाबा नागार्जुन ही कर सकतेहैं....कुछ पंक्तियां देखें

रचनाकार: नागार्जुन


ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌।।