हंगामों का महोत्सव हो या फिर महोत्सवों का हंगामा, दोनों ही स्थितियां वर्तमान (तत्कालीन) नेतृत्व की राजनैतिक व्यूह-रचना का परिणाम होतीं हैं जिसमें जनता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की कसमें खायीं जाती हैं। कुल मिलाकर जनता में यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि जनता के हितों का बेहतर संरक्षण हमारे अलावा कोई नहीं कर सकता। इसके लिए अगर महोत्सव जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिये आत्म विज्ञापन किया जाय तो क्या बात है !! एक लंबे-चौड़े बजट वाला महोत्सव !!! सुना है वंशवादी राजनीति की प्रभुता के प्रतीक वाले महोत्सव की तर्ज़ पर वैसा ही कुछ इस बार भी अन्यत्र.......
ऐसे में अगर सांस्कृतिक धरोहर को जिंदा रखने और समाज के सांस्कृतिक परिवेश को सम्पुष्ट करने के नाम पर सरकारों द्वारा प्रायोजित महोत्सव यदि अपनी प्रतिबद्धताओं से इतर सिर्फ शिखर नेतृत्व के विरुद-गायन के केंद्र बनकर रह गये हैं, तो इसमें आश्चर्य कैसा ?? साहिर साहब भी कुछ ऐसे ही ख़यालात रखते हैं। उनकी इस नज़्म से असहमत होना कठिन है ----
"ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने है..
कुछ लोगों की कोशिश है,कुछ लोग बहल जायें..
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते है..
मुमकिन है कि कुछ अर्सा,इस जश्न पर टल जाए!
-साहिर
(वादा-ए-फ़रदा=कल के लिए किया गया वादा)"
ऐसे में अगर सांस्कृतिक धरोहर को जिंदा रखने और समाज के सांस्कृतिक परिवेश को सम्पुष्ट करने के नाम पर सरकारों द्वारा प्रायोजित महोत्सव यदि अपनी प्रतिबद्धताओं से इतर सिर्फ शिखर नेतृत्व के विरुद-गायन के केंद्र बनकर रह गये हैं, तो इसमें आश्चर्य कैसा ?? साहिर साहब भी कुछ ऐसे ही ख़यालात रखते हैं। उनकी इस नज़्म से असहमत होना कठिन है ----
"ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने है..
कुछ लोगों की कोशिश है,कुछ लोग बहल जायें..
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते है..
मुमकिन है कि कुछ अर्सा,इस जश्न पर टल जाए!
-साहिर
(वादा-ए-फ़रदा=कल के लिए किया गया वादा)"