Monday, 25 December 2017
*घोटाले कोई करता नहीं वो तो बस हो ही जाते हैं*
Sunday, 17 December 2017
दुष्यंत कुमार और उनका राजनीतिक-सामाजिक बोध
Saturday, 28 October 2017
नया फरमान !!!
...संजीव शुक्ल अतुल
Thursday, 12 October 2017
आरक्षण : एक विवेचना
पर आरक्षण का मौजूदा स्वरूप अपने लक्ष्यों से इतर राजनैतिक लाभ उठाने का एक जरिया व हथियार बन चुका है; एक ऐसा राजनैतिक हथियार जिसके द्वारा जातियों को आसानी से लामबन्द करके वोट बैंक में तब्दील किया जा सकता है। यह समान प्रतियोगिता के सिद्धांतों के खिलाफ अवसरवादिता को बढ़ावा दे रहा है। आखिर क्या वजह है कि इतने वर्षों बाद जब भी आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही जाती है तो इसे सीधे दलित विरोध से जोड़ दिया जाता है।क्या इतने वर्षों बाद भी यह देखने की जरूरत नही है कि इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचा है या नहीं ? आखिर क्यों ऐसी किसी भी टिप्पणी को दलित विरोध की द्योतिका मान लिया जाता है जो आरक्षण के अब तक के सफर का लेखा-जोखा बयान करती है ?
जो आरक्षण के वाकई में हक़दार हैं और जो अभी-भी लाभ से अछूते रहें हैं, उनके पक्ष में आवाज़ उठाना क्या अपराध है ? क्या उन लोगों के लिये आवाज उठाना गलत है, जो पात्र होने के बावजूद किसी आरक्षित जाति में नहीं आते ???
एक तरफ जाति की विषमताओं का रोना रोना और दूसरी तरफ जाति आधारित आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करना खुली अवसरवादिता नहीं तो और क्या है। प्रमोशन में आरक्षण इसी अवसरवादिता का एक और रूप है...आरक्षण के अंदर एक और आरक्षण !! समान पद हासिल कर लेने के बाद भी परजीविता का भाव, हद है.....
अगर कोई आर्थिक रूप से या सामाजिक रूप से कमजोर है तो उसे आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाय, सामाजिक संरक्षण दिया जाय, उसके बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाय, किताबें उपलब्ध कराई जाए और ज़्यादा से ज्यादा छात्रवृत्तियां दी जायँ ताकि वह समान प्रतियोगिता के स्तर पर आ सकें और उस स्तर पर समान प्रतियोगियों से मुकाबला कर सकें। प्रतियोगिता में आरक्षण देना मतलब योग्यता के स्तर को गिराना, उससे समझौता करना है। प्रतियोगिता में आरक्षण देने का मतलब वैसा ही है जैसे किसी पैदल दौड़ में किसी को अव्वल लाने के लिये मोटरसाइकिल पकड़ा देना...... यह तो प्रतियोगिता के मूल भाव को ही नष्ट कर देता है। शैक्षिक प्रतियोगिता में आरक्षण देना मानसिक विकलांगता का प्रमाणपत्र है, लेकिन स्वार्थ के आगे यह भी स्वीकार्य है। आरक्षण होना चाहिए लेकिन हर क्षेत्र में नहीं ठीक वैसे ही जैसे विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री के पद को आरक्षित नही किया जा सकता .......
- संजीव शुक्ल अतुल
Monday, 28 August 2017
गांधारी प्रवृत्ति
Thursday, 24 August 2017
दलों का वर्गीकरण
और आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके।अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले जनवादी, लोहियावादी व राष्ट्रवादी आदि-आदि जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता। आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान के प्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। इसके अलावा जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टियों के जरिये समाजसेवा-राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठा रक्खा है क्या उनके प्रति समाज का कोई दायित्व नही बनता?? यह परोपकारी प्रवृत्ति कहीं लुप्त न हो जाय इसके लिये इसका तत्काल संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही कुछ विशिष्ट परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही समाज सेवा की इच्छा को लोगों के द्वारा राजनैतिक रोजगार का ताना मारकर अपमानित न किया जा सके, इसके लिये भी इस तरफ लोगों में सकारात्मक सोंच को विकसित करने की जरूरत है ........ विशेषकर तब जब कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा,और बिहार में इसका बड़ा क्रेज हो....... जय परिवारवाद ।।।।
Monday, 21 August 2017
मौजूदा दौर
"मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं"
- संजीव शुक्ल अतुल
Thursday, 3 August 2017
एक परिचय
ऐसा ही कुछ-कुछ हाल है एक ऐतिहासिक उपन्यासकार श्री रमाकांत पांडेय 'अकेले' जी का जिन्हें अपने उपन्यास को छपवाने के लिए छपवाई देने के साथ-साथ तमाम संघर्ष करना पड़ा। इन्हें अपनी किताबें बेंचकर उससे मिले धन को अगली किताब को छपवाने के लिए देने पड़ते हैं। अभी पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार स्वंय सम्मानित हुआ ....हालांकि पुरस्कार की दहलीज तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई थी श्री ए.के.सिंह राठौर जी ने जो कि हरदोई के जिलाधिकारी सहित तमाम बड़े प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। वह स्वयं बहुत अच्छे साहित्य साधक हैं। आपने ही बताया कि पांडेय जी के उपन्यास विदेशों तक में अपना स्थान बना चुके हैं।
पांडेय जी के उपन्यासों से लोंगो को रूबरू कराने के लिए सबसे पहले हमारे पिताजी (श्री वीरेंद्र शुक्ल) ने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी मासिक मैगज़ीन 'चीनी उद्योग' में आपके उपन्यास 'मितौलगढ़' को धारावाहिक में छापा था। पांडेय जी ने करीब 72 उपन्यासों की रचना की है जिनमें कि केवल 35 उपन्यास ही प्रकाशित हो पाएं हैं। इसके अलावा आपके 10 या 12 उपन्यास रखरखाव के अभाव के चलते दीमकों की भेंट चढ़ गए।
मौजूदा समय में आपके उपन्यास अमेरिका, जर्मनी, यू.के, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व फ्रांस सहित लगभग 6-7 देशों की लाइब्रेरीज में शोभित हो रहें हैं। अमेरिका में तो क़रीब 16 और विदेशों के लगभग 240 पुस्तकालयों में पांडेय जी की किताबें वर्तमान में मौजूद हैं।
87 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार श्री पांडेय जी आचार्य चतुरसेन, के.एम.मुंशी तथा वृन्दावन लाल वर्मा की परंपरा के ऐतिहासिक उपन्यासकर हैं। यथार्थ और कल्पना के मिश्रित संयोजन से रचेआपके ऐतिहासिक उपन्यास अद्भुत हैं। इस समय आप उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रह्मावली गांव में रहते हुए साहित्य-साधना में रत हैं। आपके सम्मानित होने से प्रशंसकों की चिर संचित अभिलाषा अब फलित होती दिख रही है। आश्चर्य है कि अमेरिका की बर्कले, येले यूनिवर्सिटी और आस्ट्रेलिया के कई पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहीं पाण्डेय जी की पुस्तकें अपने देश में परिचय की मोहताज़ ही रहीं .....
Sunday, 16 July 2017
बाबूजी का कॉपीराइट
इधर एक घटना घट गई, लेकिन यह घटना अपने पूरे सौंदर्य-बोध के साथ उभर पाती, इससे पहले ही दब गयी। दब इसलिए नहीं गयी कि यह घटना, घटना जैसी नहीं थी; दरअसल बात यह थी कि इस बीच चीन ने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं जिससे हम लोग द्विपक्षीय सम्बन्धों में ऊष्णता और गतिशीलता लाने की गरज से पड़ोसी को गाली-फक्कड़ी करने में व्यस्त हो गए थे। हां, तो बात यहाँ उस दबी हुई घटना की ही करेंगे। बात यह थी कि कुमार विश्वास ने अपने एक नए प्रोग्राम "तर्पण" जो कि स्वनामधन्य कवियों के प्रति एक श्रद्धांजलि के तौर पर था, में हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना पढ़ी थी, हालांकि पढ़ी उन्हीं के नाम से लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों अमित जी ने बाबूजी की रचना को पढ़े जाने को बड़ी गम्भीरता से संज्ञान ले लिया। बच्चन साहब कुछ नाराज़ बताए गये। उन्होंने कुमारजी को नोटिस थमा दिया। 'तर्पण' शुरुआत में ही 'तड़पन' में तब्दील हो गया। पहले-पहल तो यही समझ मे आया कि जरूर कुमार से रचना-पाठ में कोई व्याकरणिक गलती हो गयी होगी,पर बात यह नहीं थी। बताते हैं, कुछ कॉपीराइट का मामला था। बात नाराजगी की थी भी।ठीक है, माना कि आप उनको श्रद्धांजलि दे रहे थे, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप नियम-कानून को ताक पर रख दें। श्रद्धांजलि की आड़ में आप कानून से खिलवाड़ करें,यह नहीं चलेगा।
वैसे भी भाई, जब आप अच्छी-खासी कविताएं लिख लेते हैं तो काहे को बाबूजी की कविताओं के पीछे पड़े हैं। और फिर अगर आपको बाबूजी जी की कविताएं सुनानी ही थीं तो परमीशन लेने में क्या दिक्कत थी।लेकिन बाद में कुछ ऐसे-वैसे सूत्रों से पता चला कि बात सही होने पर भी असली बात यह भी नहीं थी। मामला कुछ और ही था।
दरअसल यह सारी लड़ाई रचना के कॉपीराइट की आड़ में सम्बन्धों के कॉपीराइट की थी। कुमार बाबूजी की कविता गाकर यह साबित करना चाह रहे थे कि बच्चन साहब पूरे देश के हैं। उनकी रचनाओं को गुनगुनाने का अधिकार हर भारतवासी को हैऔर फिर उनके मानस पुत्र होने के नाते उनको तो सहज ही यह अधिकार हासिल है। चूंकि बाबूजी की रचनाओं में पूरा भारत बसता है सो भारतवासी उनके और वो भारतवासियों के हैं।लेकिन जैविक- पुत्र होने के नाते अमिताभ जी को कुमार की यह हरकत नागवार गुज़री।उनका मानना है कि बाबूजी पहले हमारे हैं, बाद में किसी और के। बाबूजी का सम्मान करना है तो शौक से करें,पर पहले हमसे परमीशन लें।
वैसे नोटिस मिलना उतनी बुरी बात नहीं जितना कि भाई लोग प्रचार कर रहें हैं। नोटिस किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि सदी के महानायक ने दी है। सदी के महानायक की तरफ से नोटिस मिलना भी किसी प्रशस्ति-पत्र से कम नहीं। इसके लिए कुमार विश्वास को बच्चन साहब का आभारी होना चाहिए, और हां अंत में जनहित में एक सूचना यह है कि जिस किसी को भी अमितजी से ऐसे प्रशस्ति-पत्र पाने की दिली इच्छा हो तो वह मधुशाला या उनकी किसी भी कविता को सार्वजनिक मंच से पाठ करे। उनकी मनोकामना जल्द ही पूरी होगी।।
Monday, 10 July 2017
इस हरे-भरे देश में चारे की कोई कमी नहीं चाहे कोई कितना भी चरे!!
एक चारा घोटाला क्या हो गया पूरा मीडिया लालूजी के पीछे पड़ गया। घोटाला तो सबने देखा लेकिन इस घोटाले ने लालूजी की समाजवादी-आत्मा को कितना कष्ट पहुंचाया होगा यह किसी ने नहीं देखा।घोटाला हुआ है और निश्चित रूप से हुआ है,यह लालूजी भी मानते हैं। लेकिन न चाहते हुए भी आपने यह सब किया तो सिर्फ इसलिए कि लोग-बाग ये जान सके कि चारा जैसे गौण क्षेत्र में भी घोटाला किया जा सकता है बल्कि निर्विघ्न रूप से किया जा सकता है।जहां चाह वहां राह। लालूजी नेअपने को बड़ा इंटेलिजेंट समझने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो को बता दिया कि जहां तुम्हारी बुद्धि काम करना बंद कर देती है हम वहीं से सोंचना शुरू करते हैं। कुल मिलाकर यह घोटाला नहीं बल्कि क्रिया-आधारित एक शिक्षण पद्धति है जिससे सीख लेकर CBI भविष्य में किये जाने वाले घोटालों का आसानी से पर्दाफाश कर सकती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यह हमारे राजनीतिक इतिहास में इकलौता ऐसा घोटाला है जो अपने अंदर लोकहित की भावना पाले हुए है, इको-फ्रेंडली होना इस घोटाले कि अनुपम विशेषता है। अतः इस घटना को श्रध्दाभाव से देखा जाना चाहिए।इसके अलावा इसके इकलौतेपन की एक और निशानी है वह यह कि इस घोटाले से कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ।इस घटना से क्षुब्ध होकर यदि किसी एक जानवर ने भी आत्महत्या की हो तो बताइए।भई ऐसा तो है नहीं कि चारा घोटाले के बाद हमारे देश में घास उगनी बंद हो गयी हो। इस हरे-भरे देश में चारे की कोई कमी नहीं चाहे कोई कितना भी चरे।।।।
Monday, 12 June 2017
कसम से न सुधरे हैं सुधरेंगे........
Monday, 5 June 2017
"प्रभु अगला जनम मोहि पुलिस का दीजो" (व्यंग्य)
इधर कई दशकों से पुलिस व्यवस्था पर गहन गंभीर अध्ययन किया गया और नतीजे के तौर पर जो निकल कर आया वह इस गरिमामयी व्यवस्था का चरित्र हनन जैसा कुछ था, पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। यह शानदार व्यवस्था है,एक झन्नाटेदार जॉब है। जो कुछ है वह सब मीडिया की करतूत है। वैसे, इसमें कुछ योगदान उन चलताऊ किस्म के निकम्मे,निंदा-प्रिय लेखकों का भी है जो विषयवस्तु के अभाव में पुलिस पर तमाम तरह की उल्टी सीधी बातें लिखते रहते हैं। कुल मिलाकर मीडिया ने जो भारतीय पुलिस व्यवस्था की ललित ललाम छवि पेश की है उसके चलते कई दशकों तक कई बापों ने अपनी होनहार औलादों को पुलिस व्यवस्था का अंग बनने से रोके रखा जैसे वह पुलिस सेवा में न जाकर के मानो चोरों की जमात में शामिल होने जा रहें हों। मीडिया को यह भी समझ नहीं कि उसके इस व्यवहार से अंतरराष्ट्रीय पुलिस जगत में भारतीय पुलिस व्यवस्था की क्या छवि बनकरके उभरेगी। आखिर इंटरनेशनल प्रेस्टीज भी कोई चीज होती है।
समय सबका बदलता है सो इसका भी बदला। सारी दुरभिसंधियों के बावजूद ट्रेंड बदला और स्वर्णयुग फिर से लौट आया। जो लोग पहले इस नौकरी के प्रति गलत रवैया अख्तियार किए हुए थे, वही अब अपने होनहारों को इस व्यवस्था में डालने के लिए जुगाड़ तलाशने में जुट गए। कुछ लड़के तो अपने-अपने बाप-दादाओं से इतना उकसाए गये कि अब उनकी नींदों में IAS/PCS बनने की जगह उन्हें पुलिस भर्ती के सपने आने लगे। वैसे भी इस टाइप की नई पीढ़ी प्री, मेंस और इंटरव्यू की निस्सारता को समझ चुकी है। वह एक बार में ही नौकरी वाले एग्जाम को रौंदने के फेवर में है। एक भर्ती और तिस पर तीन-तीन इम्तिहानों का कॉन्सेप्ट इस पीढ़ी को क्या किसी भले आदमी को समझ में नहीं आ सकता। वास्तव में यह समय, ऊर्जा और पैसे की बर्बादी वाला कांसेप्ट है।
पुलिस भर्ती के अपने आकर्षण हैं जो लड़के अपने बाप-दादाओं और स्कूली मास्टरों की रोज-रोज की नसीहतों के चलते अपने सामने वाले को कभी जी भर के गरिया,लतिया नहीं सके अथवा कई-कई डिब्बे च्यवनप्रास हजम करने के बावजूद लाइलाज शारीरिक कमजोरी के कारण अपने 'दुश्मन को देख लेने' की धमकी तक न दे सकें; ऐसे लोगों के लिए यह नौकरी वरदान जैसी दिखाई पड़ी। कहने का मतलब जो लोग यह सोचने लगे थे कि अब तो यह हसरतें इस पार्थिव शरीर के साथ ही दफन हो जाएगी, उनके लिए यह योजना संजीवनी समान हुई । इसमें सभी हसरतों को पूरा करने के लिए सारी सुविधाएं सहज ही मुहैया है।किसी को भी "कूटने के संवैधानिक अधिकार" की सहज उपलब्धता इस सेवा की एक अन्य विशिष्टता है जो अन्य किसी भी सेवा में नही है।
अभ्यर्थी इसे हीन भावना से उबरने के सुनहरे मौके के रूप में देखते हैं ।
इसके अलावा अमितजी और मिथुन दा के पुलिसिये रुतबे ने भी नए लड़कों के दिलो-दिमाग पर गहराई से असर डाला है,जिससे वह ताउम्र निकलना नहीं चाहते। साथ ही जॉब के दौरान ही बीबीशुदा होने की सम्भावनाएं भी विद्यमान रहती है। अपने आप अपने पसन्द की लड़की से शादी करने की तमन्ना (जैसा कि फिल्मों में होता ही है) किसे नही भड़काती। और तो और दुर्घटना के बाद पहुँचने से जान का भी जोखिम नहीं; पिस्टल के साथ मुआयना करने का रूतबा सो अलग।
हालाँकि इस बात को लेकर बड़ा हो-हल्ला होता है कि पुलिस सब कुछ निपटने के बाद पहुंचती है। यह बहुत ही घटिया किस्म का आरोप है। अरे भाई घटना होने के पहले कोई कैसे पहुँच सकता है?पुलिस है कोई अंतर्यामी तो है नही। अगर गलती से पहूँच भी जाय तो क्या गारन्टी है कि लोग यह नही कहेंगे कि पुलिस को तो सब पहले से ही पता था,वह उधर से मिली हुई है।
पुलिस के लेट पहुंचने की तथ्यात्मक वजहें है जिसे लोग नजरअंदाज कर देते हैं। भाई पुलिस तभी तो पहुंचेगी जब उसे सूचना होगी और सूचना तभी होगी जब कोई आदमी पिट-पिटाकर सामने वाले को कानूनी ललकार लगाते हुए तथा लड़ाई को पोतों-परपोतों तक घसीटने की ग़रज से पुलिस से बाकी की कार्यवाही निपटाने के लिए प्रार्थना करेगा। पुलिस की सक्रियता यहीं से शुरू हो जाती है। पुलिस शुरू से ही समानता के सिद्धांत को लेकरके चलती है; सबसे पहले तो वह उसको ठोंकती है जिसके खिलाफ शिकायत आई है। उसके बाद अगला नंबर पीड़ित,कुचलित शिकायतकर्ता का आता है। यह पिटाई शिकायत को थाने में लाने के एवज़ में मिलती है। बात भी सही है जब आपमें लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाने की कूबत नही है तो आप लड़ते ही क्यों हैं? अब अगर कोई यह चाहे कि लड़ाई का शेष भाग पुलिस निपटाए तो यह तो सरासर गलत बात है। यह तो अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर थोपने जैसा है,जिसकी क़ानून कतई इजाज़त नही देता इसलिए दोनों ही पूजे जाते हैं। यह पिटाई सिद्धांततः लड़ाई-झगड़े को हतोत्साहित करने के लिए की जाती है ताकि लड़ाई मुक्त-समाज का निर्माण हो सके। यह पिटाई उन लोगों के लिए चेतावनी है जो हल्की-फुल्की लड़ाई की इच्छाशक्ति रखने के बावजूद बड़ी लड़ाई मोल लेने की तमन्ना रखते हैं।
एक और आरोप जो आजादी के बाद से लगातार इस व्यवस्था पर लगता आ रहा है वह यह कि पुलिस अपराधियों को पकड़ती नहीं है उलटे उन्हें भागने का मौका देती है; ऐसा कहने वाले शायद पुलिस के आत्म बल से परिचित नहीं हैं। यह हमारी सनातन परंपरा रही है कि हम भागने वालों पर वार नहीं करते। सो इसी सनातन धर्म का पालन करते हुए हमारी पुलिस भागने वालों की पीठ पर फायर नहीं करती। रही बात पकड़ने की तो अगर ठिकाने पता है तो जब चाहे तब पकड़ लेंगे।
छिद्रान्वेषी लोगों की तो आदत होती है कमी ढूंढने की उन्हें नहीं पता कि पुलिस वाले किन-किन परिस्थितियों में काम करते हैं। आखिर वह भी इंसान ही है। चोर-उचक्कों को पकड़ने के साथ ही अब तो नेताओं के जीवन की सुरक्षा का दायित्व भी इन्ही के कंधों पर आ टिका है। अभी हाल ही में पूर्व सरकार के एक मंत्री लापता हो गए थे,जिन्हें महिला-जाति के शील-संरक्षण के एक विशेष मामले मे पुलिस बहुत शिद्दत से तलाश कर रही थी, पर समस्या यह नहीं थी। समस्या दरअसल यह थी कि मंत्री महोदय की सुरक्षा में लगे कुछ पुलिसकर्मी भी साथ में ही लापता हो लिए। मीडिया में बड़ी हाय-तौबा मची। मगर इस मीडियाटिक कोलाहल में पुलिस का दर्द पढ़ने की कोशिश किसी ने नहीं की। पुलिस की बात में दम था । उनका यह कहना कि जब हम खुद ही लापता है तो किसी को कैसे ढूंढे?
एक और घातक आरोप जो भारतीय पुलिस व्यवस्था के हृदय को चीरता रहा है, वह यह कि पुलिस अपराधियों का संरक्षण करती है। यह आरोप तो प्रथमदृष्टया खारिज होने के लायक है । भाई यह कौन नहीं जानता कि नेताओं की तरह अपराधियों में भी गुटबाजी होती है। अब जो गुट पकड़ में आ गया उसको फाइव-स्टार होटल में तो ठहराएंगे नहीं, उनको जेल में ही डालेंगे जब उनको जेल में रखेंगे तो उनकी रक्षा की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ेगी । अगर रक्षा नहीं करेंगे तो बाहर छुट्टा घूम रहा दूसरा गुट तो इनको टपका के चला जाएगा। यही वह जगह है, जहां पुलिस का मानवीय चेहरा अपने पूरे शबाब के साथ उभर कर आता है। लगभग सभी सरकारों ने पुलिस तंत्र को सम्मान दिया है तथा उन के माध्यम से बात-बात पर धरना-प्रदर्शन करने वाले नेताओं के सम्मान का अपहरण भी किया है। इसी क्रम में एक बार तमिलनाडु की दिवंगत अम्मा ने आधी रात को जो कई कालों तक रहे मुख्यमन्त्री रहे हैं को घर से उठवा लिया था। ख़ैर छोड़िये इन बातों को ....
हाँ तो बात सिर्फ पुलिस की होगी.... इधर गत सरकार ने एक अद्भुत सेवा शुरू की है। 100 नंबर की। ऐसी सेवा जिसमें आप याद भर करें और पुलिस हाजिर। पर एहसान फरामोश जनता ने फिर भी वोट नहीं दिया।
इस त्वरित सेवा पर भी लोगों द्वारा छींटाकशी की गई। हुआ यह कि एक जगह 100 नंबर की गाड़ी ने कुछ सवारियां बिठा ली इस पर समाज का "देखि न सकइ पराई विभूती" वाला तबका बड़ा नाराज हो उठा; तुरंत ही जांच बैठ गई ।बात निकली तो फिर निलंबन पर ही बनी। अब आप बताइए कि अगर खाली गाड़ी इधर-उधर घूम रही है और ऐसे में यदि राह चलते कुछ सवारियां बिठा ली गयीं तो कौन-सा अपराध हो गया। इस बीच सवारियों ने खुश होकर के कुछ दे दिया और भाई साहब ने उसे आशीर्वाद समझकर रख लिया तो कौन सा गुनाह हो गया । कोई अलग से तो पेट्रोल खर्च नहीं हुआ। किसी को गंतव्य तक छोड़ना तो समाज सेवा ही माना जाएगा। 'कर्म ही पूजा है' में अखण्ड विश्वास रखते हुए पुलिसवाले निर्लिप्त भाव से अपने काम में लिप्त रहते हैं। इन छोटी-मोटी दिक्कतों कोअगर ज्यादा तूल न दे तो यह सेवा आदिकाल से ही अपने आंतरिक सौंदर्य-बोध के कारण लोगों को लुभाती रही है। "सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का" जैसी निर्भीकतावाली उक्ति ऐसे ही नहीं प्रचलन में आ गयी। तमाम कुवांरी लड़कियो की दिली तमन्ना रहती है कि उन्हें पति के रूप में कोतवाल मिले और फेरे कोतवाली में हो।
कुल मिलाकर इस सेवा के सुनहरे अतीत का सम्मोहन आज भी बरकरार है । लड़कों की भी तमन्ना रहती है कि प्रभु अगला जन्म मोहे पुलिस का दीजो.......
....संजीव शुक्ल'अतुल'
टीचर्स कॉलोनी
महोली,सीतापुर
उ0प्र0
Saturday, 15 April 2017
*अपनी बात*
राजीव गांधी तकनीकी प्रगति के पक्षधर थे और अब उन्ही की पार्टी के नेता EVMके बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने का राग अलाप रहे है.अब इसे क्या कहें, प्रतिगामी मानसिकता या फिर सुविधावादी राजनीति की पक्षधरता। यह तो वही बात हुई कि मोटरगाड़ी के जमाने में बैलगाड़ी से यात्रा करने की वकालत करना। अपनी हार की असली वजहों को जानने के बजाय EVM में हार को तलाश करना दर्शाता है कि कांग्रेस अभी भी सकारात्मक राजनीति की इच्छुक नही है।
कांग्रेस को अपने ही दल के उन नेताओं पर गौर करना चाहिए जो दिग्भ्रमित पार्टी को सही दिशा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, अन्यथा पार्टी को अपने इतिहास पर गर्व करते-करते खुद ही इतिहास की विषयवस्तु बनते देर नही लगेगी ........
Sunday, 19 March 2017
राजनीति का हुड़दंगी विश्लेषण (व्यंग्य)
प्रदेश के चुनाव परिणामों ने राजनैतिक जगत में बड़ी खलबली मचा दी है। ख़बरों के भूखे लोगों के लिए एक खुराक मिल गयी; बैठे- बिठाए लोगो को को एक मुद्दा मिल गया। लोग-बाग सब काम छोड़-छाड़ के राजनैतिक गुणा-भाग व नफा- नुकसान के आकलन में जुट गए। कोई किसी से कम नहीं,सब के सब धुरंधर खोजी विश्लेषक। कुछ तो मास्टर-माइंड की भूमिका संभाल लेते हैं और ऐसे-ऐसे तर्क व खुफिया बातें पेश करते हैं जो कि उससे पहले किसी के दिमाग़ में नहीं आयीं थी। यहाँ तक कि जिसे हाई कमान कहा जाता है उसके दिमाग में भी नहीं। लेकिन भाई यहीं तो निशानी है धुआंधार प्रगतिशील विश्लेषकों की।सामान्य बातें तो सभी लोग जानते हैं,बात तो तब जब कोई नई बात पेली जाय। हाँ आघात तब लगता है जब राजनीति का क,ख,ग,घ भी न जानने वाले लोग बड़ी-बड़ी बातें कर राजनैतिक बुआ बनने लगते हैं। कोई गठबन्धन को राजनैतिक भूल बता रहा तो कोई राहुल की योग्यता पर सवाल खड़ा कर रहा है। अब जैसे इन्हीं को ले लीजिये ; एक कट्टर असहिष्णु विश्लेषक ने कांग्रेस को चुकी हुई पार्टी बता दिया । अब क्या भला ऐसा माना जा सकता है। यही दुखद पहलू है इस देश का। जिनकी राजनैतिक समझ कुल तीन-चार साल की है वो 125 साल पुरानी कांग्रेस पर टिपण्णी करने लगते हैं। ऐसे लोगों को चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं होता।
माना कि गठबंधन के समय कांग्रेस की हालत उन यात्रियों जैसी थी जिन्हें डग्गामार बसों में सीट न मिलने पर कंडक्टर के द्वारा खड़ा कर दिया जाता है। मगर जब बात समाज के हित के लिए हो तो व्यक्तिगत मान-अपमान मायने नहीं रखता। यही वह बात है जो उ.प्र. में सीटों के लिए तरस रही कांग्रेस को महान बनाती है। यह गठबंधन जरूरी था,सहिष्णुता स्थापन के लिए। सहिष्णुता को बचाने के लिए यह एका तब और जरूरी हो जाता है जब असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठाने वालों के पास वापस करने के लिए एक भी पुरस्कार न बचे हों । ऐसे लोगों को, कायदे से वापस करने के पहले उस मानपत्र की दस-दस फोटो कॉपी कराके रख लेनी चाहिए थी,ताकि तथाकथित विरोध को सतत् बनाया जा सके।
यह गठबन्धन पारिवारिक समाजवाद के सरंक्षण के लिए भी जरूरी था। अखिलेश जी इसको शिद्दत से महसूस कर रहे थे, वह समाजवाद से पारिवारिक समाजवाद तक की यात्रा में नए आयाम जोड़ना चाहते थे । यद्यपि वह पारिवारिक समाजवाद की अब तक की प्रगति के लिए इसके संस्थापक और अपने बापू के प्रति कृतज्ञ तो थे पर पता नही क्यों उन्हें इधर लगने लगा था कि उनके बापू अपने मूल्यों से भटकने लगे हैं। वे समाजवादी कुनबे में कुछ बाहरी लोगों को घुसेड़ रहे हैं। सो समाजवादी मूल्यों की खातिर वो अपने पिताजी से भी भिड़ गए और भिड़े तो ऐसा भिड़े कि फिर किसी को नहीं छोड़ा । चाचा को तो भतीजे के नाम से ही कंपकपी आने लगती। इन्हीं मजबूरियोके चलते सपा -कांग्रेस गठबंधन जरूरी लगा होगा। उन्हें लगा होगा कि कहीं जनता मोदी के बहकावे में न आ जाये और उनके विकास को मानने से इन्कार कर दे। सो भाजपा को राजनैतिक दंगल में मात देने के लिए गठबंधन बहुत ही आवश्यक था। लेकिन अखिलेश के सर पर अभीभी लड़ने का भूत सवार था जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस को 2-4 फ़ालतू सीटें भी देने से साफ़ मना कर दिया । वह तो कहिये कि राहुल गांधी ने ज्यादा सीटें नहीं मांगी थी और जितनी मांगी थी उतनी भी नहीं मिलने पर बुरा नहीं माना। वैसे ये राहुल गांधी का बड़प्पन है कि वो किसी बात का बुरा नहीं मानते मगर एक मुख्यमंत्री ने तो अपना छुटप्पन दिखा दिया। अरे भाई इतनी बड़ी पार्टी के नेता ने आपसे कुछ सीटें क्या मांग दीं आप ज़मीन ज़मीन नही चले, हवा में उड़ने लगे। ऐसी कांग्रेसी हाय लगी कि बस पूछो नहीं।
जब बात कांग्रेस की चल ही पड़ी है तो यह बताना लाज़िमी है कि राहुलजी की सांगठनिक क्षमता ग़जब की है जो कि इस चुनाव में साबित भी हो गया है। यह राहुल जी के सांगठिनिक कौशल का ही कमाल है कि उन्होंने कांग्रेस के वोट प्रतिशत को शेयर मार्केट की तरह उछाल दिया। उन्होंने सिर्फ मिली हुई 100 सीटों पर 7 सीटें हथिया कर दिखा भी दिया।अद्भुत था चुनाव प्रबन्धन! अब आप बताइये कि यही सीटें अगर 403 में मिली होती तब क्या परसेंटेज रहता??
चुकी हुई कांग्रेस कहने वालों को शायद कांग्रेस की जुझारू क्षमता का शायद अंदाजा नहीं था. इसकी जुझारू क्षमता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उसने इस चुनाव में अनुप्रिया पटेल की पार्टी को बहुत कड़ी टक्कर दी। Neck to Neck मुकाबला था ।
इसके बावजूद जब कुछ लोग राहुल गांधी के सामान्य ज्ञान पर सवालिया निशान लगाते हैं तो दुःख होता है। कहते है कि राहुल गांधी आलू की फैक्ट्री लगाने की बात करते हैं। पता नहीं, उन्होंने ऐसा कहा भी था या नहीं और अगर कहा भी है तो सिर्फ कहा ही तो है, लगा तो नहीं दी । कहने का मतलब यह है कि बेवजह बड़े नेताओं की काबिलियत पर शक नहीं करना चाहिए। वो कितनी ही हल्केपन वाली बातें करें आप उसको हल्के में लेने की गलती न करें। चुनाव होली में हुए हैं तो इसके मतलब यह थोड़े ही हैं कि आप विश्लेषण में हुड़दंगी मचाएंगें ।।।।।
-- संजीव शुक्ल'अतुल'
Tuesday, 14 March 2017
नज़रिया
अब बीजेपी का चूंकि सत्ता में आना तय हो गया है इसलिए उसकी और उसके नेताओं की जिम्मेदारी बढ़ गयी है। उसे कट्टरता और तुष्टिकरण को अस्वीकार्य कर चाहे वह किसी की भी हो,समरसता के भाव से आगे बढ़ना होगा। जिस तरह सिर्फ हिन्दू प्रतीकों के विरोध को धर्मनिरपेक्षता नही माना जा सकता उसी तरह मुस्लिम-विरोध का दृष्टिकोण भी ठीक नहीं। सबका साथ सबका विकास ही उचित दृष्टिकोण है। अटल जी की सर्वस्वीकार्य नीति और विज़न को अपनाना होगा। उसे नकारात्मक छवि के ठप्पे से अलग दिखना होगा जिसमे कि विरोधियों के ध्रुवीकरण करनेकी नीति के साथ साथ खुद इनके कुछ नेताओं का भी योगदान रहता है।अब ध्रुवीकरण करके प्रबुद्ध जनता को बेवकूफ नही बनाया जा सकता। हर मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने वालों को आत्मविश्लेषण करना होगा। मुद्दे उसके असल जीवन से सम्बंधित होने चाहिए । परीक्षा आयोगों की शुचिता को बहाल करना प्राथमिकता में होना चाहिए। ध्यान रहे कि साक्षात्कार के नाम पर खूब घालमेल होता है,। हाई कोर्ट के कहने पर भी अपने मन का लोकायुक्त नियुक्त करने की जिद और आयोगों में मानकों को दरकिनारकर व्यक्तिविशेष को बिठाने के क्या निहितार्थ सकते हैं? क्या जनता की आँख पर पट्टी बंधी है। क्या उस व्यक्ति को माननीय बने रहने का हक़ है जिसे पुलिस ढूंढ रही हो और उसका अता पता न हो। क्या प्रदेश के मुखिया का इस पर कोई दायित्व नही बनता था? अगर वह माननीय है तो उन्हें पुलिस क्यों ढूंढ रही है और यदि वह माननीय नहीं हैं तो फिर वह माननीय क्यों बने हुए है, विशेषकर राज्यपाल की टिप्पणी के बाद भी। प्रदेश का मंत्री 'चूहा भाग बिल्ली आई ' का खेल खेले; हद है!! ऐसे विलुप्तप्राय मंत्री जिस सरकार में होंगे वह सरकार कब तक साकार रहेगी । समाजवाद से पारिवारिक समाजवाद तक की यात्रा को क्या एक उपलब्धि के रूप में देखा जाय ? नवागत परिणाम इन्हीं प्रतिक्रियाओं का परिणाम है ........
Friday, 27 January 2017
चुनावी दांव-पेंच
सत्ता में भागीदारी हेतु उत्तर प्रदेश में गठबंधन रुपी समर्पण. ऐतिहासिक राष्ट्रवादी पार्टी की हालत उन यात्रियों जैसी है, जिन्हें डग्गामारी के चलते गाड़ी में जगह न मिलने पर खड़ा कर दिया जाता है। क्या बात है! चाल, चरित्र, चेहरा कुछ भी अपना नहीं .
संघर्ष से बचते हुए क्या इसे सुविधावादी राजनीति के एक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अस्तित्व की लड़ाई ऐसे तो नही जीती जाती !!!!
Friday, 20 January 2017
राजनीति का एक पहलू यह भी ...
ये सच है कि कुछ गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिध की जाती है पर वह कामयाब नही होती। अब जैसे कि असहिष्णुता के नाम पर काफी बवाल हुआ। जो एक आध घटनाएं घटी वो निःसंदेह निंदनीय है और उनकी भर्त्सना होनी ही चाहिए पर इन पर वितंडावाद खड़ा करना और इन घटनाओं को राष्ट्रीय चरित्र के रूप में व्याख्यायित करना गलत है।
तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता के रूप में परिभाषित करने के राजनैतिक निहितार्थ जो भी हो पर समाजिक सद्भाव की दृष्टि से यह घातक मनोवृत्ति है फिर चाहे वह तुष्टिकरण हिंदुओं का हो या मुसलमानो का या फिर किसी और सम्प्रदाय का । सर्वधर्म संभाव ही यहाँ के समाज की मुख्य पूँजी है और विश्वास है गंगा जमुनी तहजीब में। ...........चर्चा अगर होनी है तो सभी मुद्दों पर होनी चाहिए। लेकिन हमारे यहाँ नेता बहुत चालाकी से उन विषयों पर बहस करने से कतराते है जो धार्मिक मान्यताओं से टकराते हैं।अगर कोई प्रश्न सामाजिक व मानवीय सरोकारों से जुड़ा हुआ है तो क्या उस पर इसलिए बहस नही की जा सकती है कि वह धार्मिक विषय है। तीन तलाक के अगर मानवीय और सामाजिक सरोकार है तो उस पर विमर्श क्यों नही हो सकता । धर्म के नाम पर संकीर्णता ठीक नहीं ।अपने राजनैतिक नफा नुकसान को ध्यान में रखकर मुद्दों को उछालना या फिर उनको विमर्श की परिधि से बाहर धकेल देना स्वस्थ मानसिकता का द्योतन नहीं है पर यह भारतीय राजनीति का वर्तमान है। इस सत्तावादी लोलुप प्रवृत्ति पर प्रहार आवश्यक है ।।।
दलों का वर्गीकरण और संभावनाएं
दलों के वर्गीकरण में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। दलों के वर्गीकरण का विस्तार किया जाना चाहिए। अफ़सोस है कि संविधान निर्माता इस मामले में अपनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय सोंच के संकुचित दायरे से आगे नही बढ़ सकेऔर आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके। अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले लोहियावादी, राष्ट्रवादी आदि आदि (सभी उदाहरण देना ठीक नही) जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता।
आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान केप्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। कुछ प्रदेशों में तो आलम ये है कि अगर एक ही परिवार में बाप-बेटे,चाचा-भतीजे में नही बनी तो लड़ने की इच्छाशक्ति के चलते वह नई पार्टी की नींव रख देते हैं और इस तरह वह पारिवारिक असहमति को लोकतान्त्रिक स्वरूप देकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं।
जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती।। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि परिवार के लोगों को राजनैतिक रोजगार देने पर लोग-बाग आपत्ति न उठा सकें....... जय परिवारवाद ।
Tuesday, 17 January 2017
चलते-चलते....
एक निग़ाह इधर भी...
Monday, 16 January 2017
बस यूं ही ......
Thursday, 12 January 2017
रचनाकार: गोपालदास "नीरज"
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।