Wednesday, 22 May 2013

जहाँ संवेदनाएँ मर चुकी हों ,फिर शिकायत क्या करें

जहाँ  संवेदनाएँ  मर चुकी हों ,फिर शिकायत क्या करें।
वक्त आने पर बदल  जायेंगे वो कुछ इस तरह ,
ऐसे लोगों की शराफत का भरोसा क्या करें।
है जहाँ इंसानियत घाटे का सौदा  हर समय,
 ऐसी महफिल में, कदम रख़ करके भी हम क्या करें।
तुम मुझे ना जान पाए ,उम्र भर रह करके भी
है कमी कोई कहीं पर  और अब हम क्या कहें।
जिसको बनाने में लगाये  जिन्दगी के अहम हिस्से ,
गर वो ही नजरें चुराये  फिर शिकायत क्या करें .                                                                                      चाहने से क्या फर्क पड़ता है, चाहो खूब चाहो
इसमें मुनाफा गर न हो, फिर चाहकर वो क्या करें ।
आस्थाएँ बिक गईं, सत्ता की गलियों में कहीं ।
जो न सत्ता दे सकेउस वाद का वो क्या करें । । 
                                         
                                                                   संजीव शुक्ल "अतुल "
                                                                        
                                                                     

Saturday, 11 May 2013

अब देश बन गया मधुशाला

           लोकतंत्र  में  लोक नहीं ,है केवल तंत्रों का जाला
           लोग पी रहें हैं मन भर अब देश बन गया मधुशाला।
           पाखंडी सरकार चलाते ,देश-प्रेम का स्वांग रचाते
           जन -सेवक का ओढ़ लबादा ,कुर्सी पर अधिकार जताते .
           सत्ता की मदहोशी में तुमने  क्या -क्या है कर डाला
           लोग पी रहें हैं मन-भर .अब देश बन गया मधुशाला।
           वोट की खातिर मजहब बांटें ,जाति -धर्म पर प्रेम दिखाते .
           आपस  में में लड़वाकर सबको ,गीता का उपदेश सुनाते .
           लोकतंत्र के रंगमंच पर घोटालों का नया पियाला
            लोग पी रहें हैं मन-भर .अब देश बन गया मधुशाला।

Wednesday, 8 May 2013

जातिवादी राजनीति

                                 जाति  के  वर्चस्व  को  लेकर  यहाँ  संघर्ष   है ,
                                 आपसी   सदभावनाओ  की  चिता  जलने  लगी।
                                 कौन  किसको  चाहता    है  क्या  करोगे  जानकर ,
                                 अब  तो  हर  एक  होलिका  की गोद  में  प्रहलाद  है।।

                                                                                                               _संजीव शुक्ल "अतुल "

Monday, 6 May 2013

MANMOHAN KO MOHNE CHALI

                 प्रेमबंधन  में  स्वयमेव  बंधकर  चली
                                                                 सपनों   के झरोखे  से   मैं निकली  .
                 भावों के  स्यंदन  पर  चड़कर
                                                                अपने  प्रियतम  को  अपनाकर

                मैं  आज  कहाँ  किस  ओर  चली
                                                              मैं  बनी  फूल  ,किसलय  ,लतिका

              मनमोहन  को  मोहने  चली ।।

                                                                                                            
                                                                                                         -  संजीव शुक्ल "अतुल "                           

Saturday, 4 May 2013

Dalit chintan ka vish vaman

इधर कई दशकों से  दलित चेतना के नाम पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वह सिर्फ एक पक्षीय आलोचना [सवर्णवाद  का विरोध ] में  सिमट कर रह गया है .  यह चिंता का  विषय है। दलित चिंतन और दलित राजनीत में कैद अम्बेडकर को ठीक  उसी तरह इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कांग्रेस वालों ने  गांधी को जहां  चाहा और जैसा चाहा  इस्तेमाल किया .अम्बेडकर का सवर्ण के प्रति विरोध होते हुए भी पूर्वाग्रह से मुक्त होना आज के पूर्वाग्रह से ग्रस्त दलित चिंतन को आत्ममंथन करने के लिए कहता है। अम्बेडकर सामाजिक एकता के पक्षधर थे ,जबकि आज उनके ही अनुयायी उनके चिंतन को गलत दिशा में मोड़कर बड़ी ही निष्ठुरता के साथ आगे ले जा रहें हैं।
आज दलित चिंतकों की रूचि दलित समाज के बारे में कम सवर्णों के विरोध  में जयादा है। दलित चिंतन समन्वय की भावभूमि पर नहीं बल्कि विग्रह की भावभूमि पर टिका हुआ है। जबकि अम्बेडकर सवर्ण वाद के विरोध  या अंध विरोध को सामाजिक -एकता की कीमत पर करने को उचित नहीं मानते थे। कहना आवश्यक नहीं कि इन दलित पैरोंकारों के लिए सवर्णवाद का विरोध सत्ता प्राप्ति के शार्टकट रास्ते को हथियाने की रणनीति के रूप में है .चुनावों में वोट बैंक की भूमिका निभाने वाली जातीय अस्मिता को सवर्णवाद के खिलाफ दुष्प्रचार करके ही मजबूत किया जा सकता है। यद्यपि आज के 5 0 साल पहले जातीय वयवस्था में शोषण के तत्त्व मौजूद थे फिर, भी सामाजिक  सदभाव इस कदर नहीं खराब  था जितना कि आज है। आखिर क्यों ? आज तो शोषण नहीं है। अगर कोई शोषित है तो वह है  सिर्फ  गरीब। यहाँ मेरा अभिप्राय शोषण वयवस्था को उचित ठहराना नहीं है ,बल्कि मानवीय संबंधों को बेहतर बनाने के सन्दर्भ में आवशक संयोजन के तत्वों की जानबूझकर की गयी उपेछा की तरफ इशारा करना भर है। जातीय अस्मिता को राष्ट्रीय अस्मिता से ऊपर रखकर हम दलित चिंतन को किस तरफ धकेले जा रहें है।
              आज वोट -बैंक की राजनीत  में दलित समाज में  जनमें महापुरुषों को उनकी योग्यता तथा उनकी प्रशासनिक कार्यकुशलता से कहीं जयादा उनके दलित  होने को महत्व दिया जाता है। उनकी सारी योगय्ताओ व  विशिष्टताओ को महज संयोग मानने और दलित होने को एक स्वाभाविक व बड़े आधार के रूप में विज्ञापित करने के पीछे इन दलित आग्रह्कर्ताओं की जो भी नियति रही हो लेकिन इतना निश्चित है कि यह उनके दलित चिंतन का सबसे नकारात्मक व घटिया पहलू है। 
            सवर्णों के विरोध को ही दलित चेतना की जाग्रति मानने वालों को अब गाँधी और लोहिया  भी दलित विरोधी नजर आने लगे। आज गाँधी को शैतान की औलाद कहना आसान है जबकि आंबेडकर के प्रति की गयी  तटस्थ टिप्पणी भी दलित विरोध की द्योतिका हो जाती है। गाँधी  का दलित प्रेम व बिनोबा भावे का भूदान आन्दोलन दलित चिंतन की विषय -वस्तु नहीं हो सकता। यह दलित चिंतन की दलित मानसिकता है। गाँधी जी का दलित बस्तियों में जाकर सफाई करना इन्हें सिर्फ नाटक लगता होगा। क्या गाँधी ने  यह सब अम्बेडकर  को खुश करने के लिए किया था या वोट बैंक के लिए ?  जिसे निराला और प्रेमचंद जैसे क्रन्तिपुरुशो को अपनाने से परहेज हो उसे क्या कहा जाय।
                  भारतीय संस्कृति को पुष्ट बनाने में कबीर, रैदास, तुलसी व सूर सभी का अप्रतिम योगदान है। भारतीय संस्कृति कबीर, रैदास के बिना अपूर्ण है। चिंतन की  विभिन्न धाराओं को अपने में समेटना ही भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य है। कबीर को साहित्य में स्थान दिलाने का श्रेय इन  तथाकथित दलित चिंतन्कारों  को नहीं जाता। क्योंकि  इस दलित  चेतना  की उम्र १०० वर्ष से अधिक नहीं होगी, जबकि कबीर शताब्दियों से भारतीय वांग्मय का अभिन्न हिस्सा बने हुए  हैं।  रही बात तुलसी की लोकप्रियता की तो  इसका प्रमुख कारण  तुलसी के साहित्य का भारतीय जनमानस की अवतारवाद  के प्रति आस्था से मेल खा जाना तथा सरल भाषा में लिखा गया गेय काव्य। विरोधी पक्ष के प्रति इतना भी विद्वेष क्या जो तर्क -वितर्क की स्वस्थ परंपरा को ही बाधित कर दे या भावनाओं का घटियापन भाषा में उतर आये।
                दलित नायकों को भारतीय समाज में यथोचित स्थान दिला ने का आग्रह तो उचित है पर इन आग्रहों की ओट में उन महापुरषों पर कीचड़ उछालना गलत है ,जिन्होंने समाज मे समन्वय और समानता लाने की महती भूमिका निभाई है। इस तरह से न तो ऐतिहासिक चरित्रों को व्याख्यायित किया जा सकता है और न ही स्वस्थ बहस की परम्परा का सकुशल निर्वाह।।
                                                                               
                                                                                        - संजीव शुक्ल " अतुल "