Thursday, 24 September 2015

आरक्षण की राजनीति

  इधर दो घटनाओं ने आरक्षण को फिर से राजनीतिक-विश्लेषकों और राजनीति के खिलाड़ियो के लिए बहस की मुख्य  विषय-वस्तु के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है। पहली घटना हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेलों का लामबंद होकर के आरक्षण की मांग करना और दूसरा  पूर्व में संघ प्रमुख का वह बयान जिसमे उन्होने आरक्षण की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया था।  और वैसे भी समय समय पर आरक्षण की प्रासंगिकता को लेकर उसके पक्ष या विपक्ष में जोरदार बहस होती रही है। अतः जरूरत है कि इस विषय पर  पूर्वाग्रह मुक्त होकर के विचार किया जाय ।
   आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था शुरू से ही विवाद के केंद्र में रही है। विरोध आरक्षण का नहीं है, अपितु आरक्षण की पात्रता को निर्धारित करने वाले मानकों को लेकर के है। आरक्षण जोकि सामाजिक-आर्थिक विषमता वाले समाज में समानता , समरसता और सामाजिक-न्याय की स्थापना हेतु आवशक साधन के रूप में अपनाया गया था , आज सामाजिक विद्वेष की वजह बन चुका है।  कारण, जाति-आधारित आरक्षण ने जातियों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। इसमें एक तरफ वो जातियाँ हैं जो आरक्षण से लाभान्वित हैं और दूसरी तरफ वो जातियाँ हैं जो इस लाभ से वंचित हैं या फिर आरक्षण के चलते नुकसान उठा रहीं हैं। इससे वों जातियाँ भी गोलबंद होनी शुरू हो गईं हैं जो अपनी संख्या के बल पर आरक्षण को अपने हक में मोड़ने के लिए व्यग्र और उग्र हैं। यह जाति-आधारित आरक्षण की ही बलिहारी है कि आजकल नई-नई जातियाँ अपने नेतृत्वकर्ता के पीछे लामबंद होकर के आरक्षण की मांग करती रहती हैं और मजे की बात यह है कि आरक्षण की मांग उन जातियों के द्वारा की जाती है जो सामाजिक-आर्थिक रूप से न केवल सम्पन्न हैं बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में भी इनकी अच्छी-ख़ासी भागीदारी है। इस प्रकार इसने प्रकारांतर से जातियों के राजनीतिकरण को बढ़ावा दिया है ।
वर्तमान में आरक्षण सुविधावादी राजनीति का जरिया बन गया है। यही कारण है कि आरक्षण  की समीक्षा की मांग उठते ही कुछ नेता इसे सीधे पिछड़ों के खिलाफ अगड़ी जातियों के षड्यंत्र के रूप में प्रचारित कर पिछड़ी जातियों के एकमात्र संरक्षक बनने का दावा करने लगते हैं। उन्हें पता है कि आरक्षण के सहारे जातियों को  बहुत आसानी से गोलबंद करके वोटबैंक में तब्दील किया जा सकता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि आरक्षण से किन जातियों का कितना भला हो पाया है प्रश्न  यह है कि  आरक्षण के सहारे कौन पार्टी कितना और कब तक राजनीतिक-लाभ हासिल कर सकती है।
    जातियों के राजनीतिकरण का ही यह परिणाम है कि  मण्डल आयोग के समय जहां देश में 2052 पिछड़ी जातियाँ थीं वहीं 1994 में इनकी संख्या बढ़कर 3700 हो गई । सत्ता के केंद्र तक पहुँचने के लिए आरक्षण से बेहतर और क्या राजनीतिक हथियार हो सकता है। आज कोई भी पार्टी वोट-बैंक खिसकने के डर से आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा तक नहीं करना चाहती । यथास्थितिवाद की समर्थक ये पार्टियां  व्यवस्था के उन दोषों को भी दूर नहीं करना चाहतीं जिनके कारण आरक्षण का लाभ उठा रहीं जातियों के ही सभी लोगों को आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।  इसके लिए भी पहल सुप्रीम कोर्ट को करनी पड़ी । मसलन क्रीमीलेयर की अवधारणा को लागू करना और प्रमोशन में आरक्षण को खत्म करना ।  प्रमोशन में आरक्षण को लेकर अभी भी कुछ पार्टियां इसके समर्थन में खड़ी हुई हैं । आखिर आरक्षण के अंदर आरक्षण का क्या मतलब है। क्या यह घोर अवसरवादिता नहीं है ? अवसरवादी राजनीति का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि जो पार्टियां आरक्षण के मौजूदा स्वरूप को बनाए रखने की जबर्दस्त वकालत करती हैं वे ही महिला आरक्षण की विरोधी हैं । यह दोहरा चरित्र है इन पार्टियों का।  अगर ये पार्टियां वास्तव में पिछड़ों के उत्थान के प्रति चिंतित और समर्पित हैं तो क्यों नहीं टिकट बँटवारे में  और मंत्रिमंडल में अधिकाधिक संख्या में इन जातियों के लोगों को जगह देतीं हैं ।
    दरअसल यह  सुविधावादी राजनीति ही है कि हम सिद्धांतों की व्याख्या अपने राजनीतिक लाभ के हिसाब से करते हैं। अब सिद्धांतों की राजनीति नहीं होती वरन राजनीतिक लाभ के लिए सिद्धांतों को गढा जाता है। मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के अंदर कुछ अंतर्विरोध हैं जिनको दरकिनार कर हम आगे नहीं बढ़ सकते। क्या मौजूदा व्यवस्था के तहत आरक्षण के लाभ को कुछ जतियों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए या फिर इसमे समाज के सभी दलितों, वंचितों के सरोंकारों को स्थान देना चाहिए। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब उन लोगों को देना चाहिए जो इस व्यवस्था को निर्दोष और अपरिवर्तनीय मानते हैं। क्या उन वंचितों और पिछड़े समूहों का कोई अधिकार  नहीं  बनता जो इन आरक्षण-प्राप्त जातियों की सीमाओं में नहीं आते। वंचित-समूहों का जाति के आधार पर विभेदीकरण करना और इस आधार पर कुछ जातियों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराना,  कहाँ तक न्यायोचित है। क्या इससे जाति-मुक्त समाज के निर्माण का स्वप्न साकार हो सकेगा ?क्या इससे जातीय जकड़न और नहीं मजबूत होगी?
   आरक्षण जो कि प्रारम्भ में सिर्फ 10 वर्षों के लिए था और उसके बाद स्थिति की समीक्षा की अपेक्षा की गई थी पर समीक्षा का जोखिम आज तक नहीं उठाया गया बगैर यह सोंचे कि इसका लाभ वास्तविक लोगों तक पहुंचा भी है या नहीं । अगर आज भी सरकारी सेवाओं में आरक्षित-वर्ग की सीटें खाली रह जाती हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि आरक्षण का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुँच पा रहा है।समाज में हाशिये पर पड़े वंचित-समूहों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए और सामाजिक-न्याय प्रदान करने के लिए आरक्षण एक प्रभावी प्रयास के रूप में स्वागत-योग्य कदम है पर क्या यह प्रयास समय की कसौटी पर खरा उतरा है ? जिस विषय की समीक्षा किए जाने  का समय प्रारम्भ के 10 वर्ष  बाद  तय था उस विषय की समीक्षा का प्रश्न  क्या 65 वर्षों बाद भी उठाना गैर-मुनासिब है ? आज एक अपरिवर्तनीय व्यवस्था का रूप ले चुकी आरक्षण व्यवस्था पर की गई तटस्थ टिप्पणी दलित-विरोध की द्योतिका हो जाती है ।
   आज आवश्यकता है कि आरक्षण व्यवस्था को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए और उसमे सकारात्मक बदलाव लाएँ जाएँ ताकि यह वंचितों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने में महती भूमिका अदा कर सके। समाज में ऐसे तमाम  सामर्थ्यवान  लोग होंगे जो  वंचितों के प्रति सहानुभूति रखते हुए स्वतः आरक्षण छोड़ देंगे । इसके लिए आवेदन-पत्रों में एक अलग से कालम होना चाहिए  जो आरक्षण-मुक्ति की घोषणा से संबन्धित हो । ऐसे लोगों को सम्मानित किया जाना चाहिए। इसके अलावा क्रीमीलेयर की सीमा का भी कठोरता से पालन किया जाना चाहिए । साथ ही आरक्षण का आधार यदि आर्थिक कर दिया जाय तो इससे आरक्षण को व्यापक परिप्रेक्ष्य तो मिलेगा ही साथ ही इससे जातीय वैमनस्य को खत्म करने में भी सहायता मिलेगी, हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि वोट की राजनीति इसकी इजाजत नहीं देगी।


                                                                                                         ------      संजीव शुक्लअतुल। 

Wednesday, 16 September 2015

मिड –डे-मील में सुधार की गुंजाइश

आज आए दिन मिड –डे –मील में होने वाली गड़बड़ियों से इस क्रांतिकारी कार्यक्रम की सार्थकता संदेह के घेरे में आ गयी है। शायद ही कोई वर्ष ऐसा गुजरता हो जब इस कार्यक्रम के तहत परोसे गए संदूषित भोजन ने किसी त्रासदी को जन्म न दिया हो। कभी भोजन में मरा हुआ चूहा निकलता है तो कभी छिपकली। अखाद्य पदार्थों की मिलावट तो एक आम बात है। अभी हाल ही में लखनऊ के एक स्कूल में मिड-डे-मील के तहत परोसे गए भोजन को खाकर बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो गए और उनको तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसी तरह 16 जुलाई 2013 को बिहार के सारण जिले के धरमसती गाँव में संदूषित भोजन करने से 23 बच्चों की मृत्यु हो गयी। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति से मिड-डे-मील के  प्रति एक भय सा पैदा हो गया है। यह आश्चर्य और शर्म की बात है कि हम अभी तक ऐसा तंत्र नहीं बना पाए हैं जो इन घटनाओं को रोक सके।
    बेशक यह एक अच्छा प्रोग्राम है और यह भारत सहित विश्व के लगभग 169 देशों में गतिमान है। इस महत्वाकांक्षी योजना का वास्तविक उद्देश्य बच्चों को शिक्षा से जोडना था। भूखे पेट पढ़ाई नहीं हो सकतीकी भावना से शुरू किए गए इस कार्यक्रम से यह अपेक्षा की गई थी कि मिड-डे-मील के  आकर्षण के चलते गरीब बच्चे अधिकाधिक संख्या में स्कूल की तरफ रुख करेंगे। परिणामस्वरूप भारत में भी कानून बनाकर यह प्रावधान किया गया कि स्कूल जाने वाले प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाय। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1995 को इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इसी क्रम में अप्रैल 2001 में पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबरटीज़की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी प्राइमरी स्कूलों में एम डी एम को लागू करने का आदेश दिया। फलतः 28 नवंबर 2001 को यह योजना पूरे देश में लागू कर दी गई।
     साक्षारता-दर बढ़ाने के उद्देश्य से यह योजना बेहद आकर्षण से भरी हुई थी। तब सोंचा गया था कियह योजना शैक्षिक-जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन का माध्यम बनेगी ,पर आंकडो की बात जाने दीजिये। वास्तविक धरातल पर यह योजना नया कुछ न दे सकी उल्टे इसने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रकारांतर से प्रभावित ही किया है। सिर्फ लालच देकर शिक्षा से  बच्चों को जोड़ने की यह रणनीत कारगर सिद्ध नहीं हुई।  
   आज से 40-50 साल पहले जबकि यह योजना अपने अस्तित्व में भी नहीं आई थी तब प्राइमरी शिक्षा आज से कहीं ज्यादा प्रभावपूर्ण थी। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि तब न तो आज के समान बेहतर संसाधन थे और न ही इतने क्वालिफाइड टीचर। ऐसे में वर्तमान स्थितियां हमें यह बार -बार सोंचने पर बाध्य करती हैं कि आखिर कमी नीति-निर्माण के स्तर पर है या क्रियान्वयन के के स्तर पर।
     आज कोई भी समर्थ व्यक्ति अपने बच्चे को प्राइमरी स्कूलों के बजाय प्राइवेट स्कूलों में ही पढाना पसंद करता है। अगर मिड-डे-मील से ही छात्र-संख्या बढ़ती होती तो उन प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश के लिए मारा-मारी न होती जिनमे महंगी फीस होने के अलावा खाने का कोई प्रबंध नहीं है। यहाँ मुद्दा मिड-डे-मील की महत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगाना नहीं है। मिड-डे-मीलकी योजना निश्चित रूप से स्वागत-योग्य है। पर विचारणीय बिन्दु यह है कि क्या मिड-डे-मील योजना अपने उद्देश्यों को पाने में सफल रही है। क्या यह बच्चों को शुद्ध और पौष्टिक भोजन देने में कामयाब रही है।
      कभी-कभी आकर्षक और अच्छी योजनाएँ गलत क्रियान्वयन के चलते अपने उद्देश्यों से भटक जाती हैं। एमडीएम भी इसका अपवाद नहीं है। मिड-डे-मील योजना  को जिस तरीके से लागू किया गया है उससे न केवल ये स्कूल खाना बनाने के केंद्र बनकर रह गयें हैं उल्टे शिक्षा की निरंतरता भी भंग हुई है। हमने एमडीएम योजना जो कि साधन थी, को साध्य के रूप में अपना लिया और शिक्षा नेपथ्य में चली गई। अगर ऐसा न होता तो मिड-डे-मील के निर्माण और वितरण का भार शिक्षक पर न डाला गया होता।
       वर्तमान में जो व्यवस्था है उसमे अधिकांश विद्यालयों में खाना बनवाने कि ज़िम्मेदारी शिक्षकों पर डाली गयी है। ऐसे में अध्यापक लोग पढ़ाई से ज्यादा एमडीएम के लिए चिंतित रहते हैं। वे प्रायः ही कहीं सब्जी लाते हुए तो कहीं भोजन के लिए ईंधन की  व्यवस्था करते हुए देखे जाते हैं। इसके अलावा बच्चों को दूध पिलाने हेतु दूध की उपलब्धता सुनिश्चित करने की एक नई ज़िम्मेदारी भी अध्यापक के मत्थे मढ़ दी गई है और यही नहीं बच्चों के ड्रेस की व्यवस्था करना भी अध्यापक की मुख्य  भूमिकाओं में से एक है। ऐसे में जबकि शिक्षक एक साथ कई भूमिकाओं को निभा रहा है ;अध्यापन के लिए कितना समय दे पाएगा ,यह सोंचना कठिन नहीं।
       यह तो एक पक्ष है जिसके द्वारा समझा जा सकता है कि  एमडीएम किस तरह शिक्षण को प्रभावित कर रहा है ? दूसरा पक्ष मिड-डे-मील का यह है कि यह किस हद तक बच्चों को शिक्षा से जोड़ पाने में सफल रहा है ? भोजन की शुद्धता की गारंटी अभी भी एक चुनौती बनी हुई है । अगर एमडीएम से बच्चों का जीवन ही खतरे में पड़ता है तो यह किस तरह लोगों को आकर्षित कर पाएगा। इसके लिए बेहतर विकल्पों को तलाशना होगा ।
      एक विकल्प यह हो सकता है कि स्कूल में नामांकित बच्चों को कोटेदारों के माध्यम से अनाज वितरित किया जाये क्योंकि घर में बने खाने की शुद्धता विवादों से परे है और स्कूल में ऐसा भोज्य पदार्थ दिया जाये जिसे रसोई में बनाने की आवश्यकता न पड़े या फिर त्वरित रूप से तैयार हो सके। जैसे –भुने चना ,अंकुरित चना , उबले हुए चना ,लइया, चूरा ,सत्तू ,दलिया , भुट्टा ,बिस्कुट आदि जोकि पैकट-बंद हो। इसके लिए उन कंपनियों से करार किया जा सकता है जिनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध हो ।
     खाना बनवाना भी संभव है बशर्ते इसमे टेंडर के माध्यम से उन व्यावसायिक प्रतिष्ठानो  को आमंत्रित किया जाए जो इस क्षेत्र में विशेष अनुभव रखते हों । एनजीओज भी इसमें पूर्व की तरह अपना योगदान दे सकते हैं । निगरानी के लिए अभिभावकों, शिक्षकों, और प्रधान की संयुक्त टीम बनाई जा सकती है। प्रधान और शिक्षक खाना बनवाने के काम से अलग रहकर निष्पक्ष पर्यवेक्षक की भूमिका अदा कर सकेंगे।  साथ ही शिक्षक अपना सारा ध्यान बच्चों को पढाने में लगा सकेंगे ।
     इस प्रकार  मिड-डे-मील  के वितरण के लिए एक पृथक तंत्र बनाना आवश्यक है अन्यथा अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को लेकर इसकी सार्थकता पर  प्रश्नचिन्ह लगते रहेंगे । ।


                                                                                                            ---------संजीव शुक्ल तुल’        

Sunday, 6 September 2015

क्या कहने नेता जी के

               आजकल एक बड़े समाजवादी नेता मीडिया में छाए हुए हैं। उनकी हर जगह निर्मम आलोचना हो रही है।  हालांकि उनकी मानसिक पृष्ठभूमि को देखते हुए आलोचना में थोड़ी सदाशयता बरती जानी चाहिए । सुनते हैं कि एक बार उन्होने फोन पर अमिताभ ठाकुर को कुछ समझा दिया तो बवाल खड़ा हो गया । बड़ी आलोचना हुई। अरे भाई, इतना बड़ा नेता  किसी अधिकारी को समझाने का अधिकार तो रखता ही है और फिर तब जब कोई आदमी ईमानदारी की राह पर चलने की बेवकूफी भरी कोशिश कर रहा हो।                                  
          नेताजी की जितनी भी कम तारीफ की जाए, ज्यादा ही हो जाती है।  इनकी पार्टी के लोग कहते हैं कि नेता जी को जहां कठोर होना चाहिए वहाँ कठोर हैं और जहां मुलायम होना चाहिए वहाँ मुलायम हैं । यह बात सही भी है। वह कुछ लोगों के प्रति बेहद मुलायम हैं जैसे इंजीनियर यादव सिंह के प्रति, माननीय अनिल यादव के प्रति जिनके कुशल नेतृत्व में लोकसेवा आयोग के  इतिहास  में पहली बार पीसीएस का पेपर आउट हुआ। वह सहृदय हैं, मा0शिक्षा  सेवा चयन बोर्ड की पूर्व अध्यक्षा के प्रति जो नियमों को धता बताते हुए नियुक्त   की गई थीं। वह उदार हैं, आजम खान की भैसों के प्रति जिनके खो जाने पर पूरा प्रशासन उनको ढ़ूंढने में जुट गया। वह उदार हैं टोल-टैक्स न देने वाले छुटभैय्या नेताओं के प्रति।           और वह कठोर भी हैं।  उनकी कठोरता का लोहा मान चुके हैं- अमिताभ ठाकुर, एस0पी0सिंह और प्रशिक्षु शिक्षक एस के पाठक,साथ ही और न जाने कितने लोग। 
             ये नेताजी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। उन्होने कई सैद्धान्तिक परिवर्तन किए हैं। मसलन समाजवाद का परिवारवाद में रूपान्तरण और साथ ही परिवारवाद को नयी ऊंचाइयाँ प्रदान करना परिवारवाद को इतनी गरिमा और ऊंचाई प्रदान करने का काम शायद ही किसी और नेता ने किया हो। अतः ऐसे नेताओं की आलोचना अक्षम्य है। इन लोगों की आलोचना से परलोक का तो पता नहीं पर इहलोक ज़रूर खतरे में पड़ सकता है।
                                                                                                                                                                                                         -संजीव शुक्ल अतुल

संवैधानिक संस्थाओं का चीरहरण

               मनमाना लोकायुक्त  नियुक्त करने की जिद ने एक बार फिर समाजवाद और पारदर्शी शासन देने का दम भरने वाली सपा सरकार को कट्घरे में खड़ा कर दिया है .  वैसे  अब तक  के  राजनैतिक   आचरण को देखते हुए यह पार्टी कहीं से भी समाजवादी मूल्यों एवं संवैधानिक संस्थाओं  के प्रति सम्मान रखने वाली पार्टी के रूप में नजर नहीं आई।                            
         अगर पार्टी की वास्तव में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गहरी आस्था होती तो वह एक-एक करके ऐसे कदम नहीं उठाती जिनसे इन संस्थाओं की मर्यादा त।र –त।र होती।  यदि सरकार वास्तव में जनभावनाओं के प्रति संवेदनशील होती तो लोकसेवा-आयोग के अध्यक्ष व माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की पूर्व अध्यक्षा को हट।ने के लिए परिक्षार्थियों को न्यायालय का दरवाजा  खटखटाना न  पड़ता । लोकसेवा-आयोग के अध्यक्ष तो सरकारी कृपा से अभी-भी पदासीन हैं , जबकि उन पर आपराधिक व्यक्ति होने का आरोप तक लग चुका है। उनका आपराधिक रिकार्ड  है या नहीं यह तो न्यायालय का फैसला  आने पर ही पता चलेगा ,पर पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए क्या यह उचित नहीं होता कि ऐसे गरिमामय पद पर इस तरह के विवादित व्यक्ति को नामित ही न किया जाता ।     वैसे ये ही वह अध्यक्ष हैं जिनके कुशल नेतृत्व में आयोग के इतिहास में पहली बार पीसीएस का पेपर आउट हुआ । इस घटना पर इलाहाबाद हाइ कोर्ट के मुखय न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ की टिप्पणी उल्लेखनीय है –यदि छ।त्रों का आयोग कि परीक्षाओं से विश्वास उठा तो यह इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता की जड़ोंको हिला देगा ।  आश्चर्य है कि इस टिप्पणी के बावजूद भी सरकार नहीं चेती । इसके अलावा परंपरा के विपरीत लोकसेवा आयोग के अंतिम परिणामों में इस बार चयनित उम्मीदवारों  के नामों की जगह उनके रोलनंबरों को प्रकाशित किया गया । आखिर नामों के प्रकाशन में क्या दिक्कत है. या फिर इसके कुछ और भी  निहितार्थ हैं                                                                                   
                  यदि संवैधानिक संस्थाओं/आयोगों के अध्यक्षों की नियुक्ति ( हित- साधन की दृष्टि  से ) मनमाने तौर पर ही की जानी है तो फिर इन आयोगों की उपादेयता ही क्या रहेगी । क्या इस तरह  के कृत्य भृष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते ।
                 अपने मनपसंद व्यक्ति को मनचाही जगह पर बैठाने  की कड़ी में अगला कदम लोकायुक्त की नियुक्ति के संदर्भ में है।  लोकायुक्त जो प्रशासनिक भृष्टाचार के मामलों में जन-शिकायतों का निपटारा करता है ।  भृष्टाचार से लड़ने के लिए सर्वप्रथम इसी तरह की संस्था ऑम्ब्ड्स्मैन के नाम से 1809 में स्वीडेन में गठित की गयी थी । फ़िनलैंड में यह संस्था 1919 में  तथा डेन्मार्क में 1955 और 1962 में न्यूजीलैंड में वजूद में आई । इगलैंड में इस तरह की संस्था का गठन  1964  में किया गया ।   भारत में भी भृष्टाचार से लड़ने के संदर्भ में इसे कारगर हथियार के रूप में देखा गया । मोरारजी भाई की अध्यक्षता वाले प्र्शासनिक सुधार आयोग 1966 ने केंद्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्तों के गठन की सिफ़ारिश की ।     वर्तमान में 19 राज्यों में लोकायुक्त हैं ।जबकि केंद्र का लोकपाल अभी भी अस्तित्व –शून्य है ।   खैर, बात उत्तर प्रदेश की है तो यहाँ विवाद मनचाहा लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर के है ।   लोकायुक्त की नियुक्ति में सरकार के साथ-साथ नेता –प्रतिपक्ष और उच्च –न्यायालय के चीफ़ जस्टिस की राय अपेक्षित होती है ।        सरकार  न्यायमूर्ति  रवीद्र सिंह को  लोकायुक्त बनाना चाह रही है पर चीफ़ जस्टिस द्वारा इस नाम   पर इस आधार पर असहमति दर्शायी गई की पूर्व में उनके और सपा सरकार के बीच निकटतम संबंध रहें हैं। इसके बाद सरकार ने नियुक्ति के मानकों को दरकिनार करते हुए चीफ़ जस्टिस की राय के बिना ही  नियुक्ति- प्रस्ताव राज्यपाल के हस्ताक्षर हेतु भेज  दिया, जिसे राज्यपाल ने वापस लौटा दिया   सरकार को यह असहमति इतनी अखर गई की उसने मुख्य न्यायाधीश को चयन प्रक्रिया से ही बाहर करने की ठान ली   और इसके लिए सत्र के अंतिम दिन संशोधन विधेयक रखा गया। लोकायुक्त की नियुक्ति के मानकों में बदलाव लाने की गरज से लाया गया यह विधेयक दर्शाता है की सपा सरकार संवैधानिक संस्थाओं और उच्च नैतिक मूल्यों  के प्रति कितना गहरा आदर-भाव रखती है। क्या इसे सपा सरकार द्वारा संवैधानिक संस्थाओं को दिये जाने वाले सम्मान के रूप में देखा जाना चाहिए। क्या लोकतन्त्र के मंदिर में असहमति को इस रूप में देखा जाएगा। आखिर निष्पक्ष व सर्वस्वीकार्य लोकायुक्त को अपनाने में क्या दिक्कत है ? अगर संवैधानिक संस्थाओं को अपने हितार्थ तोड़ा-मरोड़ा जाएगा तो न सिर्फ लोकतान्त्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों में आदरभाव घटेगा बल्कि इससे उल्टे प्रतिगामी ताकतों को बढ़ावा ही मिलेगा।
 
                                                                                                                                   -  संजीव शुक्ल अतुल