पेंशन प्राप्त बुजुर्गों को ही संविदा पर रखा जाना चाहिए क्योंकि शायद रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं को है। वैसे इसके कई फायदे भी हैं, एक फायदा तो यह है कि ये कभी भी स्थायी नियुक्ति के लिये मांग नहीं करेगें और जब ऐसी कोई मांग ही नहीं होगी तो स्थायी नियुक्ति हेतु होने वाले आंदोलन और प्रदर्शन भी नहीं होगें जो कि किसी भी सरकार के कार्यकाल पर बदनुमा दाग जैसे होते हैं । इसका दूसरा फायदा यह होगा कि युवाओं में बेरोजगारी जस की तस बनी रहेगी जो कि आगामी चुनावों में एक रणनीति के तहत विशिष्ट भूमिका निभाएगी। चुनावों में गरीबी हटाओ का मुद्दा एक प्रमुख आकर्षण के रूप में रहेगा ही ......आज से कई दशकों पहले एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी ने भी गरीबी हटाओ का नारा दिया था पर हुआ क्या ??? अरे भाई, बेरोजगारी रहेगी तभी तो नेताओं और उनकी पार्टियों की अहमियत रहेगी अन्यथा इन्हें कौन पूछेगा ?? लगता है युवाओं की बेरोजगारी से नेताओं के रोजगार का निकट का सम्बंध है !!!!
...संजीव शुक्ल अतुल
...संजीव शुक्ल अतुल
No comments:
Post a Comment