Wednesday, 28 November 2018

💐अभिनय के चलते-फिरते संस्थान💐

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💐"अभिनय के चलते-फिरते संस्थान"💐

   जिनको भी अभिनय सीखना हो,अभिनय की बारीकी सीखनी हो, उन्हें नेताओं के हाव-भाव, उनके क्रियाकलापों पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिए। ये अभिनय के चलते-फिरते सर्वसुलभ संस्थान हैं: बस आपमें सीखने की ललक हो ..... निरपेक्षता और किरदार को जीने की कला तो कोई इनसे सीखे। बड़े-बड़े सी.बी.आई.वाले तक गच्चा खा जाते हैं। इनके भोले,मासूम चेहरे को देखकर वह चकरा जाता है कि गलती किधर से हुई। गलती इनसे हुई या कि हमसे जो इनके खिलाफ़ जांच करने को हामी भर दी। जिसकी जिंदगी भर स्तुति की, चरणवंदना की उसी के विरुद्ध जांच!!!! अरे राम-राम...... वह अपराधबोध में रहते हुए जैसे-तैसे जांच निपटाता है।
  फिल्मों में तो सिर्फ़ अदाकारी होती है, लेकिन राजनीति में बेहतरीन अदाकारी से लोगों को बेवकूफ़ भी बनाया जाता है। फ़िल्म तो तीन घंटे की होती है मगर इनके यहां पूरे पांच साल का शो है और अगर शो सफल रहा तो फिर पांच साल और .... यह उच्चकोटि का अभिनय है। यह अभिनय की मास्टर डिग्री है। झूठ को सच मे तब्दील कर देना मामूली बात नहीं !! अभिनय की सार्थकता भी इसी में है। भई बात तो तब है जब सच को अपने सच होने पर शर्मिंदगी होने लगे। तभी तो बरेलवी साहब को कहना पड़ा कि "वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता"
      यहां झूठ को इतनी प्रामाणिकता के साथ बोला जाता है कि वह अप्रतिम दस्तावेज सा लगने लगता है। दस्तावेजी रंगत देने के लिये हमारे नेता भाई लोग ऐसे में दो-तीन फोटोकॉपी के पन्ने मंच से ही लहराने लगते हैं, ताकि बात बहुत मारक हो जाय, और लगने भी लगता है कि भाईसाब के वे दुर्लभ पन्ने सत्ता की गलियों में हो रही दुरभिसंधियों के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, उनके चश्मदीद गवाह हैं । भले ही उन पन्नों पर घर के दूध का हिसाब लगा हो।
  इधर नेताओं के गले मिलने के हुनर ने अदाकारी में जान फूंक दी है। गले मिलने के तरीकों पर अध्ययन किया जाना चाहिए। सामने वाले को पायरिया हो तो भी सांस रोककर उसके मुंह की तरफ़ अपनी खोपड़ी करके लपक के ऐसे मिलो कि सामने वाले को पता ही न चले कि उसे इस नाम की कोई बीमारी थी भी या नहीं। ऐसी भीषण भावनात्मक  गतिविधि पर भी अगर आदमी उसे अपना मानने की गलती न करे तो वह इंसान नहीं .......  लानत है उसकी इंसानियत पर ....
गले मिलने में अपार संभावनाएं छुपी हैं। यह वशीकरण जैसा है, इस प्रक्रिया में एक अजीब सा सम्मोहन होता है, इसमे प्रेम विवेक पर हावी हो जाता है। और वैसे भी विवेक और प्रेम की तो सनातन दुश्मनी है। कहते हैं न कि प्रेम अंधा होता है। अक्सर लोग प्रेम में ही गच्चा खाते हैं। यह नशीली जैसी चीज है।  जब तक होश आता-आता है तब तक आदमी लुट चुका होता है। जनता भी कई बार लुट चुकी है। लोग बताते हैं कि इससे गिले-शिकवे मिट जाते हैं, लोग पुरानी कही-सुनी बातों को भूल जाते हैं। नेता लोग भी चुनाव के टाइम जनता से गले मिलते हैं। सो जनता भी उनके किये गए वादों को भूलकर उन्हें क्षमा कर  फिर से अपना लेती हैं।
   राजनीति के क्षेत्र में इसका बहुत सुनहरा अतीत रहा है। एक बार अफजल खां ने भी जानबूझकर शिवाजी से गले मिलने की कोशिश की थी लेकिन शिवाजी गले मिलने के खतरे को पहले ही भांप गए और प्रेम में पड़े बग़ैर अफजल का काम तमाम कर दिया।
     मगर कभी-कभी मानवीय दुर्बलता इस अदाकारी पर भारी पड़ जाती है। ऐसी ही एक मानवीय दुर्बलता हुई आँख दबाने की। यह घटना सरे आम हो गयी। हो सकता है यह चुम्बकीय गतिविधि किसी विशिष्ट संदर्भ में कई गयी हो पर जब आप अभिनय के बड़े-बड़े धुरंधरों के सामने मौजूद हों तो ऐसी किसी गलती के लिये आपको क्षमा नहीं किया जायेगा और वैसे भी हमारे समाज मे इस क़ातिलाना इशारेबाजी को बहुत स्वागत-योग्य नहीं माना जाता।
 गले मिलने के बाद आंख दबाना बहुत गलत है, वह भी तब जब आप कैमरे के निगाह में हो। यह बताता है कि आप अभिनय की दृष्टि से सामने वाले कि तुलना में अभी बहुत नौसिखिये हैं .......  वैसे भी जब गंभीर विषयों पर बहस हो रही हो तब ऐसी हरकत करना छिछोरेपना की निशानी है। यह आपकी छिछोरावस्था है !! अगर आपको आंख दबानी ही है तो दोनों दबाइये और बेहिसाब दबाइये जिससे यह घोषित किया जा सके कि आप कोई ऐसी-वैसी हरकत नहीं कर रहे थे बल्कि देश की समस्याओं को लेकर गहन चिंतन में डूब-उतरा रहे थे। इसमें फायदा यह है कि आप लगे हाथ थोड़ी देर सो भी सकते हैं।
 अगर आप यह सब सिख लिये तो यक़ीनन आप एक दिन इस फील्ड में बेमिसाल एक्टर बनेगें। हमारी शुभकामनाएं💐💐
                                      - संजीव शुक्ल

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