लोक सेवा आयोग के ललित ललाम छवि रखने वाले
अध्यक्ष की छुट्टी हो जाने से उन तमाम गुंडों की महत्वाकांक्षाएँ मिट्टी में मिल
गयीं जो उनके बाद अध्यक्ष की कुर्सी पर आँख गड़ाए थे । वह
चाहते थे कि अध्यक्ष
महोदय पानी पीने के बहाने से या फिर किसी भी तरह की शंका-निवारण के बहाने से कुर्सी से उठें
और इधर वह अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना रूमाल फेंककर सीट का रिज़र्वेशन सुनिश्चित
करवा लें । लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से करा धरा सब बेकार हो गया । तमाम कुवांरी
इच्छाएँ बिन-ब्याहे ही सती हो गयीं । उन
तमाम गुंडों की पत्नियों की सिंदूरी अभिलाषा का रंग फीका पड़ गया जो भविष्य में
अध्यक्ष की पत्नी बनने का ख्वाब देख रहीं थीं । उनके पति जो अभी तक सिर्फ गुंडा थे
अध्यक्षी पाते ही गुंडाधिकारी बन जाते । लेकिन खैर ।
वैसे
न्यायाधीश महोदय को डराने वाला यह फैसला सुनाना ही था तो सुनाते ही ,उनको कौन रोक सकता था लेकिन मानवीय पहलू
पर गौर करते हुए उन्हें कम से कम करवा-चौथ तक तो रुक ही जाना चाहिए था । इससे
न्यायपालिका के फैसले को सुरक्षित रखने की परंपरा का निर्वाह भी हो जाता
और किसी का करवा-चौथ (उत्साह सहित)
भी सफल हो जाता । लेकिन कोर्ट के विधान
के आगे कब किसकी चली है । दो-दो सनातनी परंपराओं के
निर्वाह का संयोग यूं ही जाता रहा।
अध्यक्ष महोदय पर तमाम तरह की धांधली
करने और करवाने का आरोप है। लेकिन इससे लोकसेवा आयोग में उनके द्वारा दिये गए
योगदान को न तो कम किया जा सकता है और न ही इससे उनके इस श्रेय को छीना जा सकता है
कि उन्होने लोक सेवा
आयोग की लोकप्रियता
को जन-जन तक पहुंचाया । लोकसेवा
आयोग की लोकप्रियता में चार-चाँद लगाने में निवर्तमान अध्यक्ष की भूमिका का सम्मान
किया जाना चाहिए । अध्यक्ष पर आरोप है कि उन्होने अपने खास लोगों पर मेहरबानी की
। यह आरोप तो प्रथम दृष्ट्या खारिज होने के लायक है । अरे भाई आदमी अपनों पर
मेहरबानी नहीं करेगा तो क्या गैरों पर मेहरबानी करेगा । अपनों पे सितम, गैरों पे करम वाली लाइन फिल्मों में ही
ठीक लगती है । लोकलाज भी कोई चीज होती है । कोर्ट के
द्वारा सीट से उतारे जाने पर क्या लोग यह ताना नहीं मारेगें कि ‘तुमसे इतने भी
गलत काम न हो सके ।
लानत है तुम पर और तुम्हारी अध्यक्षी पर
। तुमको तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ।’ हालांकि यह तो कहने वाली बात है अन्यथा चुल्लू भर पानी में
कितने लोग डूब कर मरे होंगे, सभी जानते हैं । अपनों का काम न करके क्या कोई
जमीर वाला आदमी अपनों से आँखें मिला सकता है , हाँ, काम
करके जरूर आदमी आँखों में आँखों घुसेड़ कर बात कर सकता है। अब यदि उस तथाकथित
व्यक्ति की आँखें ही दिपदिपाती हों तो अलग बात है।
निवर्तमान अध्यक्ष महोदय को इस बात का
भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होने कोर्ट के माध्यम से पहली बार अध्यक्षी हासिल
करने की शर्तों को लोगों के सामने उद्घाटित किया ।
तमाम लोग तो सिर्फ इस कारण से ही अध्यक्षी पाने से चूक गए की
उन्होने गलत पते का चुनाव कर लिया था । जब आवेदन-पत्र ही गलत जगह पहुंचेगा तो कोई
कैसे अध्यक्ष बन सकता है। आवेदन-पत्र को आयोग के पते पर नहीं वरन तत्कालीन सरकार
से संबन्धित पार्टी के मुख्यालय में रिसीव कराना चाहिए ।
जब से ये अध्यक्ष बने थे और लोगों को
इनकी योग्यता के बारे पता चला तब से एक खास वर्ग में खासा उत्साह बढ़ चला था । तो
कुछ दावेदार इसलिए संकोच कर रहे थे कि वे बाकी सारी शर्ते तो पूरी कर रहे
हैं पर जिला-बदर की अवधि वर्तमान (तत्कालीन) अध्यक्ष के मुक़ाबले में कुछ कम पड
रही है । पर समझाने वाले सहृदय लोग भी
कम नहीं थे, सो समझा भी रहे थे
कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । अभी तो तुम्हारे पास 2-3 वर्ष का समय है,कोशिश करोगे तो जिला-बदर की अवधि क्या
चीज है ,प्रदेश-बदर भी कर
लोगे । तहसील-बदर तो तुम तभी हो गए थे जब तुम्हारी कायदे से मूंछ भी
नहीं जमी
थी। इसलिए घबड़ाओ नहीं । “
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुमह पाहीं ।”
उधर कुछ पत्नियाँ अध्यक्ष की मेरिट
गिरने की राह देख रहीं थीं तो कई पत्नियाँ गुंडई की वर्तमान मेरिट को क्रास कर
जाने के लिए अपने-अपने पतियों को उकसा रहीं थीं । लेकिन कोर्ट के फैसले को क्या
कहा जाए । इतने सम्मानित अध्यक्ष को इतनी बेदर्दी से उतार दिया गया कि अब क्या कहा
जाये । अब तो लोग अध्यक्ष बनने से ही डरने लगे हैं लेकिन कोर्ट का फैसला अपनी जगह
है, सरकार को उनकी
ऐतिहासिक सेवाओं को देखते हुए उनको सम्मानित करना चाहिए । अगर ये माननीय कुछ दिन
और टिक जाते
तो पीसीएस में प्री और मेंस का झंझट ही खत्म कर देते । बात भी सही है, आखिर प्रशासन में जाने के लिए प्री और
मेंस को क्वालीफ़ाई करने की क्या जरूरत है विद्वान बनकर कौन सा इनको ज्ञानपीठ लेना
है । और फिर परीक्षा प्रणाली की दुरूहता न जाने कितने बच्चों को फार्म भरने से ही
रोक देती है,जो
कि स्वतन्त्रता के मौलिक
अधिकार का सरासर उल्लंघन है।।
इस प्रकार अध्यक्ष बनकर आप बहुत से
रचनात्मक काम कर सकते हैं जो बगैर बने संभव नहीं । इधर इस जालिम निर्णय के बाद
भगवान जाने कौन इस सीट पर आएगा,
लेकिन इस सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए भरोसा है कि
आनेवाला कैंडीडेट जानेवाले से कम
हुनरदार नहीं होगा । ।
--संजीव शुक्ल ‘अतुल’
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