आजकल एक बड़े समाजवादी नेता मीडिया में छाए हुए
हैं। उनकी हर जगह निर्मम आलोचना हो रही है। हालांकि उनकी मानसिक पृष्ठभूमि को देखते हुए आलोचना
में थोड़ी सदाशयता बरती जानी चाहिए । सुनते हैं कि एक बार उन्होने फोन पर अमिताभ
ठाकुर को कुछ समझा दिया तो बवाल खड़ा हो गया । बड़ी आलोचना हुई। अरे भाई, इतना बड़ा नेता किसी अधिकारी को समझाने का अधिकार तो रखता ही है और फिर
तब जब कोई आदमी ईमानदारी की राह पर चलने की बेवकूफी भरी कोशिश कर रहा हो।
नेताजी की जितनी भी कम तारीफ की जाए, ज्यादा ही हो जाती है। इनकी
पार्टी के लोग कहते हैं कि नेता
जी को जहां कठोर होना चाहिए वहाँ कठोर हैं और जहां मुलायम होना चाहिए वहाँ मुलायम
हैं । यह बात सही भी है। वह
कुछ लोगों के प्रति बेहद मुलायम हैं जैसे इंजीनियर यादव सिंह के प्रति, माननीय अनिल यादव के प्रति जिनके कुशल
नेतृत्व में लोकसेवा आयोग
के इतिहास में पहली बार
पीसीएस का पेपर आउट हुआ। वह सहृदय हैं,
मा0शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की पूर्व अध्यक्षा के
प्रति जो नियमों को धता बताते हुए
नियुक्त की गई थीं। वह उदार हैं, आजम खान की भैसों के प्रति जिनके खो जाने पर पूरा प्रशासन
उनको ढ़ूंढने में
जुट गया। वह उदार हैं टोल-टैक्स न देने वाले छुटभैय्या नेताओं के प्रति। और
वह कठोर भी हैं। उनकी कठोरता का लोहा मान चुके हैं-
अमिताभ ठाकुर, एस0पी0सिंह
और प्रशिक्षु शिक्षक एस के पाठक,साथ
ही और न जाने कितने लोग।
ये नेताजी बहुआयामी
व्यक्तित्व के धनी हैं। उन्होने कई सैद्धान्तिक परिवर्तन किए हैं। मसलन समाजवाद का
परिवारवाद में रूपान्तरण और साथ ही परिवारवाद को नयी ऊंचाइयाँ
प्रदान करना । परिवारवाद को इतनी गरिमा और ऊंचाई प्रदान करने का काम शायद
ही किसी और नेता ने किया हो।
अतः ऐसे नेताओं की आलोचना अक्षम्य है। इन लोगों की आलोचना से परलोक का तो
पता नहीं पर इहलोक ज़रूर खतरे में पड़ सकता
है।
-संजीव
शुक्ल ‘अतुल’
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