मनमाना लोकायुक्त नियुक्त करने की जिद
ने एक बार फिर समाजवाद और पारदर्शी शासन देने का दम भरने वाली सपा सरकार को कट्घरे
में खड़ा कर दिया है . वैसे अब तक के राजनैतिक आचरण को देखते हुए यह पार्टी कहीं से भी समाजवादी मूल्यों एवं संवैधानिक
संस्थाओं के प्रति सम्मान रखने वाली पार्टी के रूप में नजर नहीं आई।
अगर पार्टी की वास्तव
में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गहरी आस्था होती तो वह एक-एक करके ऐसे कदम नहीं
उठाती जिनसे इन संस्थाओं की मर्यादा त।र –त।र होती। यदि सरकार वास्तव में जनभावनाओं
के प्रति संवेदनशील होती तो लोकसेवा-आयोग के अध्यक्ष व माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन
बोर्ड की पूर्व अध्यक्षा को
हट।ने के लिए परिक्षार्थियों को
न्यायालय का दरवाजा खटखटाना न पड़ता ।
लोकसेवा-आयोग के अध्यक्ष तो सरकारी कृपा
से अभी-भी पदासीन हैं , जबकि उन पर आपराधिक व्यक्ति
होने का आरोप तक लग चुका है। उनका आपराधिक रिकार्ड
है
या नहीं यह तो न्यायालय का फैसला आने पर ही पता चलेगा ,पर पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए क्या यह उचित नहीं होता कि
ऐसे गरिमामय पद पर इस
तरह के विवादित व्यक्ति को नामित ही न
किया जाता । वैसे ये ही वह अध्यक्ष हैं जिनके कुशल नेतृत्व में आयोग के
इतिहास में पहली बार पीसीएस का पेपर आउट हुआ । इस घटना पर इलाहाबाद हाइ कोर्ट के मुखय
न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ की टिप्पणी
उल्लेखनीय है – “यदि छ।त्रों का आयोग
कि परीक्षाओं से विश्वास उठा तो यह इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता की जड़ोंको
हिला देगा ।“ आश्चर्य है कि इस
टिप्पणी के बावजूद भी सरकार नहीं चेती । इसके
अलावा परंपरा के विपरीत लोकसेवा आयोग के अंतिम परिणामों में इस बार चयनित
उम्मीदवारों के नामों की जगह उनके रोलनंबरों को प्रकाशित किया गया । आखिर
नामों के प्रकाशन में क्या दिक्कत है. या फिर इसके कुछ और
भी निहितार्थ हैं
यदि संवैधानिक संस्थाओं/आयोगों के
अध्यक्षों की नियुक्ति ( हित- साधन की दृष्टि से )
मनमाने तौर पर ही की जानी है तो फिर इन
आयोगों की उपादेयता ही क्या रहेगी । क्या इस तरह के कृत्य भृष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते ।
अपने मनपसंद व्यक्ति को मनचाही जगह पर
बैठाने की कड़ी में अगला कदम लोकायुक्त की नियुक्ति के संदर्भ में है। लोकायुक्त जो
प्रशासनिक भृष्टाचार के मामलों में जन-शिकायतों का निपटारा करता है । भृष्टाचार से लड़ने के
लिए सर्वप्रथम इसी तरह की संस्था ऑम्ब्ड्स्मैन के नाम से 1809 में स्वीडेन
में गठित की गयी थी । फ़िनलैंड में यह
संस्था 1919 में तथा डेन्मार्क में 1955 और 1962 में न्यूजीलैंड में वजूद में
आई । इगलैंड में इस तरह की संस्था का गठन
1964 में किया गया । भारत में भी भृष्टाचार से लड़ने के संदर्भ में इसे कारगर हथियार के रूप में देखा गया । मोरारजी
भाई की अध्यक्षता वाले प्र्शासनिक सुधार आयोग 1966 ने केंद्र में लोकपाल तथा
राज्यों में लोकायुक्तों के गठन की सिफ़ारिश की । वर्तमान में 19
राज्यों में लोकायुक्त हैं ।जबकि केंद्र
का लोकपाल अभी भी अस्तित्व –शून्य है । खैर, बात उत्तर प्रदेश की
है तो यहाँ विवाद मनचाहा लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर के है । लोकायुक्त की
नियुक्ति में सरकार के साथ-साथ नेता –प्रतिपक्ष और उच्च –न्यायालय के चीफ़ जस्टिस
की राय अपेक्षित होती है । सरकार न्यायमूर्ति रवीद्र
सिंह को लोकायुक्त बनाना चाह रही है पर चीफ़ जस्टिस द्वारा इस नाम पर इस आधार पर असहमति
दर्शायी गई की पूर्व में उनके और सपा सरकार के बीच निकटतम संबंध रहें हैं। इसके
बाद सरकार ने नियुक्ति के मानकों को दरकिनार करते हुए चीफ़ जस्टिस की राय के बिना
ही नियुक्ति- प्रस्ताव राज्यपाल के हस्ताक्षर हेतु भेज दिया, जिसे राज्यपाल ने वापस लौटा दिया । सरकार को यह असहमति
इतनी अखर गई की उसने मुख्य
न्यायाधीश को चयन प्रक्रिया से ही बाहर करने की ठान ली और इसके लिए सत्र के
अंतिम दिन संशोधन विधेयक रखा गया। लोकायुक्त की नियुक्ति के मानकों में बदलाव लाने
की गरज से लाया गया यह विधेयक दर्शाता है की सपा सरकार संवैधानिक
संस्थाओं और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रति कितना गहरा
आदर-भाव रखती है। क्या इसे सपा सरकार द्वारा संवैधानिक संस्थाओं
को दिये जाने वाले सम्मान के रूप में
देखा जाना चाहिए। क्या लोकतन्त्र के मंदिर में असहमति को इस रूप में देखा जाएगा।
आखिर निष्पक्ष व सर्वस्वीकार्य लोकायुक्त को अपनाने में क्या दिक्कत है ? अगर संवैधानिक संस्थाओं को अपने हितार्थ तोड़ा-मरोड़ा जाएगा तो न सिर्फ लोकतान्त्रिक संस्थाओं के
प्रति लोगों में आदरभाव घटेगा बल्कि
इससे उल्टे प्रतिगामी ताकतों को बढ़ावा ही मिलेगा।
- संजीव शुक्ल ‘अतुल’
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