अब बीजेपी का चूंकि सत्ता में आना तय हो गया है इसलिए उसकी और उसके नेताओं की जिम्मेदारी बढ़ गयी है। उसे कट्टरता और तुष्टिकरण को अस्वीकार्य कर चाहे वह किसी की भी हो,समरसता के भाव से आगे बढ़ना होगा। जिस तरह सिर्फ हिन्दू प्रतीकों के विरोध को धर्मनिरपेक्षता नही माना जा सकता उसी तरह मुस्लिम-विरोध का दृष्टिकोण भी ठीक नहीं। सबका साथ सबका विकास ही उचित दृष्टिकोण है। अटल जी की सर्वस्वीकार्य नीति और विज़न को अपनाना होगा। उसे नकारात्मक छवि के ठप्पे से अलग दिखना होगा जिसमे कि विरोधियों के ध्रुवीकरण करनेकी नीति के साथ साथ खुद इनके कुछ नेताओं का भी योगदान रहता है।अब ध्रुवीकरण करके प्रबुद्ध जनता को बेवकूफ नही बनाया जा सकता। हर मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने वालों को आत्मविश्लेषण करना होगा। मुद्दे उसके असल जीवन से सम्बंधित होने चाहिए । परीक्षा आयोगों की शुचिता को बहाल करना प्राथमिकता में होना चाहिए। ध्यान रहे कि साक्षात्कार के नाम पर खूब घालमेल होता है,। हाई कोर्ट के कहने पर भी अपने मन का लोकायुक्त नियुक्त करने की जिद और आयोगों में मानकों को दरकिनारकर व्यक्तिविशेष को बिठाने के क्या निहितार्थ सकते हैं? क्या जनता की आँख पर पट्टी बंधी है। क्या उस व्यक्ति को माननीय बने रहने का हक़ है जिसे पुलिस ढूंढ रही हो और उसका अता पता न हो। क्या प्रदेश के मुखिया का इस पर कोई दायित्व नही बनता था? अगर वह माननीय है तो उन्हें पुलिस क्यों ढूंढ रही है और यदि वह माननीय नहीं हैं तो फिर वह माननीय क्यों बने हुए है, विशेषकर राज्यपाल की टिप्पणी के बाद भी। प्रदेश का मंत्री 'चूहा भाग बिल्ली आई ' का खेल खेले; हद है!! ऐसे विलुप्तप्राय मंत्री जिस सरकार में होंगे वह सरकार कब तक साकार रहेगी । समाजवाद से पारिवारिक समाजवाद तक की यात्रा को क्या एक उपलब्धि के रूप में देखा जाय ? नवागत परिणाम इन्हीं प्रतिक्रियाओं का परिणाम है ........
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