वर्तमान में राजनीति के आधिकारिक मंचों पर व उससे इतर विमर्श की प्रक्रिया में मुद्दों की प्रकृति कैसी होती है और वो मुद्दे कितने अर्थपूर्ण तथा कितने सामयिक होते हैं साथ ही राजनीतिक नेतृत्व की परस्पर सौमनस्यता की सीमा कहां तक है आदि-आदि, की बानगी हमें दुष्यंत जी की रचनाओं में सहज ही देखने को मिलती है।
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