बाबा नागार्जुन मानवीय संवेदनाओं और व्यंग्य के अप्रतिम कवि हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर कटाक्ष करने में उनका कोई मुकाबला नहीं। जब नामवर सिंह जी यह कहते हैं कि "यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नही हुआ" तो यूं ही नहीं कहते। उनकी एक कविता मन्त्र है जो मौजूदा दौर के जीवन के सभी पक्षों यथा सामाजिक औ राजनैतिक पक्षों में विद्यमान वीभत्सता पर गहरा प्रहार करती है। हिंदी काव्य-जगत की बेहद चर्चित इस कविता में भारतीय परम्परा के सर्वाधिक पवित्र रूप विधान (मंत्र) का उपयोग समकालीन राजनीति के सर्वाधिक अपवित्र पक्ष को व्यक्त करने के लिए किया गया है। यह भी एक व्यंग्य का तरीका है.जो बाबा नागार्जुन ही कर सकतेहैं....कुछ पंक्तियां देखें
रचनाकार: नागार्जुन
ॐ दलों में एक दल अपना दल, ॐ
ॐ अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ॐ मुष्टीकरण, तुष्टिकरण, पुष्टीकरण
ॐ ऎतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ॐ गद्दी पर आजन्म वज्रासन
ॐ ट्रिब्यूनल, ॐ आश्वासन
ॐ गुटनिरपेक्ष, सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़
ॐ छल-छंद, ॐ मिथ्या, ॐ होड़महोड़
ॐ बकवास, ॐ उदघाटन
ॐ मारण मोहन उच्चाटन।।
रचनाकार: नागार्जुन
ॐ दलों में एक दल अपना दल, ॐ
ॐ अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ॐ मुष्टीकरण, तुष्टिकरण, पुष्टीकरण
ॐ ऎतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ॐ गद्दी पर आजन्म वज्रासन
ॐ ट्रिब्यूनल, ॐ आश्वासन
ॐ गुटनिरपेक्ष, सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़
ॐ छल-छंद, ॐ मिथ्या, ॐ होड़महोड़
ॐ बकवास, ॐ उदघाटन
ॐ मारण मोहन उच्चाटन।।
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