Thursday, 4 January 2018

बाबा नागार्जुन

जिनकी लेखनी की तीखी नोक ने सत्ता के प्रतिष्ठानों में फल-फूल रहे राजनीतिक पाखंड को अनावृत्त किया जो कि कथित  शुचिता की धवल चादर से ढकें थे.....और राजनीतिक पाखंड ही क्यों; धर्म व समाजसेवा के नाम पर हो रहे अनाचार भी उनके नुकीले व्यंग्य बाणों के प्रहार से बच न सके ।   नागार्जुन का शिल्प विधान जितना विविधवर्णी था उतना ही विविध स्तरीय उनका वस्तु विधान भी था। संवेदना के विविध स्वरों की उपस्थिति बताती है कि वो कितने अद्भुत कलमकार थे। ऐसे ऊर्जस्वित कलम के धनी, व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर  कविकुल श्रेष्ठ नागार्जुन को प्रणाम !!
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रचनाकार: नागार्जुन

"जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !"

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