उन्मादी भीड़ द्वारा किसी को मार दिया जाना बहुत ही दुःखद और बहुत ही जघन्यपूर्ण है। यह इंसानियत की हत्या है। मरने वाला चाहे जिस धर्म का हो, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता ..... दर्द तो एक जैसा ही होता है .....मरता तो इंसान ही है न !!
उन्माद और कानून दोनों परस्पर विरोधी चीजें हैं, दोनों साथ-साथ नही चल सकते। उन्माद विवेक विरोधी स्थिति है तो कानून विवेक और व्यवस्था की उपस्थिति का सूचक। उन्माद को मौन स्वीकृति देकर आप कानून के राज की कल्पना नहीं कर सकते। अगर भीड़ ही न्याय-अन्याय का फैसला करेगी तो फिर कानून को स्थापित करने वाले निकायों को भंग कर दिया जाना चाहिए। प्रायः सियासी लाभ के लिये ऐसी हरकतों को बढ़ावा दिया जाता है। पक्ष की तरफ़ से भी और विपक्ष की तरफ़ से भी। कट्टरता, कट्टरता है, उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती चाहे जिस तरफ से हो। ये नहीं हो सकता कि इनकी वाली कट्टरता अच्छी और तर्कसंगत है और उनकी वाली बुरी!!!
... तुष्टिकरण खतरनाक है फिर चाहे वह जिसका भी हो। सामाजिक समरसता को ख़त्म करके आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं
अगर किसी भी पक्ष का तुष्टिकरण न किया जाय और कानून को निष्पक्षता के साथ काम करने दिया जाय तो ऐसी अप्रिय परिस्थियाँ पैदा ही नहीं होंगी .......
उन्माद और कानून दोनों परस्पर विरोधी चीजें हैं, दोनों साथ-साथ नही चल सकते। उन्माद विवेक विरोधी स्थिति है तो कानून विवेक और व्यवस्था की उपस्थिति का सूचक। उन्माद को मौन स्वीकृति देकर आप कानून के राज की कल्पना नहीं कर सकते। अगर भीड़ ही न्याय-अन्याय का फैसला करेगी तो फिर कानून को स्थापित करने वाले निकायों को भंग कर दिया जाना चाहिए। प्रायः सियासी लाभ के लिये ऐसी हरकतों को बढ़ावा दिया जाता है। पक्ष की तरफ़ से भी और विपक्ष की तरफ़ से भी। कट्टरता, कट्टरता है, उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती चाहे जिस तरफ से हो। ये नहीं हो सकता कि इनकी वाली कट्टरता अच्छी और तर्कसंगत है और उनकी वाली बुरी!!!
... तुष्टिकरण खतरनाक है फिर चाहे वह जिसका भी हो। सामाजिक समरसता को ख़त्म करके आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं
अगर किसी भी पक्ष का तुष्टिकरण न किया जाय और कानून को निष्पक्षता के साथ काम करने दिया जाय तो ऐसी अप्रिय परिस्थियाँ पैदा ही नहीं होंगी .......
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