💐तुम्हारा नेता नहीं मेरा नेता बड़ा💐
आज के इस अति बुद्धिवादी दौर में अगर आप भावनाओं से जुड़े तथ्यों को रेखांकित करते हैं तो आप प्रगतिशीलता के विरोधी ठहराये जायेंगे। बुद्धिवाद इस कदर हावी है कि लोग मानव समाज के विशुद्ध भावनात्मक सम्बन्धों को भी विवेक के तराजू पर तौलकर नये-नये निष्कर्ष निकालते हैं। पर ऐसे स्वघोषित निष्कर्ष हमेशा विशुद्ध बुद्धिवादी खेमे से आएं ऎसा जरूरी नहीं, कभी-कभी यह प्रायोजित होता है। अगर ईमानदारी से देखा जाय तो यह ज़्यादातर प्रायोजित ही होता है, हालांकि होता बुद्धिवाद के आवरण में ही है; ठीक उसी तरह जैसे सामान से ज़्यादा उसकी पैकिंग महत्वपूर्ण होती है। ये श्रेष्ठता के स्थापन का मनोविज्ञान है।
प्रायोजित इसलिए होता है कि इससे निकाले गये निष्कर्ष वांछित परिणामों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। राजनीति के क्षेत्र में यह प्रवृत्ति खूब फल-फूल रही है। राष्ट्रीय नायकों और राजनीतिज्ञों के आपसी संबंधों को मनचाहे रूप में व्याख्यायित करने के अपने निहितार्थ हैं। उनके वैचारिक विरोध को उनके आपसी संबंधों की दशा व दिशा तय करने वाला एकमात्र मुख्य निर्धारक बिंदु मान की गई सुविधावादी राजीनीतिक व्याख्या के कई फायदे हैं।
दो राजनेताओं के मध्य विचार वैभिन्य को व्यक्तिगत शत्रुता के रूप में चित्रित कर उन्हें परस्पर विरोधी गुट के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाने की प्रवृत्ति इधर कुछ ज्यादा ही मुखर हुई है। वस्तुतः इस दुष्प्रवृत्ति के पीछे राजनेताओं को दो गुटों में बांटकर उनमें से एक गुट को अपने साथ जोड़कर उनसे जुड़े लोगों को साधने की कोशिश की जाती है, अर्थात अनुयायियों को वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश की जाती है। इस प्रकार यह सारा अभियान, सारा उपक्रम सत्ता प्राप्ति के निमित्त है। यह लोग यहीं नहीं रुकते बल्कि यह लोग तो महापुरुषों को जाति-विशेष में कैद करके जातिवादी राजनीति को और हवा देते हैं। भले ही वे महापुरुष अपने जीवन में जातिवाद के घोर विरोधी रहें हों, पर इससे उन्हें क्या फ़र्क पड़ता..... आदर्शवाद से चुनाव तो नहीं जीत सकते न!!! चुनाव जीतने के लिये ध्रुवीकरण जरूरी है।
हां तो बात मत-मतांतर को विवाद की शक्ल में पेश करने पर हो रही थी। इधर सोशल मीडिया पर स्वघोषित इतिहासकारों की बाढ़ आ गयी है। ये लोग नेहरू,पटेल,राजेंद्र प्रसाद तथा नेताजी के आपसी संबंधों पर ऐसे साधिकार टिप्पणी करते हैं जैसेकि वह स्वयं इन महान चरित्रों के कार्य व्यापार व संबंधों के साक्षी रहें हों।
कुछ मनीषी नेहरू व पटेल तथा नेहरू और प्रसाद को प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करते हैं। निश्चित रूप से कई मुद्दों पर बड़े नेताओं के मध्य मत-भिन्नता होती थी जो कि बहुत ही स्वाभाविक है। मत भिन्नता कहां नहीं होती? यह तो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। यही तो लोकतांत्रिक व्यवहार की अपनी खूबसूरती है। इसे लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लेने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
नेहरू- पटेल व नेहरू-प्रसाद के आपसी संबंधों पर चर्चा करते समय प्रायः ही नेहरू को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। ऐसा लगता है कि नेहरू ताउम्र प्रतिद्वंद्वी नेताओं के लिये षड्यंत्र ही रचते रहे। इसके अलावा उन्होंने कोई सार्थक काम न किया। ऐसा करके आलोचक जाने-अनजाने में पटेल और राजेंद्र प्रसाद जी के विराट व्यक्तित्व को भी बौना कर देते हैं। क्या पटेल जी इतने समझौतापरस्त इंसान थे कि उन्होंने अपने विरोधी विचारधारा और सिद्धांतविहीन व्यक्ति वाले के साथ काम करना स्वीकार कर लिया। क्या ऐसे वीतरागी को भी सत्ता का मोह विचलित कर सकता है!!!! यदि ऐसा गांधी जी के दबाव के चलते उन्होंने स्वीकार किया था तो गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्हें इस दबाव से मुक्त हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नही हुआ। पार्टी में रहना तो फिर भी ठीक था लेकिन मंत्रिमंडल में रहकर सहयोग देना कम से कम असहमत लौहपुरुष की प्रकृति में तो नहीं
ही था। निश्चित रूपसे कई मामलों में पटेल के निर्णय नेहरू की तुलना में ज्यादा दूरदर्शी सोच वाले साबित हुए पर इससे इंकार कहां ?? प्रधानमंत्री का पद उनके विराट व्यक्तित्व के सामने महत्वहीन था।
वस्तुतः उन दोनों के मध्य बहुत मधुर संबंध थे, उन दोंनो के बीच हुए पत्राचार इसकी गवाही देते हैं। उदाहरण के तौर पर पटेल के एक पत्र का हवाला दिया जा सकता है,जो उन्होंने नेहरू के उस अनुरोधपत्र के जवाब में लिखा था जिसमें पटेल से मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया गया था .... पटेल ने लिखा-
” आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”
बेबाक़ राय देना बताता है कि ये राष्ट्र पुरूष स्वतंत्र चेतना से संपृक्त थे। विचारों की भिन्नता उनके आपसी संबंधों का निर्धारण नही करती थी। वे एक दूसरे के प्रति बहुत ही आदरभाव रखते थे। एक बार बताते हैं कि प्रसाद स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान किसी बिंदु पर चर्चा करने के लिये देर रात नेहरू से मिलने उनके निवास पर गए पर पता चला कि नेहरू सो गए हैं, प्रसाद जी ने नेहरूजी को जगाने से मना कर दिया और खुद बरामदे में ही सो गए। सुबह नेहरू जी उठे तो यह जानकर बहुत दुखी हुए कि प्रसादजी को उनकी वजह से कष्ट हुआ।
इसी तरह एक और उदाहरण गांधी और सुभाष के संदर्भ में है। दोंनो भिन्न-भिन्न विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले जननेता थे। गांधीजी ने सुभाषबाबू के दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बनने का कड़ा विरोध किया पर सुभाष बाबू गांधीजी के विरोध के बावजूद चुनाव लड़े और जीते भी। बाद में इस्तीफा भी दे दिया। पर ध्यान दिया जाय कि गांधीजी की कार्यसंस्कृति के प्रखर विरोधी रहे नेताजी अपने व्यक्तिगत जीवन में गांधीजी के प्रति बहुत आदर का भाव रखते थे। विदेश में अपने सशस्त्र क्रान्ति के अभियान की शुरुआत के अवसर पर सबसे पहले आपने ही अपने रेडियो प्रसारण में बापू से आशीर्वाद लेते हुए श्रद्धाभाव से उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। विचारों का टकराव अपनी जगह था और एक-दूसरे के प्रति सम्मान व सद्भाव अपनी जगह।
वो बड़े लोग एक दूसरे का सम्मान करके खुश होते थे और आज कुछ लोग उन बड़े लोगों की आपस मे तुलना करके और स्वघोषित परिणामों के आधार पर बड़े और छोटे कद के रूप में एक दूसरे को वर्गीकृत करके आत्मसंतुष्टि पाते हैं। अगर उन लोगों में कद और पहचान को लेकर इतनी महत्त्वाकांक्षा होती तो शायद एक पार्टी और प्रतिद्वंद्वी साथी के साथ इतने लंबे समय तक काम करना उनके लिए संभव न होता। अलग पार्टी बनाने का विकल्प तब भी खुला रहता था पर तब पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर गठित होती थीं न कि अपनी पहचान व कद को बचाने की खातिर ।।
निश्चित रूपसे गाँधी, नेहरू या अन्य कोई भी आलोचना से परे नहीं हो सकता, पर आलोचना तथ्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए; पूर्वाग्रहसे प्रेरित नहीं।कई निर्णयों के लिये गाँधीजी और पंडित नेहरू की निर्मम आलोचना की जाती है, की भी जानी चाहिए यदि ईमानदार विवेचना की ऐसी मांग हो; यदि उनके निर्णयों से देश की दशा और दिशा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हो।
-संजीव शुक्ल
आज के इस अति बुद्धिवादी दौर में अगर आप भावनाओं से जुड़े तथ्यों को रेखांकित करते हैं तो आप प्रगतिशीलता के विरोधी ठहराये जायेंगे। बुद्धिवाद इस कदर हावी है कि लोग मानव समाज के विशुद्ध भावनात्मक सम्बन्धों को भी विवेक के तराजू पर तौलकर नये-नये निष्कर्ष निकालते हैं। पर ऐसे स्वघोषित निष्कर्ष हमेशा विशुद्ध बुद्धिवादी खेमे से आएं ऎसा जरूरी नहीं, कभी-कभी यह प्रायोजित होता है। अगर ईमानदारी से देखा जाय तो यह ज़्यादातर प्रायोजित ही होता है, हालांकि होता बुद्धिवाद के आवरण में ही है; ठीक उसी तरह जैसे सामान से ज़्यादा उसकी पैकिंग महत्वपूर्ण होती है। ये श्रेष्ठता के स्थापन का मनोविज्ञान है।
प्रायोजित इसलिए होता है कि इससे निकाले गये निष्कर्ष वांछित परिणामों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। राजनीति के क्षेत्र में यह प्रवृत्ति खूब फल-फूल रही है। राष्ट्रीय नायकों और राजनीतिज्ञों के आपसी संबंधों को मनचाहे रूप में व्याख्यायित करने के अपने निहितार्थ हैं। उनके वैचारिक विरोध को उनके आपसी संबंधों की दशा व दिशा तय करने वाला एकमात्र मुख्य निर्धारक बिंदु मान की गई सुविधावादी राजीनीतिक व्याख्या के कई फायदे हैं।
दो राजनेताओं के मध्य विचार वैभिन्य को व्यक्तिगत शत्रुता के रूप में चित्रित कर उन्हें परस्पर विरोधी गुट के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाने की प्रवृत्ति इधर कुछ ज्यादा ही मुखर हुई है। वस्तुतः इस दुष्प्रवृत्ति के पीछे राजनेताओं को दो गुटों में बांटकर उनमें से एक गुट को अपने साथ जोड़कर उनसे जुड़े लोगों को साधने की कोशिश की जाती है, अर्थात अनुयायियों को वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश की जाती है। इस प्रकार यह सारा अभियान, सारा उपक्रम सत्ता प्राप्ति के निमित्त है। यह लोग यहीं नहीं रुकते बल्कि यह लोग तो महापुरुषों को जाति-विशेष में कैद करके जातिवादी राजनीति को और हवा देते हैं। भले ही वे महापुरुष अपने जीवन में जातिवाद के घोर विरोधी रहें हों, पर इससे उन्हें क्या फ़र्क पड़ता..... आदर्शवाद से चुनाव तो नहीं जीत सकते न!!! चुनाव जीतने के लिये ध्रुवीकरण जरूरी है।
हां तो बात मत-मतांतर को विवाद की शक्ल में पेश करने पर हो रही थी। इधर सोशल मीडिया पर स्वघोषित इतिहासकारों की बाढ़ आ गयी है। ये लोग नेहरू,पटेल,राजेंद्र प्रसाद तथा नेताजी के आपसी संबंधों पर ऐसे साधिकार टिप्पणी करते हैं जैसेकि वह स्वयं इन महान चरित्रों के कार्य व्यापार व संबंधों के साक्षी रहें हों।
कुछ मनीषी नेहरू व पटेल तथा नेहरू और प्रसाद को प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करते हैं। निश्चित रूप से कई मुद्दों पर बड़े नेताओं के मध्य मत-भिन्नता होती थी जो कि बहुत ही स्वाभाविक है। मत भिन्नता कहां नहीं होती? यह तो मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। यही तो लोकतांत्रिक व्यवहार की अपनी खूबसूरती है। इसे लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लेने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
नेहरू- पटेल व नेहरू-प्रसाद के आपसी संबंधों पर चर्चा करते समय प्रायः ही नेहरू को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। ऐसा लगता है कि नेहरू ताउम्र प्रतिद्वंद्वी नेताओं के लिये षड्यंत्र ही रचते रहे। इसके अलावा उन्होंने कोई सार्थक काम न किया। ऐसा करके आलोचक जाने-अनजाने में पटेल और राजेंद्र प्रसाद जी के विराट व्यक्तित्व को भी बौना कर देते हैं। क्या पटेल जी इतने समझौतापरस्त इंसान थे कि उन्होंने अपने विरोधी विचारधारा और सिद्धांतविहीन व्यक्ति वाले के साथ काम करना स्वीकार कर लिया। क्या ऐसे वीतरागी को भी सत्ता का मोह विचलित कर सकता है!!!! यदि ऐसा गांधी जी के दबाव के चलते उन्होंने स्वीकार किया था तो गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्हें इस दबाव से मुक्त हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नही हुआ। पार्टी में रहना तो फिर भी ठीक था लेकिन मंत्रिमंडल में रहकर सहयोग देना कम से कम असहमत लौहपुरुष की प्रकृति में तो नहीं
ही था। निश्चित रूपसे कई मामलों में पटेल के निर्णय नेहरू की तुलना में ज्यादा दूरदर्शी सोच वाले साबित हुए पर इससे इंकार कहां ?? प्रधानमंत्री का पद उनके विराट व्यक्तित्व के सामने महत्वहीन था।
वस्तुतः उन दोनों के मध्य बहुत मधुर संबंध थे, उन दोंनो के बीच हुए पत्राचार इसकी गवाही देते हैं। उदाहरण के तौर पर पटेल के एक पत्र का हवाला दिया जा सकता है,जो उन्होंने नेहरू के उस अनुरोधपत्र के जवाब में लिखा था जिसमें पटेल से मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया गया था .... पटेल ने लिखा-
” आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”
बेबाक़ राय देना बताता है कि ये राष्ट्र पुरूष स्वतंत्र चेतना से संपृक्त थे। विचारों की भिन्नता उनके आपसी संबंधों का निर्धारण नही करती थी। वे एक दूसरे के प्रति बहुत ही आदरभाव रखते थे। एक बार बताते हैं कि प्रसाद स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान किसी बिंदु पर चर्चा करने के लिये देर रात नेहरू से मिलने उनके निवास पर गए पर पता चला कि नेहरू सो गए हैं, प्रसाद जी ने नेहरूजी को जगाने से मना कर दिया और खुद बरामदे में ही सो गए। सुबह नेहरू जी उठे तो यह जानकर बहुत दुखी हुए कि प्रसादजी को उनकी वजह से कष्ट हुआ।
इसी तरह एक और उदाहरण गांधी और सुभाष के संदर्भ में है। दोंनो भिन्न-भिन्न विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले जननेता थे। गांधीजी ने सुभाषबाबू के दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बनने का कड़ा विरोध किया पर सुभाष बाबू गांधीजी के विरोध के बावजूद चुनाव लड़े और जीते भी। बाद में इस्तीफा भी दे दिया। पर ध्यान दिया जाय कि गांधीजी की कार्यसंस्कृति के प्रखर विरोधी रहे नेताजी अपने व्यक्तिगत जीवन में गांधीजी के प्रति बहुत आदर का भाव रखते थे। विदेश में अपने सशस्त्र क्रान्ति के अभियान की शुरुआत के अवसर पर सबसे पहले आपने ही अपने रेडियो प्रसारण में बापू से आशीर्वाद लेते हुए श्रद्धाभाव से उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। विचारों का टकराव अपनी जगह था और एक-दूसरे के प्रति सम्मान व सद्भाव अपनी जगह।
वो बड़े लोग एक दूसरे का सम्मान करके खुश होते थे और आज कुछ लोग उन बड़े लोगों की आपस मे तुलना करके और स्वघोषित परिणामों के आधार पर बड़े और छोटे कद के रूप में एक दूसरे को वर्गीकृत करके आत्मसंतुष्टि पाते हैं। अगर उन लोगों में कद और पहचान को लेकर इतनी महत्त्वाकांक्षा होती तो शायद एक पार्टी और प्रतिद्वंद्वी साथी के साथ इतने लंबे समय तक काम करना उनके लिए संभव न होता। अलग पार्टी बनाने का विकल्प तब भी खुला रहता था पर तब पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर गठित होती थीं न कि अपनी पहचान व कद को बचाने की खातिर ।।
निश्चित रूपसे गाँधी, नेहरू या अन्य कोई भी आलोचना से परे नहीं हो सकता, पर आलोचना तथ्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए; पूर्वाग्रहसे प्रेरित नहीं।कई निर्णयों के लिये गाँधीजी और पंडित नेहरू की निर्मम आलोचना की जाती है, की भी जानी चाहिए यदि ईमानदार विवेचना की ऐसी मांग हो; यदि उनके निर्णयों से देश की दशा और दिशा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हो।
-संजीव शुक्ल
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