ये सच है कि कुछ गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिध की जाती है पर वह कामयाब नही होती। अब जैसे कि असहिष्णुता के नाम पर काफी बवाल हुआ। जो एक आध घटनाएं घटी वो निःसंदेह निंदनीय है और उनकी भर्त्सना होनी ही चाहिए पर इन पर वितंडावाद खड़ा करना और इन घटनाओं को राष्ट्रीय चरित्र के रूप में व्याख्यायित करना गलत है।
तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता के रूप में परिभाषित करने के राजनैतिक निहितार्थ जो भी हो पर समाजिक सद्भाव की दृष्टि से यह घातक मनोवृत्ति है फिर चाहे वह तुष्टिकरण हिंदुओं का हो या मुसलमानो का या फिर किसी और सम्प्रदाय का । सर्वधर्म संभाव ही यहाँ के समाज की मुख्य पूँजी है और विश्वास है गंगा जमुनी तहजीब में। ...........चर्चा अगर होनी है तो सभी मुद्दों पर होनी चाहिए। लेकिन हमारे यहाँ नेता बहुत चालाकी से उन विषयों पर बहस करने से कतराते है जो धार्मिक मान्यताओं से टकराते हैं।अगर कोई प्रश्न सामाजिक व मानवीय सरोकारों से जुड़ा हुआ है तो क्या उस पर इसलिए बहस नही की जा सकती है कि वह धार्मिक विषय है। तीन तलाक के अगर मानवीय और सामाजिक सरोकार है तो उस पर विमर्श क्यों नही हो सकता । धर्म के नाम पर संकीर्णता ठीक नहीं ।अपने राजनैतिक नफा नुकसान को ध्यान में रखकर मुद्दों को उछालना या फिर उनको विमर्श की परिधि से बाहर धकेल देना स्वस्थ मानसिकता का द्योतन नहीं है पर यह भारतीय राजनीति का वर्तमान है। इस सत्तावादी लोलुप प्रवृत्ति पर प्रहार आवश्यक है ।।।
Friday, 20 January 2017
राजनीति का एक पहलू यह भी ...
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