दलों के वर्गीकरण में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। दलों के वर्गीकरण का विस्तार किया जाना चाहिए। अफ़सोस है कि संविधान निर्माता इस मामले में अपनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय सोंच के संकुचित दायरे से आगे नही बढ़ सकेऔर आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके। अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले लोहियावादी, राष्ट्रवादी आदि आदि (सभी उदाहरण देना ठीक नही) जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता।
आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान केप्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। कुछ प्रदेशों में तो आलम ये है कि अगर एक ही परिवार में बाप-बेटे,चाचा-भतीजे में नही बनी तो लड़ने की इच्छाशक्ति के चलते वह नई पार्टी की नींव रख देते हैं और इस तरह वह पारिवारिक असहमति को लोकतान्त्रिक स्वरूप देकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं।
जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती।। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि परिवार के लोगों को राजनैतिक रोजगार देने पर लोग-बाग आपत्ति न उठा सकें....... जय परिवारवाद ।
Friday, 20 January 2017
दलों का वर्गीकरण और संभावनाएं
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