तिवारीजी ने पूर्व पार्टीअध्यक्ष को अपने अनुभव से समझाया था कि बेटे से पंगा न लो, वह अपना हक लेकर रहेगा. काहे को जीते-जी बची-खुची मिटाने पर तुले हो और फिर ये आपभी मानते हो कि इस उम्र में गलतियां हो ही जाती हैं.अब हमी को ही देख लीजिये, हमने क्या-क्या जुगत नही भिड़ायी पर कोई फायदा नही। सैम्पल तक देने से मनाकर दिया था, लाख चिल्लाया कि इस लड़के की पैदाइस में हमारा कोई हाथ नही, हमने जो भी किया पार्टी के हित में किया ।पार्टी के हित के लिए हमें जो भी करना पड़ेगा हम करेंगे। ... लेकिन खैर ....विधि के विधान के आगे कब किसकी चली है। कोर्ट भी जाने से कोई फायदा नही; वहां भी कोई नही सुनता; कानून के नाम पर बड़ा अत्याचार हुआ अपने पर . हम आज तक ये नही जान पाये कि हमको वैज्ञानिक जांच के आधार पर पिता घोषित किया गया या पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर हमारा हाथ होना स्वीकार किया गया. लेकिन अब जो है सो है......इसलिए समय रहते बेटे का सम्मान करना सीखिये... हम तो सीख लिए.......
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