दलों के वर्गीकरण में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। दलों के वर्गीकरण का विस्तार किया जाना चाहिए। अफ़सोस है कि संविधान निर्माता इस मामले में अपनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय सोंच के संकुचित दायरे से आगे नही बढ़ सके
और आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके।अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले जनवादी, लोहियावादी व राष्ट्रवादी आदि-आदि जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता। आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान के प्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। इसके अलावा जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टियों के जरिये समाजसेवा-राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठा रक्खा है क्या उनके प्रति समाज का कोई दायित्व नही बनता?? यह परोपकारी प्रवृत्ति कहीं लुप्त न हो जाय इसके लिये इसका तत्काल संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही कुछ विशिष्ट परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही समाज सेवा की इच्छा को लोगों के द्वारा राजनैतिक रोजगार का ताना मारकर अपमानित न किया जा सके, इसके लिये भी इस तरफ लोगों में सकारात्मक सोंच को विकसित करने की जरूरत है ........ विशेषकर तब जब कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा,और बिहार में इसका बड़ा क्रेज हो....... जय परिवारवाद ।।।।
और आदर्शवाद के प्रति अपने पैदाइशी मोह के चलते परिवार जैसी गरिमापूर्ण संस्था को दलों के वर्गीकरण में स्थान न दे सके।अगर ये घटिया सोंच नही होती तो आज परिवारवाद की सारी विशेषताओं को रखने के बावजूद कुछ पार्टियो को अपने नामों के पहले जनवादी, लोहियावादी व राष्ट्रवादी आदि-आदि जबरदस्ती उपसर्ग नही लगाने पड़ते और हम गर्व सहित आसानी से अपने पिताजी,दादा व परदादा के नाम से पार्टी का गठन कर सकते थे। लगे हाथों पूर्वजों को सम्मान देने की सनातनी परम्परा का निर्वाह भी हो जाता। आखिर जो पार्टी परिवार के उत्थान के प्रति पूरी तरह समर्पित हो उसे परिवार की पहचान से वंचित रखा जाय यह तो घोर लोकतान्त्रिक अन्याय होगा। इसके अलावा जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टियों के जरिये समाजसेवा-राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठा रक्खा है क्या उनके प्रति समाज का कोई दायित्व नही बनता?? यह परोपकारी प्रवृत्ति कहीं लुप्त न हो जाय इसके लिये इसका तत्काल संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी हो सकती है तो परिवारवादी पार्टी क्यों नही हो सकती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही कुछ विशिष्ट परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही समाज सेवा की इच्छा को लोगों के द्वारा राजनैतिक रोजगार का ताना मारकर अपमानित न किया जा सके, इसके लिये भी इस तरफ लोगों में सकारात्मक सोंच को विकसित करने की जरूरत है ........ विशेषकर तब जब कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा,और बिहार में इसका बड़ा क्रेज हो....... जय परिवारवाद ।।।।
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