हालांकि जिस व्यक्ति का मैं परिचय करवाने जा रहाँ हूँ, उनके परिचय की आवश्यकता होनी नहीं चाहिए, पर है; होनी इसलिये नहीं चाहिए कि वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उनका क्षेत्र-विशेष में इतना बड़ा योगदान है कि आज नहीं तो कल जब भी मनीषी लोग उनकी रचनाधर्मिता के आकलन के लिये लेखनी उठाएंगे तो शायद वह स्वयं को गर्वित महसूस करें। पर विडंबना है भारतीय समाज की कि वह समय रहते उत्कृष्ट लोगों को सम्मान देने के अपने दायित्व के प्रति संवेदनशील नही रहता। निराला, प्रेमचंद जैसे न जाने कितने लोग होंगे जो समाज की जड़वादी धारा से संघर्ष करते हुए;अर्थाभाव से जूझते हुए साहित्य-साधना में रत रहे। निराला जी को तो अपने प्रारंभिक साहित्यिक जीवन मे अपनी कविता को कविता मनवाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। यह अलग बात है कि आज निरालाजी की 'राम की शक्ति पूजा' सिविल एग्जाम के पाठ्यक्रम में शामिल है।
ऐसा ही कुछ-कुछ हाल है एक ऐतिहासिक उपन्यासकार श्री रमाकांत पांडेय 'अकेले' जी का जिन्हें अपने उपन्यास को छपवाने के लिए छपवाई देने के साथ-साथ तमाम संघर्ष करना पड़ा। इन्हें अपनी किताबें बेंचकर उससे मिले धन को अगली किताब को छपवाने के लिए देने पड़ते हैं। अभी पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार स्वंय सम्मानित हुआ ....हालांकि पुरस्कार की दहलीज तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई थी श्री ए.के.सिंह राठौर जी ने जो कि हरदोई के जिलाधिकारी सहित तमाम बड़े प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। वह स्वयं बहुत अच्छे साहित्य साधक हैं। आपने ही बताया कि पांडेय जी के उपन्यास विदेशों तक में अपना स्थान बना चुके हैं।
पांडेय जी के उपन्यासों से लोंगो को रूबरू कराने के लिए सबसे पहले हमारे पिताजी (श्री वीरेंद्र शुक्ल) ने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी मासिक मैगज़ीन 'चीनी उद्योग' में आपके उपन्यास 'मितौलगढ़' को धारावाहिक में छापा था। पांडेय जी ने करीब 72 उपन्यासों की रचना की है जिनमें कि केवल 35 उपन्यास ही प्रकाशित हो पाएं हैं। इसके अलावा आपके 10 या 12 उपन्यास रखरखाव के अभाव के चलते दीमकों की भेंट चढ़ गए।
मौजूदा समय में आपके उपन्यास अमेरिका, जर्मनी, यू.के, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व फ्रांस सहित लगभग 6-7 देशों की लाइब्रेरीज में शोभित हो रहें हैं। अमेरिका में तो क़रीब 16 और विदेशों के लगभग 240 पुस्तकालयों में पांडेय जी की किताबें वर्तमान में मौजूद हैं।
87 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार श्री पांडेय जी आचार्य चतुरसेन, के.एम.मुंशी तथा वृन्दावन लाल वर्मा की परंपरा के ऐतिहासिक उपन्यासकर हैं। यथार्थ और कल्पना के मिश्रित संयोजन से रचेआपके ऐतिहासिक उपन्यास अद्भुत हैं। इस समय आप उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रह्मावली गांव में रहते हुए साहित्य-साधना में रत हैं। आपके सम्मानित होने से प्रशंसकों की चिर संचित अभिलाषा अब फलित होती दिख रही है। आश्चर्य है कि अमेरिका की बर्कले, येले यूनिवर्सिटी और आस्ट्रेलिया के कई पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहीं पाण्डेय जी की पुस्तकें अपने देश में परिचय की मोहताज़ ही रहीं .....
ऐसा ही कुछ-कुछ हाल है एक ऐतिहासिक उपन्यासकार श्री रमाकांत पांडेय 'अकेले' जी का जिन्हें अपने उपन्यास को छपवाने के लिए छपवाई देने के साथ-साथ तमाम संघर्ष करना पड़ा। इन्हें अपनी किताबें बेंचकर उससे मिले धन को अगली किताब को छपवाने के लिए देने पड़ते हैं। अभी पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार स्वंय सम्मानित हुआ ....हालांकि पुरस्कार की दहलीज तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई थी श्री ए.के.सिंह राठौर जी ने जो कि हरदोई के जिलाधिकारी सहित तमाम बड़े प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। वह स्वयं बहुत अच्छे साहित्य साधक हैं। आपने ही बताया कि पांडेय जी के उपन्यास विदेशों तक में अपना स्थान बना चुके हैं।
पांडेय जी के उपन्यासों से लोंगो को रूबरू कराने के लिए सबसे पहले हमारे पिताजी (श्री वीरेंद्र शुक्ल) ने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी मासिक मैगज़ीन 'चीनी उद्योग' में आपके उपन्यास 'मितौलगढ़' को धारावाहिक में छापा था। पांडेय जी ने करीब 72 उपन्यासों की रचना की है जिनमें कि केवल 35 उपन्यास ही प्रकाशित हो पाएं हैं। इसके अलावा आपके 10 या 12 उपन्यास रखरखाव के अभाव के चलते दीमकों की भेंट चढ़ गए।
मौजूदा समय में आपके उपन्यास अमेरिका, जर्मनी, यू.के, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व फ्रांस सहित लगभग 6-7 देशों की लाइब्रेरीज में शोभित हो रहें हैं। अमेरिका में तो क़रीब 16 और विदेशों के लगभग 240 पुस्तकालयों में पांडेय जी की किताबें वर्तमान में मौजूद हैं।
87 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार श्री पांडेय जी आचार्य चतुरसेन, के.एम.मुंशी तथा वृन्दावन लाल वर्मा की परंपरा के ऐतिहासिक उपन्यासकर हैं। यथार्थ और कल्पना के मिश्रित संयोजन से रचेआपके ऐतिहासिक उपन्यास अद्भुत हैं। इस समय आप उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रह्मावली गांव में रहते हुए साहित्य-साधना में रत हैं। आपके सम्मानित होने से प्रशंसकों की चिर संचित अभिलाषा अब फलित होती दिख रही है। आश्चर्य है कि अमेरिका की बर्कले, येले यूनिवर्सिटी और आस्ट्रेलिया के कई पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहीं पाण्डेय जी की पुस्तकें अपने देश में परिचय की मोहताज़ ही रहीं .....
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